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दोषी की रिहाई पर निर्भया के माता-पिता ने कहा, देर से शुरू हुर्इं कोशिशें

केंद्र और दिल्ली सरकार की भूमिका पर सवाल खड़ा करते हुए 16 दिसंबर के सामूहिक बलात्कार कांड की पीड़िता के माता-पिता ने कहा है कि घटना के किशोर दोषी की रिहाई रोकने की कोशिश पहले क्यों नहीं की गई..
Author नई दिल्ली | December 21, 2015 05:44 am
किशोर दोषी की रिहाई के खिलाफ प्रदर्शन करने के बाद पुलिस हिरासत में निर्भया की मां। (पीटीआई फोटो)

केंद्र और दिल्ली सरकार की भूमिका पर सवाल खड़ा करते हुए 16 दिसंबर के सामूहिक बलात्कार कांड की पीड़िता के माता-पिता ने कहा है कि घटना के किशोर दोषी की रिहाई रोकने की कोशिश पहले क्यों नहीं की गई। वहीं इस दोषी किशोर की रिहाई को लेकर महिला अधिकार कार्यकर्ताओं की राय बंटी हुई है। किशोर की रिहाई का विरोध करते हुए पीड़िता की मां ने कहा, ‘हमारी लड़ाई केवल इस बारे में है कि उसे (दोषी किशोर) रिहा नहीं किया जाना चाहिए। अगर वह बाहर आएगा तो सुनवाई (सुप्रीम कोर्ट) का या अन्य किसी चीज का क्या मलतब है।’ उन्होंने कहा, ‘सब जानते थे कि उसे रिहा किया जाएगा तो इन तीन सालों में कदम क्यों नहीं उठाए गए। मैं न्याय चाहती हूं और उसकी रिहाई पर रोक चाहती हूं।’

इससे पहले दिल्ली महिला आयोग ने शनिवार देर रात किशोर दोषी की रिहाई पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। देर रात दो बजे अपने फैसले में अवकाशकालीन पीठ ने तत्काल सुनवाई कर रविवार को होने वाली उसकी रिहाई पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। अब इस मामले की अगली सुनवाई सोमवार को होगी।

दोषी किशोर की रिहाई के मुद्दे पर केंद्र और दिल्ली सरकार के असहाय दिखने पर पीड़िता के पिता ने भी नाखुशी जताई। उन्होंने कहा, ‘हम क्या कर सकते हैं? अदालत जो कर रही है, सही है। हमारी सरकार, चाहे केंद्र की हो या राज्य की, केवल तभी सुनती हैं जब आप विरोध करते हो और वे लाठीचार्ज कराती हैं, इसके अलावा उन्हें कोई चिंता नहीं है। हालांकि अगर इस मामले में उचित सुनवाई या फैसला किया गया होता तो हमें यह दिन नहीं देखना पड़ता।’

किशोर की रिहाई के खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दाखिल करने वाले भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने उन प्रावधानों की ओर संकेत किया जिन्हें किशोर दोषी को औपचारिक तौर पर छोड़े जाने से पहले लागू किया जाना था। स्वामी ने कहा, ‘किशोर न्याय कानून के नियमों के मुताबिक वह किशोर न्याय बोर्ड की हिरासत से छूट सकता है। लेकिन उसे तब तक आजाद व्यक्ति के तौर पर रिहा नहीं किया जा सकता, जब तक इस उद्देश्य से नियुक्त प्रबंधन समिति यह फैसला नहीं कर लेती कि वह मानसिक रूप से दुरुस्त है या नहीं, उसे सामाजिक रूप से मुख्य धारा में शामिल किया गया है या नहीं और क्या उसमें सुधार हुआ है।’ उन्होंने कहा,‘उसे यह स्पष्टीकरण दिए जाने तक छोड़ा नहीं जा सकता। नियमों के मुताबिक उनके पास इस बारे में निर्णय लेने के लिए दो साल तक का समय है।’

