ताज़ा खबर
 

कश्मीर की कली बनाम जमीनी तस्वीर, जानें घाटी की खूबसूरती के बारे में कितना जानते हैं पत्रकार और आम लोग

मीडिया स्टडीज ग्रुप का सर्वे, 39 फीसद हिंदी पत्रकारों ने टीवी पर पहली बार देखा कश्मीर
Author नई दिल्ली | December 4, 2016 02:09 am
Ground Photo of kashmir

कश्मीर को हिंदी पट्टी के पत्रकार किस तरह देखते हैं? कश्मीर को पहली बार हिंदी के पत्रकारों ने इस रूप में जाना कि कश्मीर घाटी बहुत सुंदर है। कश्मीर की सुंदरत से 57 फीसद हिंदी के पत्रकारों के रिश्तों की शुरुआत होती है। 20 फीसद ने तो आतंकवाद के जरिए कश्मीर को पहली बार जाना। फिल्म की शूटिंग कश्मीर में होती है इस नाते कश्मीर को जानने वाले हिंदी पत्रकारों की तादात 11 फीसद है। चार फीसद ने बताया कि कश्मीर से रिश्ते की शुरुआत किस रूप में हुई उन्हें याद नहीं है। कश्मीर का दृश्य सीधे तौर पर देखने वालों की संख्या भी 8 फीसद है। जबकि कश्मीर का दृश्य पहली बार फिल्म के जरिए देखने वालों का फीसद 52 है। 39 फीसद ने टीवी पर कश्मीर के दृश्य पहली बार देखे।
नोटबंदी की खबरों के पहले हिंदी मीडिया का सबसे अहम विषय कश्मीर ही था। लेकिन कश्मीर पर रिपोर्टिंग करने वाले हिंदी पट्टी के पत्रकार खुद कश्मीर को कितना जानते हैं यह जानने की कोशिश की मीडिया स्टडीज ग्रुप ने। संस्था ने हिंदी पत्रकारिता में सक्रिय पत्रकारों के बीच एक सर्वेक्षण किया जिसमें कश्मीर के बारे में और कश्मीर के साथ हिंदी के पत्रकारों के रिश्ते की परतों को समझने की कोशिश की गई है। यह सर्वेक्षण आॅनलाइन माध्यम से किया गया।

संविधान में कश्मीर से संदर्भित धारा 370 के बारे में 46 फीसद हिंदी के पत्रकारों को अखबारों से जानकारी मिली। वहीं 16 फीसद पत्रकार ऐसे हैं जिन्होंने महज किसी से बातचीत के जरिए इस धारा के बारे में जानकारी हासिल की है। टेलीविजन चैनलों के जरिए भी संविधान की इस धारा के बारे में जानने वालों की तादात 13 फीसद है। इन आंकड़ों से यह संकेत मिलता है कि संविधान के जरिए धारा 370 के बारे में जानने की तरफ पत्रकारों का रुझान नहीं रहा है। जिन माध्यमों से इस धारा की जानकारी पत्रकारों को मिली है वह माध्यमों द्वारा धारा से संबंधित व्याख्याएं एवं विश्लेषण के साथ ही सुनने या जानने को मिली हंै। यह स्पष्ट है कि प्रत्येक माध्यम अपनी पृष्ठभूमि के अनुसार संविधान के प्रावधानों की व्याख्या कर सकता है।

