ताज़ा खबर
 

नगरीय निकाय चुनाव : योगी सरकार की पहली चुनावी परीक्षा, वर्चस्‍व बरकरार रखने की चुनौती

इस चुनाव को लेकर भाजपा की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा प्रमुख निकाय क्षेत्रों में रैलियां करने की तैयारी है।
Author लखनऊ | October 29, 2017 16:55 pm
यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। (file photo)

मुहम्मद मजहर सलीम

उत्तर प्रदेश की सभी राजनीतिक पार्टियां अगले महीने होने वाले नगर निकाय चुनाव को बेहद गम्भीरता से ले रही हैं, मगर ये चुनाव खासकर भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का सवाल है। पिछले चुनाव में इसी पार्टी ने अन्य दलों पर अपना वर्चस्व कायम किया था और इस बार उसके सामने इसे दोहराने की कड़ी चुनौती है। वर्ष 2012 में हुए नगर निकाय के चुनाव में राज्य में महापौर के 12 में से 10 पदों पर भाजपा ने कब्जा किया था और नगर पालिका परिषदों तथा नगर पंचायतों में भी वह सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। भाजपा इस साल मार्च में प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई थी। ऐसे में आगामी नगर निकाय चुनाव प्रदेश की योगी सरकार की पहली चुनावी परीक्षा होंगे।

इस चुनाव को लेकर भाजपा की गम्भीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि खुद मुख्यमंत्री योगी द्वारा प्रमुख निकाय क्षेत्रों में रैलियां करने की तैयारी है। इससे पहले शायद ही किसी मुख्यमंत्री ने निकाय चुनावों को इतनी गम्भीरता से लिया है। भाजपा के प्रान्तीय महामंत्री विजय बहादुर पाठक ने नगर निकाय चुनावों में एक बार फिर भाजपा की जीत का विश्वास व्यक्त करते हुए ‘भाषा’ से कहा कि यह सही है कि नगर निगमों और नगर पालिकाओं के पिछले चुनाव में भाजपा का दबदबा रहा है लेकिन ‘एंटी इंकम्बेंसी’ जैसी कोई बात नहीं है। भाजपा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यंत्री योगी आदित्यनाथ के विकास कार्यों के बलबूते निकायों में फिर सरकार बनाएगी।

उन्होंने कहा कि पार्टी का प्रयास है कि योगी के साथ-साथ उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, दिनेश शर्मा और अन्य वरिष्ठ नेता भी निकाय चुनाव प्रचार में उतरें। पार्टी राज्य सरकार की पिछले छह माह की उपलब्धियों को लेकर जनता के बीच जाएगी। अधिकांश सीटें हम जीत रहे हैं।
राज्य निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2012 में हुए नगर निकाय चुनाव में 12 में से 10 नगर निगमों मेरठ, गाजियाबाद, मुरादाबाद, अलीगढ़, आगरा, कानपुर नगर, झांसी, लखनऊ, गोरखपुर और वाराणसी में भाजपा के महापौर जीते थे। दो अन्य सीटों बरेली तथा इलाहाबाद पर निर्दलीय प्रत्याशी विजयी हुए थे। इस बार मथुरा, फिरोजाबाद, फैजाबाद और सहारनपुर के रूप में चार और नगर निगम क्षेत्र बनाए गए हैं, जो पहली बार निकाय चुनाव के दौर से गुजरेंगे।

इसके अलावा, नगर पालिका अध्यक्ष के 194 पदों में से 42 पर भाजपा ने और 15 पर कांग्रेस ने कब्जा जमाया था। सपा का खाता भी नहीं खुला था, जबकि 130 सीटों पर निर्दलीय अथवा अन्य दलों द्वारा सर्मिथत प्रत्­याशी जीते थे। पांच सीटें अन्य के खाते में गई थीं। इसके अलावा 423 नगर पंचायतों में से 36 में अध्­यक्ष के पद पर भाजपा ने जीत हासिल की थी, जबकि 21 पर कांग्रेस ने कब्जा किया था। वर्ष 2012 के चुनाव में प्रदेश के 12 नगर निगमों में पार्षद के 980 पदों के लिए हुए चुनाव में भाजपा ने 304 सीटें जबकि कांग्रेस ने 100 सीटें जीती थीं। इसी तरह नगर पालिका परिषद सभासद के कुल 5077 पदों के लिए हुए चुनाव में भाजपा ने 506 जबकि कांग्रेस ने 179 सीटों पर कब्जा जमाया था। साथ ही 4323 सीटें निर्दलीय अथवा सर्मिथत प्रत्­याशियों ने जीती थीं।