वहीं भाजपा प्रवक्ता नलिन कोहिली ने कहा कि यह एक सामाजिक और कानूनी मुद्दा है। राजनीति का विषय नहीं है। उन्होंने कहा कि लोग कानून की सीमाओं को लेकर चिंतित हैं। उन्होंने कहा, ‘मामला लंबित है क्योंकि कानून में संशोधन की बात है लेकिन राज्यसभा द्वारा मंजूर नहीं किए जाने की वजह से इसे अंतिम रूप नहीं दिया गया है।’ कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने दिल्ली सरकार और दिल्ली महिला आयोग पर इस विषय को लेकर राजनीति करने का आरोप लगाया।

रिहाई पर महिला अधिकार कार्यकर्ताओं की राय बंटी:

अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला संगठन (एआइपीडब्लूए) की सचिव कविता कृष्णन ने कहा, ‘16 दिसंबर 2012 को जो कुछ हुआ वह काफी दुर्भाग्यपूर्ण था। लेकिन इस बात पर गौर करना काफी अहम है कि ऐसे किशोर वयस्कों द्वारा इस्तेमाल किए जाते हैं।’ कविता ने कहा, ‘मेरा मानना है कि लड़के को जिंदगी जीने का एक और मौका मिलना चाहिए।’ उन्होंने कहा, ‘कानून का पालन किया जाना चाहिए। कानून के मुताबिक, 18 साल से कम उम्र के किसी लड़के को जेल नहीं भेजा जाता। उसे तीन साल तक सुधार गृह में रखा गया। यहां तक कि हाई कोर्ट ने भी कहा कि कानून का पालन किया जाना चाहिए।’

वहीं किशोर की रिहाई के खिलाफ मुहिम चला रही आइसा कार्यकर्ता सुचेता डे ने कहा, ‘मैं सभी से अपील करती हूं कि तथ्यों पर विचार करें और ऐसे असल मुद्दों को समझें जिनसे बलात्कार के मामलों में संघर्ष करना पड़ता है।’ सुचेता ने कहा, ‘ऐसी ज्यादातर शिकायतकर्ताओं को इंसाफ दिलाने में यह व्यवस्था नाकाम रही है जो बलात्कार के नए कानूनों के तहत इंसाफ मांगने के लिए आगे आए।’ उन्होंने कहा, ‘इसके बावजूद व्यवस्था चलाने वाले मौजूदा कानूनों को लागू करने और हर मामले में इंसाफ सुनिश्चित करने की बजाय एक और कड़े कानून की तरफ ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहे हैं।’

देश की महिलाओं के लिए इसे एक दुखद दिन करार देते हुए कार्यकर्ता रंजना कुमारी ने कहा कि कुछ मामलों में कानून में अपवाद कायम करने में कुछ भी गलत नहीं है। सेंटर फॉर सोशल रिसर्च की निदेशक रंजना ने कहा, ‘किसी महिला का बलात्कार और उसकी हत्या किशोर अपराध नहीं है। यदि मामला अपवाद जैसा था तो कानून में भी अपवाद कायम किया जाना चाहिए। देश की महिलाओं के लिए यह बहुत दुखद दिन है।’

भारतीय राष्ट्रीय महिला संगठन की महासचिव एनी राजा ने कहा कि किशोर को ‘नरम सजा’ दी गई है। उसकी रिहाई से तय किया गया उदाहरण ऐसे अपराधों में बाधक का काम नहीं करेगा जिस तरह के अपराध को उसने अंजाम दिया है। एक अन्य कार्यकर्ता आभा सिंह ने कहा, ‘किशोर न्याय कानून की धारा 15 कहती है कि किसी भी किशोर को तीन साल से ज्यादा की सजा नहीं दी जा सकती।’ उन्होंने कहा, ‘चाहे उसने हत्या की हो या बलात्कार किया हो। यदि कानून बदल भी दिया जाता है तो यह आरोपी रिहा होगा क्योंकि पिछली तारीख से आपराधिक कानून लागू नहीं किया जा सकता।’

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