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हाजी अली दरगाह मामला: सुप्रीम कोर्ट ने बंबई हाई कोर्ट के आदेश पर लगी रोक की अवधि बढ़ाई

हाजी अली दरगाह ट्रस्ट ने ही मुंबई उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी है।
Author नई दिल्ली | October 7, 2016 18:49 pm
कुछ मुस्लिम महिलाओं ने मुंबई की हाजी अली दरगाह के भीतरी भाग में महिलाओं के जाने पर प्रतिबंध को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

उच्चतम न्यायालय ने मशहूर हाजी अली दरगाह के गर्भ गृह के निकट महिलाओं के प्रवेश पर लगा प्रतिबंध हटाने के बंबई उच्च न्यायालय के फैसले पर लगी रोक की अवधि को शुक्रवार (7 अक्टूबर) को 17 अक्तूबर तक बढ़ा दिया। इस मामले में न्यायालय 17 अक्तूबर को सुनवाई करेगा। प्रधान न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर की पीठ ने आशा व्यक्त की कि हाजी अली दरगाह ट्रस्ट इस मामले में प्रगतिशील रुख अपनाएगी। इस ट्रस्ट ने ही उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी है। न्यायालय ने ट्रस्ट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम के अनुरोध पर सुनवाई स्थगित कर दी। पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय ने अपने फैसले के क्रियान्वयन पर जो रोक लगायी थी वह सुनवाई की अगली तारीख 17 अक्तूबर तक प्रभावी रहेगी।

सुब्रमण्यम ने पीठ को विश्वास दिलाया कि वह ‘प्रगतिशील मिशन’ पर हैं और पवित्र पुस्तकें और धर्मग्रंथ समता को बढ़ावा देते है और पीछे की ओर ले जाने वाला कोई सुझाव नहीं दिया जाना चाहिए। पीठ ने भी टिप्पणी की ‘यदि आप पुरुषों और महिलाओं दोनों को ही एक स्थान से आगे नहीं जाने दे रहे हैं तो कोई समस्या नहीं है लेकिन यदि आप कुछ लोगों को एक सीमा से आगे जाने दे रहे हैं और दूसरों को नहीं तो निश्चित ही समस्या है।’ पीठ ने कहा कि इसी तरह का एक मामला पहले से ही केरल में सबरीमाला मंदिर को लेकर न्यायालय में लंबित है। पीठ ने कहा कि यह समस्या सिर्फ मुस्लिम समुदाय में ही नहीं बल्कि हिन्दुओं में भी है।

महिला समूह की ओर से पेश वकील ने महिलाओं को दरगाह के गर्भ गृह के निकट नहीं जाने देने के ट्रस्ट के व्यवहार को चुनौती दे रखी है। इस वकील ने कहा कि आज की स्थिति के मुकाबले 2011 से पहले स्थिति भिन्न थी। उच्च न्यायालय ने 26 अगस्त को अपने फैसले में कहा था कि गर्भ गृह के निकट महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने का ट्रस्ट का निर्णय संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 25 के खिलाफ है और महिलाओं को पुरुषों की तरह ही गर्भ गृह तक जाने की अनुमति दी जानी चाहिए। उच्च न्यायालय ने गैर सरकारी संगठन भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन की दो महिलाओं जकिया सोमन और नूरजहां नियाज की जनहित याचिका पर यह फैसला सुनाया था। इस याचिका में दरगाह के गर्भ गृह के निकट महिलाओं के प्रवेश पर 2012 से लगे प्रतिबंध को चुनौती दी गयी थी।

उच्च न्यायालय ने दरगाह ट्रस्ट के अनुरोध पर अपने आदेश के क्रियान्वयन पर छह सप्ताह की रोक लगा दी थी ताकि इस निर्णय को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी जा सके। उच्च न्यायालय ने कहा था कि ट्रस्ट को किसी व्यक्ति विशेष या समूह के धार्मिक आचरण के तरीके में किसी प्रकार का बदलाव करने या उसमें छेड़छाड़ का अधिकार नहीं है। ट्रस्ट का दावा था कि उच्चतम न्यायालय के एक आदेश के मद्देनजर ही यह प्रतिबंध लगाया गया था जिसके तहत ही यह सुनिश्चित करने के लिए कठोर निर्देश दिए गए कि धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ किसी प्रकार की यौन छेड़छाड़ नहीं हो।

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