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ग्वाल पहाड़ी विवाद: अमिताभ कांत ने भी हरियाणा सरकार को लिखा था सिफारिशी पत्र, मामले को जल्द निपटाने के लिए कहा था

ग्वाल पहाड़ी की जमीन का मामला है जिसको लेकर हरियाणा की मनोहर लाल खट्टर सरकार को न सिर्फ विपक्ष वरन अपने लोगों से भी भारी विरोध झेलना पड़ रहा है।
हरियाणा सीएम मनोहर लाल खट्टर। साल 2015 में सीएम खट्टर ने गौसेवा आयोग का गठन किया था।

गुड़गांव के मेट्रो वैली प्रोजेक्ट को लेकर पिछले वर्ष फरवरी में केंद्रीय औद्योगिक नीति व संवर्धन विभाग के सचिव अमिताभ कांत ने भी हरियाणा सरकार को तीन पृष्ठ का एक पत्र लिख कर मामले को जल्दी निपटाने के लिए कहा था। इतना ही नहीं कांत ने 6 फरवरी को लिखे अपने पत्र में मुख्य सचिव दीपेंद्र सिंह ढेसी को मेट्रो वैली के प्रबंधकों से निजी मुलाकात करने की सिफारिश भी की ताकि वह उनको पूरा मामला समझा सकें।  ध्यान रहे यह वही ग्वाल पहाड़ी की जमीन का मामला है जिसको लेकर हरियाणा की मनोहर लाल खट्टर सरकार को न सिर्फ विपक्ष वरन अपने लोगों से भी भारी विरोध झेलना पड़ रहा है। प्रदेश के हाल ही के विधानसभा सत्र में भी विपक्ष ने इस मुद्दे पर सरकार को आड़े हाथों लिया था। सरकार हालांकि इस मामले पर पीछे हट चुकी है पर इसमें संलिप्त आला अफसरों पर सरकार की दयादृष्टि के चलते स्थितियां संदेहास्पद हैं। इस मामले में आदेश पारित करने वाले अफसर को सरकार ने प्रदेश के सबसे मलाईदार पद पर नियुक्त कर दिया है जिसके कारण सरकार खुद भी कटघरे में है। कहीं इसके पीछे सरकार की कमजोर नस तो नहीं है?
कांत ने अपनी चिट्ठी में मेट्रो वैली प्रोजेक्ट को ‘लैंडमार्क प्रोजेक्ट’ करार दिया है। ‘यह प्रत्यक्ष है कि यह एक ‘लैंडमार्क प्रोजेक्ट’ है जो हरियाणा को विश्व के नक्शे पर ले आएगा। इतना ही नहीं अपने वैज्ञानिक अनुसंधान प्री मार्केटिंग पहल के चलते यह प्रदेश को भारी विदेशी निवेश भी दिलवाएगा।’ कांत का पत्र इन्हीं पंक्तियों के साथ समाप्त हुआ। खास बात यह भी है कि कांत ने पत्र के शुरुआत में यह लिखा है कि मेट्रो वैली की तरफ से एक ज्ञापन प्राप्त हुआ जिसके चलते यह पत्र लिखा जा रहा है। सामान्य तौर पर ऐसे पत्र एक या दो पंक्ति के होते हैं। जिसमें यह होता है कि ज्ञापन पर गौर किया जाए। लेकिन कांत के पत्र पर प्रोजेक्टर कंपनी पर विस्तृत टिप्पणियां की गई हैं जिनमें उनको सराहा भी गया है।

पत्र में लिखा है कि मेट्रो वैली बिजनेस पार्क प्रा. लि. का आइटी एसईजेड जिसे केंद्र व राज्य सरकार को अधिसूचित करने के बाद आठ वर्ष पहले पोर्ट घोषित कर दिया गया था और जिसे 30 से ज्यादा प्रशासकीय स्वीकृतियां जैसे पर्यावरण और बिल्डिंग प्लान की मंजूरियां मिल चुकी हैं। ‘इनका (कंपनी) का दावा है कि उसमें ऐसा परिसरीय उल्लेखनीय अनुसंधान किया है जिसे अमेरिका की एक मुख्य प्रयोगशाला द्वारा ऊर्जा संरक्षण में एक नया वैश्विक मापदंड माना गया है। कंपनी की ओर से पेश किए गए दस्तावेजों से पता चलता है कि इस प्रोजेक्ट के महत्त्व पर उच्चस्तरीय भारत अमेरिका वार्ता में भी विचार किया गया।’ कांत ने पत्र की शुरूआत ही ऐसे की। कांत कंपनी के अपने प्रोजेक्ट की प्रस्तुति से भी प्रभावित दिखे। उनके पत्र में लिखा है कि ‘मेट्रो वैली में मेरे अधिकारियों के सामने ही प्रोजेक्ट का विवरण पेश किया था जो कि सचमुच बहुत प्रभावशाली है। दोनों मामलों में ऊर्जा संरक्षण और विदेशी निवेश लाने के लिए कंपनियों को आकर्षित करने में भी इस प्रोजेक्ट की मैरिट के बावजूद यह जमीन से जुड़े मामलों के चलते शुरू नहीं हो सका। जिनका कोई न्यायोचित आधार नहीं और जो कि गुड़गांव नगर निगम की ओर से खड़े किए गए। ऐसा तब हुआ जब राज्य सरकार ने इस जमीन को एसईजेड के लिए अधिसूचित कर दिया था।’ कांत कंपनी के तर्कों से पूर्ण सहमत दिखे लिहाजा उनके पक्ष में लिखा ‘मैं इस मामले में आपके (मुख्य सचिव) निजी हस्तक्षेप की प्रार्थना करता हूं ताकि आप तथ्यों की जांच का समय निकाल सकें और प्रोजेक्ट बेरोकटोक चल सके। इससे यह भी तय होगा कि अति उत्साही प्रशासनिक दबाव सरकार की नीतिगत पहल पर भारी नहीं पड़ेगा।’

किसको बचा रही सरकार

ग्वाल पहाड़ी मामले में हरियाणा सरकार सांसत में है। प्रदेश की पहली भारतीय जनता पार्टी सरकार भूमि सौदों व सीएलयू की धांधली के खिलाफ ठोस कार्रवाई का दावा करके ही प्रदेश की सत्ता पर काबिज हुई थी लेकिन इस मामले में सरकार विपक्ष को छोड़ भी दे तो अपनों के ही हमलों में घिर गई है। आखिर सरकार इस मामले में किसको बचाना चाहती है। यह तो तय है कि सरकार इस मामले में गर्दन तक आरोपों में डूबे अफसरों को नापने की बजाय उनको पुरस्कृत करने में जुटी है। जिस अधिकारी ने यह सारा तानाबना बुना, सरकार ने उसको ही अति संवेदनशील और महत्त्वपूर्ण पद पर बैठा दिया। खास बात यह है कि इसी विभाग को प्रदेश में सभी सीएलयू पर फैसला लेना होता है।

क्या है ग्वाल पहाड़ी विवाद

ग्वाल पहाड़ी गांव गुड़गांव-फरीदाबाद मार्ग पर स्थित है। पहाड़ी और वन क्षेत्र होने के कारण इसे इको सेंसटिव जोन भी माना जाता रहा है। नगर निगम में शामिल होने के बाद इस गांव की शामलात जमीन नगर निगम का हिस्सा बन गई थी। ग्वाल पहाड़ी में जमीन का विवाद उस समय चर्चा में आया जब गुरुग्राम के पूर्व उपायुक्त टीएल सत्यप्रकाश ने कथित तौर पर नगर निगम की 464 एकड़ जमीन की म्यूटेशन मेट्रो वैली बिजनेस पार्क लिमिटेड के नाम की थी। सत्यप्रकाश ने नगर निगम की इस जमीन की म्यूटेशन बतौर डिप्टी कलेक्टर बदली थी। जिस समय यह कथित कार्रवाई हुई उस समय उनके पास नगर निगम आयुक्त का भी कार्यभार था।

नगर निगम ने 150 एकड़ जमीन पर लिया कब्जा

गुरुग्राम में हजारों करोड़ रुपए की जमीन की म्यूटेशन बदलने और उसे रद्द करने के बाद विपक्ष के निशाने पर आई प्रदेश सरकार अब धीरे-धीरे बैकफुट पर आ रही है। विधानसभा के भीतर और बाहर किरकिरी करवाने के बाद हरियाणा सरकार के निर्देशों पर गुरुग्राम नगर निगम ने विवादित जमीन का कब्जा लेना शुरू कर दिया है। कुल 464 एकड़ जमीन में से अभी 150 एकड़ जमीन पर कब्जा लिया गया है। शेष जमीन पर कब्जा लेने को अभी अदालत के निर्णय का इंतजार है। मंगलवार की सुबह नगर निगम के अधिकारी भारी पुलिस बल व अमले के साथ ग्वाल पहाड़ी पहुंचे। इस अमले में निगम के संयुक्त आयुक्त, पचांयत विभाग के अधिकारियों के साथ-साथ सभी जोन के एसडीओ और जेई मौजूद थे। पटवारी ने मौके पर निशानदेही कर निगम की जमीन के बारे में बताया जिसके बाद निगम के कर्मचारियों ने जमीन पर अपनी मलकीयत का बोर्ड लगा दिया। डीटीवी संजीव मान के मुताबिक मंगलवार को 150 एकड़ जमीन पर कब्जा लिया गया है।

 

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