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संगीतः राजघाट पर संगीतमयी ‘मानस-कथा’

राजघाट समाधि कमिटी ने गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति के साथ मिलकर सुविख्यात राम कथावाचक संत मुरारी बापू को महात्मा गांधी की पुण्यतिथि के अवसर पर उनकी समाधि राजघाट पर मानस-कथा के लिए आमंत्रित किया है।
Author नई दिल्ली | February 5, 2016 03:09 am
गांधी समाधी स्थल राजघाट

राजघाट समाधि कमिटी ने गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति के साथ मिलकर सुविख्यात राम कथावाचक संत मुरारी बापू को महात्मा गांधी की पुण्यतिथि के अवसर पर उनकी समाधि राजघाट पर मानस-कथा के लिए आमंत्रित किया है। राजघाट परिसर में 30 जनवरी से 7 फरवरी तक आयोजित ‘मानस-राजघाट कथाह्ण रामचरित मानस की कथा के माध्यम से राम और गांधी के आदर्शों में एक सहज संवाद स्थापित कर रही है। मानस के विचारों को केंद्र में रखकर गांघीजी के विचार सूत्रों पर प्रकाश डाल रही है।

मुरारी बापू का कहना है कि नौ दिनों तक चलने वाली यह कथा तुलसीदास की रामचरित मानस पर आधारित है लेकिन इसका अभिप्राय किसी धर्मविशेष से नहीं बल्कि सर्वधर्मसमभाव से है। तुलसी के राम सत्य, प्रेम और करुणा के प्रतीक हैं। गांधी जी ने भी तुलसीदास के अनेक पदों को अपनी सर्वधर्म प्रार्थना सभाओं में शामिल किया था क्योंकि उनके राम किसी धर्मविशेष के नहीं बल्कि सत्य और अहिंसा के प्रतीक थे।
बात जब सर्वधर्म समभाव की हो तो संगीत से अधिक सकारात्मक माध्यम कोई अन्य नहीं हो सकता क्योंकि सच्चे स्वरों से परे संगीत का कोई धर्म नहीं होता। संगीत किसी भी जाति, धर्म, रंग, भेद की सीमा नहीं जानता क्योंकि वह दिलों को जोड़ता है। मुरारी बापू के कथावाचन में यह बात दिखती है। सामान्य सा भजन ‘राम जपु बावरे।।ह्ण उनके यहां मालकौस के सुरों और दादरा की ठहरी हुई लय में गहरा प्रभाव छोड़ता है।
राजघाट पर गुरुवार की कथा उन्होंने राग दरबारी के गाम्भीर्य में डूब कर सरस्वती वंदना से शुरू की तो उसमें स्वरों की महिमा का भी बखान था ‘स्वर साधक जब स्वर में पुकारे/उसे सहज भगवान मिले/मां तुम जिसकी ओर निहारो उसे गुणियों में स्थान मिले/ सच्चे सुरों का ज्ञान मिले’। इसके बाद राम की आराधना अत्यधिक विलम्बित लय में थी, चित्त को एकाग्रता में अवस्थित कर देने वाली सीमा तक धीमी लय में। कथा की पूर्वपीठिका बनाने वाले इन भजनों का समापन भैरवी में ‘मंगल भवन अमंगल हारी/ द्रवहु सुदशरथ अजिर विहारी’ से हुआ। फिर अपने इष्टदेव हनुमान और संत तुलसीदास तो नमन करते हुए उन्होंने मानस-राजघाट कथा की शुरुआत की।
मानस राजघाट कथा के संदर्भ में आयोजित पत्रकार वार्ता में कथा की इस संगीतमयता के बारे में मुरारी बापू ने कहा ‘हमारे देश की कथावाचन परंपरा में कथा कही नहीं गाई जाती रही है, वाचन तो उसकी व्याख्या भर है जहां कथन उसके अभिप्राय का होता है। पहले सुर रास्ता बना देता है फिर शब्द उस रास्ते से अपने गन्तव्य तक पहुचता है।’
मुरारी बापू के कथा संकीर्तन की सबसे बड़ी कशिश उसका सांगीतिक पक्ष है। संगीत से मुरारी बापू के इस जुड़ाव का राज जानना चाहा तो उन्होंने बताया ‘मेरे परिवार में कथा गाई जाती थी इस कारण बचपन से ही संगीत से स्वाभाविक जुड़ाव रहा।
कथावाचन भी संगीत के माध्यम से हो और सुर सच्चा हो तो दिल तक पहुंचता ही है। मेरा संगीत प्रयास से पाया संगीत नहीं बल्कि प्रसाद में पाया संगीत है’।

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