पाठक ने बताया कि भाजपा हमेशा से अपने चिह्न पर निकाय चुनाव लड़ती रही है। हालांकि अनेक स्­थानों पर दल के प्रत्­याशी कुछ कारणों से पार्टी का चुनाव निशान नहीं लेते थे, तो उन्हें पार्टी केवल समर्थन दे देती थी। पिछले चुनावों में जो भी निर्दलीय प्रत्­याशी जीते उनमें से बड़ी संख्या में भाजपा सर्मिथत थे। निकाय चुनाव को लेकर अन्य दल भी कमर कस रहे हैं। सपा अध्­यक्ष अखिलेश यादव कह चुके हैं कि अगर लखनऊ मेट्रो, आगरा-लखनऊ एक्­सप्रेस वे, समाजवादी पेंशन योजना, समाजवादी आवास योजना समेत उनकी पिछली सरकार के तमाम विकास कार्यों को देखते हुए वोट पड़े तो ज्यादातर नगर निकायों में पार्टी के प्रत्­याशी चुने जाएंगे।

सपा के राष्ट्रीय सचिव राजेन्द्र चौधरी ने कहा कि एक-दो दिन में प्रत्­याशी घोषित हो जाएंगे। फिलहाल अखिलेश के चुनाव प्रचार मैदान में उतरने का कोई कार्यक्रम नहीं है। जहां तक मुद्दों का सवाल है तो हर व्यक्ति परेशान है और सरकार ने खुद ही उन्हें मुद्दे उपलब्­ध करा दिए हैं।
कांग्रेस प्रवक्­ता वीरेन्द्र मदान ने बताया कि उनकी पार्टी नगर निगमों, नगर पालिकाओं तथा नगर पंचायतों में अपने प्रत्­याशी खड़े करती रही है। इस बार यह चुनाव बेहद अ­हमियत रखते हैं क्योंकि इसके बाद सीधे 2019 का लोकसभा चुनाव होगा लिहाजा निकाय चुनाव से पार्टी का आधार मजबूत होगा। चुनाव में पार्टी के राज्य स्तरीय नेता प्रचार करेंगे। जहां जरूरत पड़ेगी वहां केन्द्रीय नेताओं से मदद ली जाएगी।

प्रदेश में चार बार सत्तारूढ़ हो चुकी बसपा पहली बार अपने चुनाव चिन्ह पर नगरीय निकाय चुनाव लड़ रही है। गत विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद बसपा के लिए नगरीय निकाय चुनाव बेहद महत्वपूर्ण हो गए हैं। दिल्ली में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी उत्तर प्रदेश में पहली बार नगर निकाय चुनाव में ताल ठोंक रही है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत हासिल करने वाली यह पार्टी इन स्थानीय चुनावों को राज्य में अपनी सियासी पारी की औपचारिक शुरुआत मान रही है।

पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता संजय सिंह का कहना है कि उनका दल नगर निगमों नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों में भाजपा के ”भ्रष्टाचार” को प्रमुख मुद्दा बनाएगा। मालूम हो कि प्रदेश में 16 नगर निगमों, 198 नगर पालिका परिषदों और 438 नगर पंचायतों के चुनाव तीन चरणों में 22, 26 और 29 नवंबर को होंगे। मतगणना एक दिसंबर को होगी। नगर निगम के मेयर और पार्षद पदों के चुनाव इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन से होंगे जबकि नगर पालिका परिषद और नगर पंचायत अध्यक्षों एवं सदस्यों का निर्वाचन मतपत्रों के माध्यम से होगा।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.