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सुमन केशव सिंह की रिपोर्टः नाक बचाने के लिए खिलाड़ियों की तलाश

भारत अगले साल फीफा वर्ल्ड कप अंडर 17 की मेजबानी करने जा रहा है। और इसके लिए उसे तलाश है खिलाड़ियों की।
Author नई दिल्ली | August 20, 2016 02:12 am
साक्षी मलिक पहली भारतीय महिला पहलवान हैं जिन्होंने ओलंपिक में पदक जीता है।

भारत अगले साल फीफा वर्ल्ड कप अंडर 17 की मेजबानी करने जा रहा है। और इसके लिए उसे तलाश है खिलाड़ियों की। जरा याद करें कि 1950 में भारत ब्राजील में फुटबॉल विश्व कप के लिए क्वालीफाई तो कर गया था लेकिन खेल नहीं पाया था। इसकी एक वजह बताई गई थी कि फुटबॉल खेलने के लिए खास तरह के जूते पहनने पड़ते थे, लेकिन भारतीय खिलाड़ियों को नंगे पांव खेलने की आदत थी। पचास और साठ के दशक में दुनिया में फुटबॉल में खासी पहचान रखने वाले भारत ने कभी इसके विकास पर ध्यान नहीं दिया। गांवों और गरीबों का खेल फुटबॉल मैदानों से ‘गोल’ कर दिया गया। सुनहरा अतीत गंवा आज भारत अपनी नाक बचाने के लिए खिलाड़ियों की तलाश कर रहा है।

80 के दशक के बाद से फुटबॉल को आखिरी सांस लेने के लिए छोड़ दिया गया। लेकिन अब जब फीफा वर्ल्ड अंडर 17 कप को मुश्किल से बहुत कम समय बचे तो अचानक स्पोर्ट्स अथॉरिटी आॅफ इंडिया को फुटबॉलरों की याद आई। मौजूदा समय में भारत के पास अंडर-17 के लिए ऐसा एक भी खिलाड़ी नहीं जो दुनिया की दिग्गज टीमों को टक्कर दे सके। खेल से जुड़े आलाकमान भले ही बांग्लादेश, पाकिस्तान, भूटान जैसी टीमों के साथ खेल कर अपनी पीठ थपथपा लें, लेकिन हकीकत यह है कि अर्जेंटीना, इटली, जर्मनी, फ्रांस, स्पेन और ब्राजील की टीमों के बगैर फुटबॉल अधूरा है और इन टीमों के आगे हम कहीं नहीं टिकते। खेल के जानकारों का कहना है कि इस लिहाज से उनके आगे हमारी तैयारी शून्य है।

प्राधिकरण से जुड़े अधिकारी का कहना है कि खेल पर राजनीति हावी है। जिसे खेलों की कोई समझ नहीं उन्हें उसके संरक्षण का जिम्मा सौंप दिया गया है। आॅल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन के अध्यक्ष प्रफुल्ल पटेल के काम पर सवाल उठाते हुए कहा कि ऐसे लोगों की वजह से भारतीय फुटबॉल का यह हाल हुआ है। देश भर में होने वाले 30 से अधिक फुटबॉल टूर्नामेंट खत्म कर दिए गए। इन छोटे टूर्नामेंटों से बड़े फुटबॉलर निकला करते थे। उनसे मैदान छीन लिए गए। फुटबॉल मैदानों को शादी, ब्याह जैसे समारोहों के लिए किराए पर दिया जाने लगा।

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