May 26, 2017

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नहीं रहे आजाद हिंद फौज के अंतिम सिपाही डैनियल काले

आजाद हिंद फौज के वयोवृद्ध सिपाही डैनियल काले का लंबी बीमारी के बाद कोल्हापुर में निधन हो गया। काले का एक स्वास्थ्य केंद्र में शुक्रवार सुबह आठ बजे निधन हुआ जहां वह खराब स्वास्थ्य के कारण पिछले कुछ दिनों से भर्ती थे।

Author मुंबई | October 16, 2016 03:56 am

आजाद हिंद फौज के वयोवृद्ध सिपाही डैनियल काले का लंबी बीमारी के बाद कोल्हापुर में निधन हो गया। काले का एक स्वास्थ्य केंद्र में शुक्रवार सुबह आठ बजे निधन हुआ जहां वह खराब स्वास्थ्य के कारण पिछले कुछ दिनों से भर्ती थे। उनकी उम्र 95 वर्ष थी। काले की अंतिम दिनों में देखभाल अशोक रोकडे कर रहे थे, जिन्होंने लोगों की सेवा के लिए ‘व्हाइट आर्मी’ की स्थापना की है। रोकडे ने कहा कि काले का अंतिम संस्कार शुक्रवार शाम कदमवाड़ी शवदाह गृह में किया गया। कोल्हापुर जिले के पन्हाला तहसील में सितंबर 1920 में जन्मे काले 1942 में रासबिहारी बोस इंडियन इंडिपेंडेंस लीग में शामिल हुए थे। लीग बाद में आजाद हिंद फौज में शामिल हो गया था जिसने काले को भारत-बर्मा की सीमा पर तैनात किया। रोकडे ने कहा, ‘काले फौज के गुप्तचर सेवा समूह का हिस्सा थे जो खुफिया सूचनाएं इकट्ठी करता था और फौज के नेतृत्व को भेजता था।’ बताया जाता है कि सुभाष चंद्र बोस द्वारा स्थापित फौज के वह अंतिम सिपाही थे। रोकाडे ने कहा कि 1947 में देश की स्वतंत्रता के बाद काले कोल्हापुर लौट आए और वहीं बस गए। उनकी पत्नी का एक दशक पहले निधन हो गया था। इसके बाद काले का स्वास्थ्य अधिक खराब हो गया था।

रोकडे ने कहा कि पिछले सात वर्षों से हम उनकी देखभाल कर रहे थे। काले के करीबियों ने बताया कि वह अक्सर आजाद हिंद फौज की कहानी के किस्से सुनाते थे। उनके किस्से उस जमाने की असलियत के बारे में बताते थे। स्वतंत्रता संग्राम के दौर में भारत के कई युगद्रष्टा, जुझारू और सर्वस्व समर्पित करने वाले नेताओं ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष का अपने अपने ढंग से नेतृत्व किया था। ज्यादातर इन सभी नेताओं ने अंग्रेजों के चुंगल से भारत को आजाद कराने और आजाद भारत कैसा हो, इसकी पूरी रूपरेखा अपने -अपने ढंग से प्रस्तुत की थी। इस क्रम मेें नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने स्वतंत्र भारत की परिकल्पना रखी थी। उनकी स्वतंत्र भारत की परिकल्पना में ईमानदारी, तेजी से समयबद्ध ढंग से सामाजिक-आर्थिक विकास आदि की संकल्पनाएं थीं। 1940 के दशक में नेताजी सुभाषचंद्र बोस और उनके अनुयायियों ने भारतीय समाज पर अत्यधिक प्रभाव डाला था।

भारत सरकार सहित कुछ अन्य देशों ने नेताजी सुभाषचंद्र बोस की मौत की खबर अगस्त, 1945 में प्रसारित की थी लेकिन कुछ लोग लंबे अरसे तक अपने विभिन्न तर्कों के सहारे यह दलील देते रहे हैं कि विमान दुर्घटना में नेताजी सुभाष चंद्र बोस नहीं मारे गए थे। इसके चलते कई वर्षों तक यह वाद-विवाद चलता रहा कि नेताजी विमान दुर्घटना में मारे गए या नहीं, नेताजी अभी जिंदा हैं या नहीं। पश्चिम बंगाल सरकार ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बारे में कई गोपनीय दस्तावेज जारी किए थे। पश्चिम बंगाल सरकार ने तब केंद्र सरकार से मांग की थी कि वह भी नेताजी के बारे में गोपनीय फाइलें सार्वजनिक करे। केंद्र सरकार ने नेताजी के बारे में कुछ सूचनाएं जारी की हैं लेकिन लोगों का एक समूह उससे संतुष्ट नहीं है।

लेकिन इस दौर में भी लोगों का आजाद हिंद फौज के सेनानियों सहित अन्य स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति सम्मान कम नहीं हुआ। इसीलिए कुछ लोग यह भी कहते रहे हैं – कौन दिल वतन में नहीं जिसमें घर तेरा, कहते सारे लोग हमारे सुभाष बोस। लोगों का यह सम्मान सुभाष बोस के साथ साथ उनके साथ कंधा लगा कर लड़ रहे आजाद हिंद फौज के हर सैनिक के लिए है। लेकिन अब आजाद हिंद फौज का शायद आखिरी सैनिक भी हमें छोड़ कर चला गया है।

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First Published on October 16, 2016 3:24 am

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