May 29, 2017

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गुजरात हाईकोर्ट ने पिता की एक ना सुनी, कहा-हर महीने नाबालिग बेटी को दो 250 रूपये

हाईकोर्ट ने कहा कि डीएनए टेस्ट में यह साबित हो चुका है कि वही उस बच्ची का जैविक पिता है और वह गुजारा भत्ता देने से इनकार नहीं कर सकता।

प्रतीकात्मक चित्र

गुजरात हाईकोर्ट ने एक शख्स को अपनी नाबालिग बेटी को हर महीने 250 रूपये देने का आदेश सुनाया है। याचिकाकर्ता उस लड़की को अपनी जैविक पुत्री मानने से इनकार कर रहा था। डीएनए टेस्ट में इसकी उसके दावे गलत साबित हुए और जांच में पता चला कि नाबालिग बच्ची उसी की बेटी है। बावजूद इसके याचिकाकर्ता यही कहता रहा कि वो लड़की उसकी बेटी नहीं है और वो हर महीने 250 रुपये उसे नहीं देगा। दरअसल, मामले में विवाद साल 2000 में शुरु हुआ था, जब याचिकाकर्ता की पत्नी पति से अलग रहने लगी और अपने गुजारा भत्ता के लिए अहमदाबाद फैमिली कोर्ट पहुंच गई।

कुछ महीनों की सुनवाई के बाद कोर्ट ने आरोपी शख्स को 500 रुपये पत्नी और 250 रुपये बेटी को हर महीने देने का आदेश दिया लेकिन वह शख्स पैसा देने में हमेशा देरी करता। साल 2014 में महिला ने सभी बकाये का भुगतान कराने के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और पति के इनकार करने पर उसे जेल भेजने की गुजारिश की। हालांकि, कई गंभीर आरोपों के बाद भी कोर्ट ने आरोपी शख्स को जेल नहीं भेजा लेकिन उसे सभी बकाया राशि जमा करने का आदेश दिया।

इसके खिलाफ उस शख्स ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया लेकिन उसने याचिका दाखिल करने में तीन महीने की देरी कर दी। उसने कोर्ट में फिर दलील दी कि वो उस लड़की का जैविक पिता नहीं है, इसलिए उसे गुजारा भत्ता देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि डीएनए टेस्ट में यह साबित हो चुका है कि वही उस बच्ची का जैविक पिता है और वह गुजारा भत्ता देने से इनकार नहीं कर सकता।

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First Published on October 13, 2016 3:27 pm

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