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महाराष्ट्र: खुले में शौच करने से नहीं माने दादा तो अदालत में पोती ने ही सुनाई सजा

नए कानून के तहत खुले में शौच करने वाले व्यक्ति के पकड़ने जाने पर स्कूल के बच्चे जज बनकर उन्हें सजा सुनाते हैं।
इस तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। (फाइल फोटो)

महाराष्ट्र में 90 दिनों के अंदर गावों को खुले में शौच से मुक्त कराने के लिए एक विशेष अभियान चलाया जा रहा है। जिसके तहत खुले में शौच करते हुए पकड़ने जाने पर दोषी को अजीबो-गरीब सजाएं देने का प्रावधान रखा गया है। नए कानून के तहत खुले में शौच करने वाले व्यक्ति के पकड़ने जाने पर स्कूल के बच्चे जज बनकर उन्हें सजा सुनाते हैं। सूबे के इसी नियम के तहत उस्मानाबाद जिला परिषद के सीईओ ने जिले के स्कूलों में छात्रों को अदालत लगाने का आदेश दिया। नियम के अनुसार दोषी को बच्चों की इस अदालत का आदेश मानना ही पड़ता है। एक मामले में दोषी पाए जाने पर सुकटा गांव के विठ्ठल ने बताया, ‘छात्रों की अदालत में खुद मेरी पोती ही जज थी। उसी ने खुले में शौच करने के आरोप में मुझे सजा सुनाई। मुझे बहुत दुख हुआ। मेरी पोती ने मुझे झाड़ू लगाने की सजा सुनाई।’ खबर के अनुसार अबतक भवानवाडी, पाडोली, भोगलगांव और वारेवडगांव जैसे गांवों में छात्रों की अदालत लग चुकी है। छात्रों की अदालतों में खुले में शौच करने वाले दोषियों की पेश किया जाता है। जहां बच्चे सजा सुनाते हैं। बता दें कि इस नए कानून के तहत 20 दिनों में 23 गावों को शौच से मुक्त किया गया है। इस दौरान 406 लोगों के खिलाफ कार्रवाई की गई और अस्सी हजार से ज्यादा का जुर्मना वसूला गया।

वहीं छात्र अदालत में 56 लोगों को पूरे गांव के अलावा मंदिरों और स्कूलों में झाड़ू लगाने की सजा सुनाई गई। जबकि इस दौरान 350 लोगों ने अपने बच्चों के सामने शर्मिंदा होने से बचने के लिए घर पर ही शौचालय बनवाने के लिए तैयार हो गए। जिससे उन्हें छात्र अदालत में पेश नहीं किया गया। भूम के दांडेगांव में 14 जुलाई (2017) को पहली छात्र अदालत लगी। जिसमें खुले में शौच करने के 23 दोषी पेश हुए। इस दौरान छात्रों ने उनपर 200-200 का जुर्माना लगाकर पूरे गांव में झाड़ू लगाने की सजा सुनाई। यहां 36 में से 30 परिवारों ने उसी दिन घर में शौचालय बनवाने का काम शुरू कर दिया।

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