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जानिए- 330 साल पहले तीन लाख रुपये में मुगलों ने कैसे मैसूर शासकों को बेचा था बेंगलोर

मुगल अपने असहिष्णु और आक्रामक रुख के लिए कुख्यात थे। उस समय दक्षिण में सिर्फ मराठा ही मुगल शासकों के बड़े दुश्मन थे, ऐसे में मुगलों ने रणनीति वश पहले बेंगलोर पर अपना कब्जा जमाने की योजना बनाई।
ऐतिहासिक मैसूर पैलेस।

प्राचीन शिलालेखों में बेंगा-वलोरू नाम से प्रसिद्ध शहर आज का बेंगलुरू है। आधुनिक बंगलोर की स्थापना विजयनगर साम्राज्य के दौरान हुई थी। बाद में इस पर मराठा सेनापति शाहाजी भोसले का अधिकार रहा। मराठा सेनापति से मुगलों ने इस पर कब्जा कर लिया लेकिन 1689 में मुगल शासक औरंगजेब ने इसे चिक्काराजा वोडयार को बेच दिया। और तब से यह मैसूर साम्राज्य का हिस्सा हो गया। इससे पहले 1686 में औरंगजेब ने दक्षिण में साम्राज्य स्थापित करने की दिशा में बीजापुर साम्राज्य को जीत लिया था। मुगल अपने असहिष्णु और आक्रामक रुख के लिए कुख्यात थे। उस समय दक्षिण में सिर्फ मराठा ही मुगल शासकों के बड़े दुश्मन थे, ऐसे में मुगलों ने रणनीति वश पहले बेंगलोर पर अपना कब्जा जमाने की योजना बनाई।

जब दक्षिण में मुगल और मराठों के बीच वर्चस्व की लड़ाई चल रही थी, तब मैसूर का राजा चिक्का देवराजा वोडयार परिस्थितियों को भांपकर सही समय पर सही निशाना लगाने की फिराक में बैठा था। वोडयार मैसूर साम्राज्य का 14वां शासक था। इसी ने बाद में बेंगलोर की किस्मत रची। वोडयार औरंगजेब से अपनी दोस्ती के लिए मशहूर था। मुगल शासन के दौरान औरंगजेब ने मैसूर के विकास में काफी सहयोग किया। उसका दूर-दूर तक साम्राज्य फैला था।

वोडयार ने उसी समय एक घुड़सवार युद्ध में शिवाजी (मराठा शासन के संस्थापक) को पराजित करके मराठों के बीच अपनी प्रशंसा बटोर ली थी। इसलिए, 1687 में मुगल आक्रमण से पहले, जब बेंगलुरु शिवाजी के आधे भाई एकोजी के नियंत्रण में था, तब वोडयार ने उनसे आसानी से एक समझौता कर लिया था। प्रसिद्ध इतिहासकार बी मुदाचारिया ‘द मैसूर मुगल रिलेशंस 1686-87’ नामक किताब में लिखते हैं, “एकोजी ने तंजौर में अपनी राजधानी स्थापित की थी। मराठा आर्थिक तौर पर कमजोर थे, इसलिए वो बेंगलोर पर हो रहे बार-बार के आक्रमण की वजह से उसे अधिक समय तक अपने साथ नहीं रख सकते थे। इसलिए एकोजी ने बेंगलोर को बेचने का फैसला कर लिया था। बाद में इस मराठा शासक ने बोडयार के साथ डील पक्का कर लिया और तब तीन लाख रुपये में बेंगलोर को वोडयार को बेच दिया गया था। जब हस्तांतरण का प्रक्रिया चल रही थी, तभी खासिम खान के नेतृत्व में मुगल सेना ने बेंगलोर पर अपना कब्जा जमा लिया और 10 जुलाई 1687 को उस पर अपना झंडा फहरा दिया।”

मुदाचारिया लिखते हैं, “जब मराठा शासकों ने मुगल से बदला लेना चाहा, तब वोडयार बेंगलोर की दीवार के आगे मुगलों की तरफ से आ खड़े हुए। वोडयार ने तब सोचा होगा कि उनकी शायद यह पहल मुगलों को पसंद आएगी और उन्हें वो मदद करेंगे। हालांकि जो डील वोडयार ने मराठा शासकों से की थी वो अब मुगलों से करनी पड़ी। इस साल जुलाई में बेंगलोर की बिक्री के 330 साल पूरे हो रहे हैं।”

वोडयार के देहांत के बाद मैसूर के सेनापति हैदर अली ने इस पर 1759 में अधिकार कर लिया। इसके बाद हैदर-अली के पुत्र टीपू सुल्तान, जिसे लोग शेर-ए-मैसूर के नाम से जानते हैं, ने यहाँ 1799 तक राज किया जिसके बाद यह अंग्रेजों के अघिकार में चला गया। यह राज्य 1799 में चौथे मैसूर युद्ध में टीपू की मौत के बाद ही अंग्रेजों के हाथ लग सका। मैसूर का शासकीय नियंत्रण महाराजा के ही हाथ में छोड़ दिया गया, केवल छावनी क्षेत्र (कैंटोनमेंट) अंग्रेजों के अधीन रहा। ब्रिटिश शासनकाल में यह नगर मद्रास प्रेसिडेंसी के तहत था। मैसूर की राजधानी 1831 में मैसूर शहर से बदल कर बंगलौर कर दी गई।

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