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कश्मीरी नेता मीरवाइज फारूक ने की पत्थरबाजों की तरफदारी, कहा- सरकार के कारण हुए पत्थर उठाने पर मजबूर

फारुक ने कहा कि कॉलेज और विश्विद्यालय को छोड़ दें तो स्कूलों में भी अभिव्यक्ति की आज़ादी पर ब्लेंकिट बैन लगा दिया गया है।
कश्मीरी छात्र अपने विचारों का स्वतंत्रता के साथ आदान-प्रदान तक नहीं कर सकता। (AP Photo/Mukhtar Khan)

कश्मीर घाटी में पत्थरबाजों की तरफदारी करते हुए हुर्रियत नेता मीरवाइज उमर फारुक ने कहा कि राज्य की मुफ्ती सरकार ने कश्मीरी छात्रों को पत्थर उठाने के लिए मजबूर किया है। फारुक ने कहा कि सरकार की नीतियों के खिलाफ यह छात्रों का गुस्सा दिखाने का तरीका है। उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा छात्रों की अभिव्यक्ति की आज़ादी छीनी जा रही है और यह मुख्य कारण है कि शिक्षण संस्थानों के छात्र कश्मीर में इस प्रकार अपना विरोध प्रदर्शन जता रहे हैं। गुरुवार को एक सेमिनार में छात्रों को संबोधित करते हुए फारुक ने कहा कि कश्मीरी छात्र अपने विचारों का स्वतंत्रता के साथ आदान-प्रदान तक नहीं कर सकता। यहां के छात्रों के लिए सक्रियता मानों जैसे एक सपना सा बनकर रह गया है।

इसके बाद फारुक ने कहा कि कॉलेज और विश्विद्यालय को छोड़ दें तो स्कूलों में भी अभिव्यक्ति की आज़ादी पर ब्लेंकिट बैन लगा दिया गया है। मीरवाइज ने कहा कि पूरे कश्मीर के कॉलेजों, विश्विद्यालयों और स्कूलों के छात्र संघ को पुनर्जिवित करने की जरूरत है, ताकि छात्र अपने अधिकारों के लिए लड़ सकें और अपने विचारों को सबके सामने बिना डरे रख सकें। फारुक ने कहा कि कश्मीर में जो अस्थिरता की स्थिती बनी है वह राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक प्रतिबंध और बैन के कारण बनी है। फारुक ने कहा कि घाटी के जो हालात है वह इन सभी कारणों की वजह से हैं। इन्हीं कारणों की वजह से लोगों के आंदोलन को दबा दिया जाता है। उन्होंने कहा कि सरकार के लिए शिक्षण संस्थानों के छात्र सबसे कमजोर निशाना होते हैं।

यह बहुत ही निंदनीय है कि सरकार छात्रों के साथ ऐसा बर्ताव करती है कि जैसे वह राज्य के दुश्मन हैं। छात्रों के खिलाफ सरकार ऐसे कदम उठाती हैं जो कि किसी भी सरकार के लिए शोभा नहीं देता है। इससे पहले मीरवाइज ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया था कि घाटी में ‘जमीनी हकीकत पर पर्दा डालकर’ वह देश के लोगों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के आंखों में धूल झोंकने का प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा था कि, ‘वे दावा कर रहे हैं कि कुछ लोग गुमराह हैं। अगर ऐसा मामला है तो जनमत संग्रह कराने का उनके पास बड़ा अवसर है और देखें कि कश्मीर के लोग क्या चाहते हैं।’

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