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रघुवर दास को दोहरा झटका: बीजेपी सांसद ने अपनी ही सरकार के बिल का किया विरोध, गवर्नर ने भी बिना साइन किए लौटाया

नेता विपक्ष हेमंत सोरेन ने कहा कि बीजेपी सरकार अपनी आदिवासी विरोधी मानसिकता के साथ आगे बढ़ती है, तो हम अपने आंदोलन को तेज करेंगे।
राज्यपाल ने टिप्पणी की है कि एक्ट में संशोधन से आदिवासी समुदाय को किस प्रकार लाभ पहुंचेगा। (File Photo: PTI)

झारखंड की राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने छोटानागपुर काश्तकारी (सीएनटी) और संथाल परगना काश्तकारी (एसपीटी) अधिनियम संशोधन विधेयक को बिना साइन किए रघुवर दास सरकार के पास वापस भेज दिया है। यह रघुवर दास सरकार को झटका है। मुख्य सचिव राजबाला वर्मा ने बिना साइन किया हुआ विधेयक प्राप्त कर लिया है। राज्यपाल ने टिप्पणी की है कि एक्ट में संशोधन से आदिवासी समुदाय को किस प्रकार लाभ पहुंचेगा। झारखंड विधानसभा में पिछले नवंबर में इसे पारित किया गया था। सचिवालय के एक सीनियर आईएएस अधिकारी ने द टेलीग्राफ को बताया कि राज्यपाल ने एक सप्ताह पहले पूछताछ के साथ विधेयक को मुख्य सचिव के कार्यालय में वापस भेज दिया था। बीजेपी के खूंटी से सांसद करिया मुंडा ने अपनी ही सरकार के बिल का खुलकर विरोध किया है। करिया मुंडा पूर्व केंद्रीय मंत्री भी रह चुके हैं। उन्होंने कहा मैं सरकार के बिल में सशोधन का विरोध करता हूं क्योंकि वह आदिवासी हित में नहीं हैं।

नेता विपक्ष हेमंत सोरेन ने इस संशोधन को कठोर बताया है। उन्होंने कहा यदि बीजेपी सरकार अपनी आदिवासी-विरोधी मानसिकता के साथ आगे बढ़ती है, तो हम अपने आंदोलन को तेज करेंगे। जेवीएम प्रमुख बाबूलाल मरांडी ने कहा कि सरकार को कॉर्पोरेट के फायदे के बजाय जनता के फायदे के लिए काम करना चाहिए। पिछले सात महीनों से दास सरकार कह रही है कि बिल आदिवासी गढ़ में विकास के पहियों को गति देगा। सरकार ने एसपीटी अधिनियम की धारा 13 और सीएनटी अधिनियम की धारा 21 के तहत विधेयक में संशोधक का प्रस्ताव रखा था।

धारा 21 में जमीन की प्रकृति बदल कर इसका गैर कृषि कार्य में उपयोग का प्रावधान प्रस्तावित था, लेकिन जमीन का मालिकाना हक आदिवासी के पास ही रहेगा। इस संशोधन के तहत प्रावधान था कि जमीन को जिस उद्देश्य से लिया गया है अगर पांच साल तक उसका उपयोग उसी काम में नहीं किया गया तो जमीन अपने आप जमीन के मालिक के पास चली जाएगी। विपक्ष ने जनजातियों और मूल बसने वालों की कीमत पर उद्योगपतियों को खुश करने के लिए विधेयकों को सत्ताधारी शासन का एक हिस्सा बताया है। विपक्ष का कहना है कि एक बार जमीन अगर कॉर्पोरेट के इस्तेमाल के लिए चली गई तो उसे वापस लेना आसान नहीं होगा।

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