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मृणाल वल्लरी की रिपोर्टः खूनी चीनी मांझे पर लगाम

पंद्रह अगस्त की शाम 6:30 बजे रानी बाग में नन्ही सांची गोयल अपने माता-पिता के साथ फिल्म देखकर लौट रही थी। वह कार की छत की खिड़की (रूफ विंडो) से बाहर देख रही थी। हंसती-खिलखिलाती बच्ची अचानक मां की गोद में गिरी तो उसका गला कटा हुआ था।
Author नई दिल्ली | August 17, 2016 04:33 am
पतंगे बेचता दुकानदार

पंद्रह अगस्त की शाम 6:30 बजे रानी बाग में नन्ही सांची गोयल अपने माता-पिता के साथ फिल्म देखकर लौट रही थी। वह कार की छत की खिड़की (रूफ विंडो) से बाहर देख रही थी। हंसती-खिलखिलाती बच्ची अचानक मां की गोद में गिरी तो उसका गला कटा हुआ था। तिलक नगर में जगतपुरी फ्लाइओवर के पास रूफविंडो से ही बाहर देख रहे चार साल के हैरी का गला भी चीनी मांझे ने रेत दिया। विकासपुरी में मोटरसाइकिल सवार 22 साल के जफर खान की मौत मांझे से गला कट जाने के कारण हुई। वहीं मोटरसाइकिल चला रहे पुलिस उपनिरीक्षक मनोज कुमार मांझा फंसने से बुरी तरह घायल हो गए। मंगलवार की सुबह तक चांदनी चौक स्थित जैन धमार्थ पक्षी अस्पताल में चीनी मांझे से घायल 350 से ज्यादा परिंदे लगाए गए। उसके पहले 15 अगस्त की रात तक कई पक्षी दम तोड़ चुके थे। और इन सबके बाद आप सरकार की चुप्पी टूटी और मंगलवार को चीनी मांझे पर प्रतिबंध लगाया गया। वैसे दिल्ली के उपराज्यपाल ने तो राजधानी में 9 अगस्त को ही इस पर रोक लगाने की फाइल को अपनी मंजूरी दे दी थी। लेकिन दिल्ली सरकार ने इसे रोक कर रखा। आरोप है कि सरकार ने उन कारोबारियों को राहत देने के लिए ऐसा किया जो लाखों रुपए के चीनी मांझे की खरीदारी कर चुके थे।

चीनी मांझे पर अदालत, कारोबारियों की और मीडिया में जताई गई आशंका सच साबित हो गई। सरकार के अलावा हर कोई खतरे को भांप चुका था। लेकिन सरकार 15 अगस्त तक सोती रही। चांदनी चौक के कारोबारी मनीष कुमार दिल्ली सरकार के रवैए पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि जब सरकार बाहर से आए आपत्तिजनक उत्पादों को नहीं रोक पा रही है तो वह उन घरेलू सामानों पर कैसे रोक लगाएगी जो आम लोगों के लिए नुकसानदेह है। पूरे चांदनी चौक के कारोबारी पंद्रह अगस्त के पहले भी इससे होने वाले खतरों और आर्थिक नुकसान के नजरिए से दिल्ली सरकार से इसे फौरन प्रतिबंधित करने की मांग कर रहे थे।

मनीष कुमार कहते हैं कि सरकार को न तो लोगों की जान की परवाह है न आर्थिक नुकसान की। एक तरफ हम मेक इन इंडिया की बात करते हैं दूसरी तरफ चीनी मांझे पर भी नहीं रोक लगा पा रहे हैं। हमारे यहां सूती धागे बनते हैं। इसका उत्पादन भी कम स्तर पर होता है और यह गले में फंसता भी है तो टूट जाता है। लेकिन चीन में बड़े कारखानों में तैयार किए गए नायलॉन के धागे में कांच और लोहे के टुकड़े लगाए जाते हैं जो खींचने पर फैलते हैं और गला तक काट देते हैं। इसके साथ ही चीनी मांझे देसी धागों के मुकाबले बहुत ही सस्ते होते हैं इसलिए लोग उसे ही खरीदना पसंद करते हैं। सरकार अगर पहले जाग जाती तो इतने लोगों की जान नहीं जाती। सड़क पर उड़ते इन कातिल धागों से हुए मौतों की जिम्मेदारी कौन लेगा?

इसके पहले 13 अगस्त को हाई कोर्ट ने दिल्ली सरकार और नागरिक संस्थाओं से कहा था कि वह चीनी मांझे को लेकर दिशानिर्देश जारी करे। चीफ जस्टिस जी रोहिणी और जस्टिस संगीता ढींगढ़ा सहगल की बेंच ने पुलिस कमिश्नर को इस बाबत कदम उठाने के निर्देश दिए थे कि कोई अनहोनी रोकी जाए। इसके पहले हाई कोर्ट ने दिल्ली सरकार से पूछा था कि वह चीनी मांझे पर प्रतिबंध लगाने के लिए क्या कर रही है। जुल्फिकार हुसैन ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर आरोप लगाया था कि चीनी मांझे का शिकार पहले पक्षी हुआ करते थे अब इंसानों को भी इससे खतरा है। अदालत को बताया गया था कि चीनी मांझे पर प्रतिबंध लगाने संबंधी इसी किस्म की याचिका सुप्रीम कोर्ट के सामने भी आई थी। सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि चूंकि यह मुद्दा पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण से संबंधित है, इसलिए ऐसे मसलों में फैसला राष्ट्रीय हरित अधिकरण के दायरे में आता है। आप सरकार ने कहा था कि वह चीनी मांझे पर प्रतिबंध लगाने के लिए अधिसूचना जारी करने की तैयारी कर रही है। लेकिन वह 15 अगस्त के पहले ऐसा नहीं कर पाई।

गौरतलब है कि राजस्थान हाई कोर्ट ने चीनी मांझे के इस्तेमाल और बिक्री को प्रतिबंधित कर दिया है और इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नवंबर 2015 में इसके उत्पादन, बिक्री और इस्तेमाल पर पूरे उत्तर प्रदेश में प्रतिबंध लगा दिए थे। महाराष्टÑ और आंध्र प्रदेश में भी इस किस्म के मांझे पर रोक है। कर्नाटक सरकार भी चीनी मांझे पर रोक लगा चुकी है। इतने उदाहरणों के बावजूद दिल्ली सरकार 15 अगस्त को होने वाले हादसों का इंतजार करती रही और मौतों पर उठे सवाल के बाद चीनी मांझे पर प्रतिबंध लगाया।

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