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बच्चों को कथक के बारे में बताना आसान: गीतांजलि

भारतीय कलाओं और कलाकारों को समर्पित स्पिक मैके के 40 साल पूरे हो गए हैं। इस वर्ष स्पिक मैके का अंतरराष्ट्रीय समागम राजधानी दिल्ली के आइआइटी परिसर में हुआ।

भारतीय कलाओं और कलाकारों को समर्पित स्पिक मैके के 40 साल पूरे हो गए हैं। इस वर्ष स्पिक मैके का अंतरराष्ट्रीय समागम राजधानी दिल्ली के आइआइटी परिसर में हुआ। इस क्रम में परिसर के सेमिनार कक्षों में कार्यशालाओं का आयोजन किया गया। कार्यशाला में सत्रीय, भरतनाट्यम, कथक, ओडिशी, मोहिनीअट्टम, कुचिपुडी नृत्योंं का प्रशिक्षण दिया गया। सेमिनार हॉल में हुए कार्यक्रम में युवाओं ने नृत्य पेश किया। युवाओं ने कथक नृत्यांगना गीतांजलि लाल, प्रेरणा श्रीमाली, पंडित मुन्ना शुक्ला और राजेंद्र गंगानी से सीखे नृत्य को प्रस्तुत किया।

गुरु गीतांजलि लाल ने गणेश वंदना ‘प्रथम सुमिर श्रीगणेश गारीसुत प्रिय महेश’ को नृत्य में पिरोया था। इसमें शिव व पार्वती के रूप को दर्शाने के साथ गणेश के भावों को कलाकारों ने पेश किया। इसमें टुकड़े, तोड़े, तिहाइयां व तत्कार को भी समाहित किया गया था। इस संदर्भ में गुरु गीतांजलि लाल बताती हैं कि स्पिक मैके की कार्यशाला में अलग-अलग प्रदेशों के बच्चे आते हैं। इनमें से ज्यादातर को किसी भी शास्त्रीय नृत्य या संगीत का ‘क-ख’ भी मालूम नहीं होता है। वे बहुत उत्सुकता से नृत्य सीखने और इसके बारे में जानने की कोशिश करते हैं। मुझे लगता है कि जो कुछ नहीं जानते वह कॉपी के सादे पन्ने की तरह होते हैं। इसलिए, उन बच्चों को कथक के बारे में बताना आसान होता है।

गीतांजलि लाल कथक सिखाने के क्रम में आगे बताती हैं कि दरअसल, चार-पांच दिन की कार्यशालाओं के दौरान वे कथक के बारे में प्रारंभिक जानकारी देती हैं। जैसे वे युवाओं को कथक के थाट यानी खड़े होने या चलन का अंदाज बताती हैं। नृत्य के लिए ही नहीं आमतौर पर कहीं भी सही तरीके से खड़ा होना या चलना बहुत महत्वपूर्ण होता है। इसलिए, जब भी आप खड़े हों सीधे, अपने शरीर का भार पंजे पर और गर्दन सीधी करके खड़े हों। इससे आप में सौम्यता और आत्मविश्वास नजर आता है।

चार-पांच साल से गीतांजलि स्पिक मैके से जुड़ी हैं। वह कहती हैं कि कथक या कोई भी शास्त्रीय नृत्य सिर्फ एक नृत्य भर नहीं है। वह आपको पोशाक पहनने से लेकर बातचीत करने तक के संस्कारों से परिचित करवाता है। जैसे इन दिनों योग की धूम मची हुई है। जबकि, शास्त्रीय नृत्य की भंगिमाएं तो योग ही हैं। इसमें अंगों की भाषा के साथ संगीत के लय-ताल जुड़ जाते हैं। इससे तन और मन दोनों तरोताजा हो जाते हैं। जो इसकी जितनी साधना करता है, वह उसको उतना ही सफलता देती है। शास्त्र यानी नियम के अनुशासन में बंधे शास्त्रीय नृत्य का नाम सुनकर अक्सर युवा या किशोर वर्ग इससे दूर भागते हैं। पर इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है, जो कठिन या समझ में नहीं आए। बल्कि, शास्त्रीय नृत्य या कलाएं तो जीवन जीने का एक सलीका हैं।
जो इस सलीके को अपनाता है, उसका व्यक्तित्व सुंदर और आकर्षक बन जाता है। वह मानती हैं कि स्पिक मैके ने शास्त्रीय और लोक कलाओं को जन-जन तक पहुंचाने का काम किया। स्कूल कॉलेज में पढ़ने वाले बच्चों को देश के समृद्ध धरोहर से परिचित करवाना एक अच्छा प्रयास है। गीतांजलि लाल कहती हैं कि एक छत के नीचे अलग-अलग विधा के गुरुओं और कलाकारों को लाना एक असाधारण काम है। हम कलाकार तो अपनी साधना और कार्यक्रमों में ही व्यस्त रहते हैं। ऐसे में उसके साथ हमें इस तरह की कार्यशालाओं के जरिए युवाओं की सोच और मानसिकता से अवगत होने का भी अवसर मिलता है।

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