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मुंबई की बाढ़

राजस्थान के बीकानेर जैसे सूखे और बारिश के लिए तरसते रहे इलाके में भी बाढ़ आ जाती है। इसी तरह महानगर भी भीषण बाढ़ की चपेट में आने लगे हैं।
Author August 30, 2017 05:05 am
मुंबई में भारी बारिश

पहले बाढ़ कुछ खास इलाकों में आती थी। वहां अब भी आती है। खासकर असम और बिहार में दशकों से अमूमन हर साल बाढ़ आती रही है। लेकिन बाढ़ की कई शक्लें और कई जगहें अप्रत्याशित हैं। राजस्थान के बीकानेर जैसे सूखे और बारिश के लिए तरसते रहे इलाके में भी बाढ़ आ जाती है। इसी तरह महानगर भी भीषण बाढ़ की चपेट में आने लगे हैं। कुछ ही समय में खूब बारिश हो जाती है जो उन्हें जलमग्न कर देती है। क्या यह जलवायु बदलाव के चलते हो रहा है, जिसमें मौसम का तीव्र उतार-चढ़ाव होता है? मुंबई में अच्छी बारिश होती रही है। लेकिन चार दिनों से वहां जैसी भारी बारिश हुई वह एकदम असामान्य है। इस भारी और लगातार बारिश ने मुंबई में सब कुछ ठप और जन-जीवन अस्तव्यस्त कर दिया है। सड़कें जाम हैं। मुंबई की जीवनरेखा कही जानेवाली लोकल ट्रेन सेवा बुरी तरह बाधित है। इससे न केवल मुंबई की बल्कि उपनगरीय सेवाएं भी अस्त-व्यस्त हुई हैं। हवाई यातायात भी प्रभावित हुआ है। रेल पटरी बह जाने से नागपुर-मुंबई दुरंतो एक्सप्रेस की कई बोगियां आसनगांव के पास पटरी से उतर गर्इं। गनीमत यह रही कि इसमें फिलहाल किसी की मौत होने की खबर नहीं है।

मुंबई के इस हाल ने जुलाई 2005 की याद ताजा कर दी है। उस समय भी मुंबई में सब कुछ ठप हो गया था। उस मुसीबत से उबरने के बाद मुंबई के लोगों ने कल्पना नहीं की होगी कि वे जिस दु:स्वप्न से निकल आए हैं उससे उन्हें फिर गुजरना पड़ेगा। लेकिन वे फिर उसी अनुभव से गुजर रहे हैं। इससे पहले, नवंबर 2015 में चेन्नई में भी भीषण आई थी। चेन्नई की मौजूदा पीढ़ी के अनुभव में जल-प्लावन का यह सबसे भयानक अनुभव था। इस महीने के शुरू में बेंगलुरु बाढ़ से जूझ रहा था। एक साल पहले भी बेंगलुरु में बाढ़ आई थी। 2014 में श्रीनगर में भयानक बाढ़ आई, जैसी बाढ़ पिछले सौ साल में वहां नहीं आई थी। इन सब घटनाओं का जलवायु बदलाव से क्या संबंध है, यह अध्ययन का विषय है। पर महानगरों में आने वाली बाढ़ कुछ और बातों की तरफ भी इशारा करती है। हमने नगर नियोजन का जैसा ढांचा विकसित किया है, या असंतुलित शहरी विकास के जिस रास्ते पर चल रहे हैं उसमें इस साल या उस साल बाढ़ आ जाना बहुत हद तक स्वाभाविक है। शहरों में पानी की निकासी की परवाह ही नहीं की जाती। बहुत सारी जगहों पर नालियां मलबा या कूड़ा भरे होने की वजह से जाम रहती हैं या अतिक्रमण की भेंट चढ़ जाती हैं।

जब झील, तालाब आदि बचे हुए थे, तो ज्यादा बारिश संकट का रूप नहीं लेती थी, वे उस पानी को अपने में समा लेते थे। फिर, बहुत सारा पानी रिसकर जमीन के नीचे चला जाता था और इस तरह भूजल भंडार में इजाफा या भरपाई करता था। लेकिन चाहे दिल्ली हो या मुंबई या बेंगलुुरु, झीलें और तालाब कुनियोजित शहरी विकास, अवैध निर्माण और अतिक्रमण की भेंट चढ़ चुके हैं। इसके चलते प्रकृति का कोप महाकोप में बदल जाता है। मौसम विभाग ने चेताया है कि अगले एक-दो दिन में मुंबई, दक्षिण गुजरात, कोंकण, गोवा और पश्चिम विदर्भ में भारी वर्षा हो सकती है। इससे मुंबई की परेशानियां फिलहाल और बढ़ेंगी ही। लेकिन भारी बारिश का दौर बीतने के साथ, उम्मीद की जा सकती है कि स्थिति तेजी से सामान्य होने लगेगी। पर तब हमें ठंडे दिमाग से इस पर सोचना होगा कि हमारे नगर नियोजन में क्या खामियां हैं और उन्हें दूर करने के लिए क्या किया जाए।

 

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