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‘नजीब मामले में पॉलीग्राफ परीक्षण का आदेश सही’

दिल्ली हाई कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि उसने पुलिस से जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के लापता छात्र नजीब अहमद का पता लगाने के लिए संबंधित लोगों का पॉलीग्राफ परीक्षण कराने जैसी अन्य तरकीबों की संभावना तलाशने को कहा है क्योंकि अन्य सभी तरकीबों का कोई नतीजा नहीं निकला है।
Author नई दिल्ली | February 11, 2017 00:56 am
नजीब अहमद अक्टूबर 2016 से गुमशुदा है। न्यायमूर्ति जी.एस.सिस्तानी और न्यायमूर्ति रेखा पिल्लई की खंडपीठ ने इस मामले को तत्काल प्रभाव से सीबीआई को सौंप दिया।

दिल्ली हाई कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि उसने पुलिस से जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के लापता छात्र नजीब अहमद का पता लगाने के लिए संबंधित लोगों का पॉलीग्राफ परीक्षण कराने जैसी अन्य तरकीबों की संभावना तलाशने को कहा है क्योंकि अन्य सभी तरकीबों का कोई नतीजा नहीं निकला है। न्यायमूर्ति जीएस सिस्तानी व न्यायमूर्ति विनोद गोयल के पीठ ने कहा कि छात्र बीते साल अक्तूबर में लापता हुआ था और अब फरवरी आ चुका है। लगभग चार महीने हो गए लेकिन किसी भी सुराग का कोई परिणाम नहीं निकला है। हमने पॉलीग्राफ परीक्षण के लिए कहा है क्योंकि अन्य तरकीबों का कोई परिणाम नहीं निकला है। पीठ ने यह भी साफ किया कि अदालत जांच की निगरानी नहीं कर रही है, जैसी कि छात्रों ने आशंका जताई है। वह नजीब का पता लगाने के लिए सिर्फ परामर्श दे रही है। बता दें कि पीठ मामले में संदिग्ध नौ छात्रों में से एक छात्र के आवेदन पर सुनवाई कर रही थी। आवेदन में हाई कोर्ट के 14 व 22 दिसंबर 2016 के आदेशों को वापस लेने का आग्रह किया गया है, जो पॉलीग्राफ परीक्षण कराने के निर्देश से जुड़ा है। छात्रों का कहना है कि पुलिस इन आदेशों का बेजा इस्तेमाल कर सकती है।

आवेदन में कहा गया है कि इन आदेशों के जरिए ऐसा लग रहा है कि अदालत जांच के तरीके को विनियमित कर रही है। छात्रों का दावा है कि इसलिए जांच पूर्वाग्रहयुक्त हो गई। छात्र ने दिल्ली पुलिस की ओर से उसे जारी किए गए एक नोटिस को भी चुनौती दी है जिसमें उसे लाई-डिटेक्टर टेस्ट के लिए अपनी सहमति देने के वास्ते अदालत में पेश होने को कहा गया है। छात्रों की दलील है कि संविधान के अनुच्छेद 21-22 के तहत उनके अधिकारों का उल्लंघन हुआ है।

दिल्ली सरकार के वकील राहुल मेहरा ने आवेदन का विरोध किया और कहा कि इसी छात्र ने पूर्व में भी अन्य वकील के जरिए यही आवेदन दायर किया था और पीठ ने इसे यह कहकर निपटा दिया था कि छात्र को आगे आना चाहिए। मेहरा ने कहा कि वर्तमान आवेदन अदालत की प्रक्रिया का घोर उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि छात्रों को छात्रों की तरह व्यवहार करना चाहिए और वे कानून से ऊपर नहीं हैं। छात्र के वकील ने कहा कि वह पुलिस के नोटिस में इस्तेमाल की गई भाषा से क्षुब्ध हैं। पीठ ने वकील से कहा कि यदि छात्र लाई-डिटेक्टर परीक्षण नहीं चाहता तो वह इससे इनकार कर सकता है। अदालत का मानना है कि लेकिन मौजूदा मामले में छात्रों को स्वयं आगे आकर और जांच में शामिल होकर पुलिस की मदद करनी चाहिए। पीठ ने कहा कि पुलिस नजीब के लापता होने के महीनों बाद भी छात्रों को थाने लेकर नहीं गई, जो कि आम तौर पर होता नहीं है।

अदालत ने पूछा कि यदि लापता छात्र के कमरे में रहने वाले छात्र के लाई डिटेक्टर परीक्षण के लिए कहा जा सकता है तो उन छात्रों से क्यों नहीं जिनसे उसका (नजीब का) झगड़ा हुआ था। पीठ ने कहा कि हम यह नहीं कह रहे हैं कि सिर्फ झगड़े की वजह से उन्होंने उसके साथ कुछ कर दिया। उन्हें घिरा हुआ महसूस क्यों करना चाहिए?आप जा सकते हैं। यदि आप हां कहना चाहते हैं तो हां कहें। यदि आप ना कहना चाहते हैं तो ना कहें। आशंकित नहीं हों। आपके लिए कानून खुला है। ज्यादा संवेदनशील ना हों। अदालत ने मामले को 13 फरवरी के लिए सूचीबद्ध कर दिया।

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