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हिमाचल चुनाव: बेचारे कौल

यह कैसी बेबसी हो गई राजनीति के इस बड़े ठाकुर की जो मुख्यमंत्री के दावेदार रहे हैं।
Author November 7, 2017 05:07 am
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ प्रेम कुमार धूमल। (File Photo/Facebook)

…बेचारे कौल

सरकार में वरिष्ठ मंत्री रहे ठाकुर कौल सिंह को चुनाव में इतने बुरे दिन भी देखने पड़ेंगे यह उन्होंने क्या किसी ने भी नहीं सोचा होगा। इस बार उन्होंने अपने द्रंग क्षेत्र में इतने काम किए कि इतने उन्होंने 1977 से राजनीति में रहते हुए कभी नहीं किए। अब चुनाव आए तो विकास के दम पर वोट का हक तो उनका बनता ही है मगर सारी खेल ही उल्टा पड़ता जा रहा है। पहले राहुल गांधी ने सात अक्तूबर को मंडी की रैली में राजा को अगला सीएम घोषित करके बंटाधार कर दिया। कौल सिंह इस बार आखिरी चुनाव के लिए वोट मांगने के साथ साथ सीएम बनने का कार्ड भी खेलने वाले थे जो हाथ से निकल गया। दूसरी तरफ चेले पूर्ण ने टांग अड़ा रखी है और अब रही सही कसर पंडित सुखराम पूरी कर रहे हैं। सुखराम के बेटे अनिल को मंडी सदर से कौल की बेटी चंपा ने धुआं दे रखा है तो अब इसका बदला सुखराम द्रंग में जाकर कौल को धुआं देने में लगे हैं। अब कौल सिंह अपने ही क्षेत्र में ऐसे फंस गए हैं कि न तो अपनी बेटी के लिए ही समय निकाल पा रहे हैं और न अपने दूसरे चेलों जैसे पवन ठाकुर सरकाघाट, लाल सिंह नाचन व जीवन ठाकुर जोगिंदरनगर से चुनाव मैदान में हैं उनके लिए ही समय निकाल पा रहे हैं। यह कैसी बेबसी हो गई राजनीति के इस बड़े ठाकुर की जो मुख्यमंत्री के दावेदार रहे हैं। अब यह भी कह चुके हैं कि आखिरी चुनाव है, कहीं पीठ लग गई तो ऐसी विदाई से भगवान ही बचाए।

वफादारी का लिहाज

शिमला (ग्रामीण) विधानसभा हलके में जंग मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के पुत्र और पुराने वफादार के बीच है। इसीलिए जुबानी युद्ध बहुत संभल कर हो रहा है। यहां से भाजपा उम्मीदवार प्रमोद शर्मा (50) कभी वीरभद्र सिंह की उंगली पकड़ कर राजनीति में आए थे और फिर सालों तक उनकी जीत के लिए पसीना बहाते रहे हैं। शायद उनकी इसी मेहनत का ही नतीजा है कि पुत्र की जीत के लिए दिन-रात एक कर रहे मुख्यमंत्री अपने किसी भी बयान या जनसभा में शर्मा के खिलाफ बोलने से गुरेज ही करते हैं। हालांकि विक्रमादित्य प्रमोद शर्मा के खिलाफ बोलते समय कोई लिहाज नहीं करते। निजी आरोप लगाने में भी कोई कसर बाकी नहीं रख रहे। दूसरी तरफ प्रमोद शर्मा भले ही भाजपा के लिए वोट मांगने मैदान में निकले हैं, पर पुरानी वफादारी के खातिर वह वीरभद्र सिंह या विक्रमादित्य के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोलते। मतदाताओं के पास जाकर भी यही कहते हैं ‘आप मुझे वोट दें। मैं हमेशा आप लोगों के साथ खड़ा रहूंगा।’ शर्मा के लिए यह हलका काफी जानापहचाना है। इससे पहले वह दो बार कांग्रेस टिकट पर कुमारसेन हलके से अपनी किस्मत आजमा चुके हैं और उसी हलके का काफी हिस्सा अब शिमला (ग्रामीण) विधानसभा क्षेत्र में है। अब देखना तो यह कि यहां के मतदाता नए नवेले टिक्का साहिब (विक्रमादित्य) के साथ जाते हैं या फिर केसरिया पार्टी के टिकट पर संयम बरत रहे प्रमोद शर्मा को विजय से नवाजते हैं।