एक दूसरे सवाल के जवाब में 80 फीसद पत्रकारों ने यह दावा किया है कि उन्होंने धारा 370 के संविधान में प्रावधान की राजनीतिक पृष्ठभूमि के बारे में पढ़ा है जो कि उपरोक्त सवाल से मिले जवाब से एक अंतर्विरोध की स्थिति की तरफ इशारा करता है। यदि 370 की राजनीतिक पृष्ठभूमि के बारे में पढ़ने का दावा सही है तो यह बिना धारा 370 के बारे में जानकारी हासिल करने के स्रोतों से भिन्न कैसे हो सकता है। हालांकि 20 फीसद पत्रकारों ने स्वीकार किया है कि 370 की राजनीतिक पृष्ठभूमि के बारे में वे कुछ भी नहीं जानते हैं।
सर्वे में कश्मीर के बारे में पूछे गए प्रश्नों से भागीदारों के जवाब अंतर्विरोधी होने के स्पष्ट संकेत मिलते हैं। 67 फीसद भागीदारों ने बताया कि कश्मीर के बारे में उन्होंने कुछ जो पढ़ा है उसका माध्यम अखबार है। पत्रिकाओं के जरिए कश्मीर के बारे में कुछ पढ़ने वालों की तादात 17 फीसद है तो मात्र एक फीसद पत्रकारों ने शोधपत्र के जरिए कश्मीर के बारे में पढ़ा है। कश्मीर के बारे में हिंदी में आपने कुछ पढ़ा है? इस जवाब के बाद अगले सवाल के जवाब में एक हद तक अंतर्विरोध की स्थिति देखने को मिलती है। कश्मीर के राजनीतिक इतिहास की पाठ्यपुस्तकों से जानकारी मिलने का जो दावा कर रहे हैं उनकी तादाद 23 फीसद है। सर्वे में भाग लेने वालों ने कश्मीर से अपने रिश्ते की हकीत को छिपाने के इरादे से सर्वे में पूछे गए आगे के सवालों का सतर्कता से जवाब दिया। बहरहाल, राजनीतिक इतिहास की पत्र-पत्रिकाओं द्वारा जानकारी प्राप्त करने वालों की संख्या 58 फीसद है। शोध सामग्री से केवल 6 फीसद ने कश्मीर के
कश्मीर के राजनीतिक इतिहास पर पूछे सवाल को लेकर शोध में भागीदारों में 70 फीसद ने विभाजन के वक्त पाकिस्तान के कबीलाइयों के खिलाफ कश्मीरियों की शहादत के बारे में जानने का दावा किया है। 30 फीसद ने साफ इनकार किया कि कश्मीरियों ने विभाजन के वक्त पाकिस्तानियों के खिलाफ लड़ते हुए शहादत दी थी। कश्मीर की आर्थिक और सामाजिक समस्याओं के बारे में थोड़ा बहुत ही जानने वालों की तादात 42 फीसद है। यानी कश्मीर सुंदरता, फिल्मी शूटिंग, आतंकवाद जैसे विषयों के जरिये ज्यादातर पत्रकारों के बीच जाना जाता रहा है। हालांकि 31 फीसद ने यह दावा किया है कि वे आर्थिक-सामाजिक समस्याओं को बहुत अच्छी तरह से जानते हैं। कश्मीर की सामाजिक-आर्थिक समस्याओं के बारे में ज्यादा नहीं जानने वालों की तादाद 23 फीसद है।

मीडिया स्टडीज ग्रुप के अध्यक्ष और जन मीडिया के संपादक अनिल चमड़िया के मुताबिक, यह प्रश्न पूछा गया कि क्या पत्रकारों को जन संचार के माध्यमों में कश्मीर में पर्यटन, फिल्मी शूटिंग और आतंकवाद के अलावा किसी अन्य समाचार रिपोर्ट के बारे में तत्काल याद आता है तो 46 फीसद ने जवाब नहीं दिया। यह जन संचार माध्यमों में कश्मीर की सामाजिक, आर्थिक पहलुओं से जुड़ी खबरों व सामग्री के अभाव के स्पष्ट संकेत कहे जा सकते हैं। हिंदी पत्रकारों में 25 फीसद पत्रकार ऐसे हैं जिनकी किसी भी कश्मीरी से मुलाकात नहीं है। जबकि 49 फीसद ने दावा किया है कि उनकी कश्मीरी मुसलिमों से मुलाकात है और 26 फीसद ने कश्मीर के पंडितों से मिलने का दावा किया है। लेकिन इसके बाद के प्रश्न में भागीदारों में 23 फीसद ने बताया कि किसी कश्मीरी से उनकी केवल दो घंटे की ही मुलाकात है। कश्मीरियों से साथ एक हफ्ते से ज्यादा समय गुजारने वालों की तादात 35 फीसद है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग