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संगीत : वायलिन और गायिकी का सुंदर समन्वय

इस अवसर पर संस्था की वार्षिक पत्रिका कला-प्रवाह का प. बिरजू महाराज, डा. शन्नो खुराना और विदुषी सुमित्रा गुहा के हाथों विमोचन हुआ।
Author नई दिल्ली | February 18, 2016 22:36 pm
वायलिन वादन पेश करते दिल्ली घराने के कलाकार असगर हुसैन।

तराना आर्ट एंड म्यूजिकह्ण संस्था की सांगीतिक पत्रिका ‘कला-प्रवाह’ के विमोचन अवसर पर आयोजित शास्त्रीय संगीत समारोह में दिल्ली घराने के वायलिन वादक असगर हुसैन ने वायलिन वादन पेश किया। इस अवसर पर उन्हें तराना सम्मान से भी नवाजा गया। शाम की शुरुआत प. बिरजू महाराज के स्वागत में बाल और किशोर कलाकारों के कथक नृत्य से हुई। बाल कलाकार तोजा चौधरी और यशस्विनी के एकल कथक के बाद रागिनी और शिंजिनी ने तराने पर युगल नृत्य प्रस्तुत किया। यशस्विनी और रागिनी पं बिरजू महाराज की पोती और शिंजिनी उनकी नातिन हैं। इस अवसर पर संस्था की वार्षिक पत्रिका कला-प्रवाह का प. बिरजू महाराज, डा. शन्नो खुराना और विदुषी सुमित्रा गुहा के हाथों विमोचन हुआ।

हालांकि असगर हुसैन का कार्यक्रम काफी देर से शुरू हुआ लेकिन उनके वायलिन वादन ने साबित कर दिया कि सब्र का फल मीठा होता है। असगर हुसैन को सुर और लय की समझ घुट्टी में ही मिली है। क्लासिकी मौसीकी की शुरुआती तालीम अपने वालिद और जानेमाने तबला वादक उस्ताद अनवर हुसैन से पाने के बाद उन्हें वायलिन में मार्गदर्शन अपने ही घराने के उस्ताद जहूर अहमद खां और घराने के खलीफा उस्ताद इकबाल अहमद खां से मिला। उनकी बेहतरीन तालीम और जबर्दस्त रियाज का गवाह था उनका सुरीला वायलिन वादन, जिसमें उनके घराने की खास खूबियां बखूबी नजर आती रहीं।

कार्यक्रम की शुरुआत उन्होंने शाम के सुमधुर राग श्याम कल्याण से की। राग का माहौल बनाने के लिए औचारमयी संक्षिप्त आलाप के बाद उन्होंने विलम्बित गत ग्यारह मात्रा के ताल ‘चार ताल की सवारी’ में बजा कर शुरू से ही अपना सिक्का जमा लिया।

असगर बताते हैं कि यह ग्रंथी ठेका है, यानी संगीत शास्त्र के ग्रंथों से लिया गया ताल है जो ग्यारह मात्रा के अष्टमंगल जैसे तालों से बिलकुल जुदा है। 11 मात्रा में 10 मात्रा के झपताल का या 8 और 6 मात्रा के छंद बजाकर उन्होंने अपने सटीक लय ज्ञान का भी परिचय दिया।

चार ताल की सवारी में विलम्बित गत के बाद उन्होंने मध्य लय और द्रुत तीनताल में बंधी अपने घराने की दो गायकी अंग की बंदिशें बजा कर तैयार झाले से श्याम कल्याण को विराम दिया। मुख्य राग के बाद राग पहाड़ी की मशहूर ठुमरी ‘सैयां गए परदेस’ पूरी रूहदारी के साथ बजाकर उन्होंने अपना सुरीला वायलिन वादन संपन्न किया। असगर हुसैन के वायलिन वादन में गायकी और तंत्रकारी दोनों ही तंत्रों का सुंदर समन्वय दिखा। तबले पर उस्ताद अख्तर हसन ने उनकी बेहतरीन संगति की। खास कर झाले के विविध छंदों का सवाल जवाब और ठुमरी के अंतिम चरण में उनकी लग्गी लाजवाब थी।

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