सोशल मीडिया पर दारोमदार

इस बार चुनाव आयोग ने एक उम्मीदवार के लिए 28 लाख रुपए का खर्चा रखा है मगर यह कड़वा सच है कि गंभीर उम्मीदवार के लिए यह राशि कुछ भी नहीं है। विधानसभा के पूर्व प्रत्याशियों के दावे पर विश्वास करें तो अब एक चुनाव में खर्चा करोड़ रुपए तक जा पहुंचता है। बिना रिकार्ड का लेनदेन प्रचार के लिए खूब होने लगा है जो चुनाव आयोग द्वारा जिला व उपमंडल स्तर पर गठित समितियां पकड़ नहीं पाती। यदि यह कहा जाए कि इस बार का चुनाव सोशल मीडिया के दम पर ज्यादा लड़ा जा रहा है जो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। सोशल मीडिया पर सच झूठ, उल्टा पुल्टा, टेढ़ा मेढ़ा, उटपटांग, उल जलूल सब परोसा जा रहा है। इस पर कोई रोक नहीं है। झूठी सूचनाएं, खबरें, जानकारी यानि फेक न्यूज व कटिंग पेस्टिंग से सोशल मीडिया भरा हुआ है। इसमें आधा सच आधा झूठ जमकर चल रहा है। अपने अपने नेता के समर्थन में नारे लिखे जा रहे हैं, उस पर सीधे उल्टे कमेंट भी हो रहे हैं, लगभग सभी नेता सोशल मीडिया का प्रयोग कर रहे हैं। हर कार्यक्रम के फोटो तुरंत व्हाट्सअप व फेस बुक पर लोड हो जाते हैं। नेताओं ने कुछ खास लोग इसी काम के लिए रखे हैं जो इस फ्री सेवा का जमकर प्रयोग कर रहे हैं। जहां तक चुनावी शोर की बात है कि क्षेत्र में इक्का दुक्का वाहन ही दिन के लाउड स्पीकर लगाकर प्रचार कर रहे हैं। अधिकांश नेताओं ने चुनाव प्रचार के लिए गीत बना रखे जिन्हें पेन ड्राइव के माध्यम से वाहनों के अंदर लगाकर चलाया जा रहा है। ऐसा नहीं है चुनाव में पैसा खर्च नहीं हो रहा है। पैसा पहले से कई गुणा ज्यादा लग रहा है मगर उसका तरीका बदल गया है। इस तरीके का तोड़ अभी तक चुनाव आयोग के पास शायद नहीं है।

अकेले लड़ रहे हैं सुक्खू

नादौन विधानसभा क्षेत्र में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुखविंदर सिंह सुक्खू प्रधानी के बावजूद अकेले ही चुनाव प्रचार में जुटे हैं। मुख्यमंत्री के साथ उनका शुरू से ही 36 का आंकड़ा रहा है जोकि अभी भी 63 में नहीं बदल सका है। यही वजह है कि मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह पड़ोस में ही तीन हलकों में आकर प्रचार करके चले गए लेकिन अपने पार्टी अध्यक्ष के हलके पर निगाह तक नहीं डाली। इस हलके में लगाए गए कांग्रेस के पोस्टरों पर भी वीरभद्र सिंह का चित्र नहीं है। न ही सुक्खू किसी भी जनसभा या नुक्कड़ सभा में उनका जिक्र ही करते हैं। वह सिर्फ सोनिया गांधी और राहुल गांधी का जिक्र कर विकास के नाम पर वोट मांग रहे हैं। कहने वाले तो यह भी कह रहे हैं पिछली बार की तरह इस बार भी वीरभद्र सिंह ने सुक्खू को हराने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रखा है। देखते हैं मतदाता राजा का हुक्म बजाते हैं या ‘सेनापति की जीत में उनकी जीत’ वाली कहावत पर चलते हैं।

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