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न्यायाधीशों की नियुक्ति मामले में सरकार का रुख साफ नहीं

उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति के मामले में नया कानून बनाने के मुद्दे पर सरकार ने मंगलवार को कोई भी स्पष्ट रुख प्रकट नहीं किया।
Author नई दिल्ली | August 10, 2016 03:53 am

उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति के मामले में नया कानून बनाने के मुद्दे पर सरकार ने मंगलवार को कोई भी स्पष्ट रुख प्रकट नहीं किया। अलबत्ता यही कहा कि इस मुद्दे पर देश में राजनीतिक सहमति बनने पर ही कुछ तय किया जाएगा। राज्यसभा में विभिन्न राजनीतिक दलों के सदस्यों की ओर से सरकार से उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति के मामले में नया कानून बनाने के बारे में पूछे जाने पर कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि जीएसटी विधेयक के बारे में हमने डेढ़ वर्ष तक मेहनत करने के बाद सहमति तैयार की है।

उन्होंने कहा कि उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति के मामले में नया कानून बनाने पर यदि राजनीतिक क्षेत्र की सीढ़ियों पर चढ़ कर आम सहमति बन गई तो इस दिशा में कदम उठाया जाएगा। उल्लेखनीय है कि उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति के मामले में नया कानून बनाने संबंधी एनजेएसी कानून को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक कहते हुए खारिज कर दिया था।

उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति में गतिरोध से पैदा हुई स्थिति के बारे में ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पर विभिन्न दलों के सदस्यों के स्पष्टीकरण का जवाब देते हुए कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में कॉलेजियम के कामकाज में सुधार के लिए सुझाव आमंत्रित किए हैं। भारत सरकार ने निर्णय की सटीकता के बारे में अपनी आशंका के तहत न्यायिक नियुक्तियों के तंत्र में सुधार लाने के लिए अपने सुझाव प्रस्तुत किए व सरकार ने इस बाबत समुचित कार्रवाई करने की अपनी स्वतंत्रता सुरक्षित रखी।

कानून मंत्री ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों से मिले सुझावों को संकलित करने के लिए दो न्याय मित्र -पिंकी आनंद एएसजी और अरविंद दातार की नियुक्ति की है। चूंकि बहुत से वकीलों ने अपने सुझाव देने के लिए समय सीमा को बढ़ाए जाने का अनुरोध किया था इसलिए हाई कोर्ट ने निर्देश दिया कि जन सामान्य से 13 नवंबर 2015 के शाम पांच बजे तक सुझाव आमंत्रित किए जाएं। सुप्रीम कोर्ट ने चार श्रेणियों में सुझाव आमंत्रित किए थे। जो पारदर्शिता, सचिवालय, पात्रता मानदंड और शिकायत जैसी श्रेणियां हैं।

उन्होंने कहा कि इसके अनुसार न्याय विभाग ने छह नवंबर 2015 को सभी प्रमुख राष्ट्रीय-क्षेत्रीय समाचार पत्रों में सार्वजनिक नोटिस प्रकाशित कर अपनी वेबसाइट पर मिले सभी सुझाव दोनों न्याय मित्रों को ई-मेल कर दिए। न्याय मित्रों ने सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित समय सीमा में लगभग 1450 सुझाव मिले। इन सुझावों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा बताई गई चार श्रेणियों के अतिरिक्त एक और श्रेणी अर्थात विधिक श्रेणी के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया और सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया गया।

उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने ‘कॉलेजियम प्रणाली’ में सुधार के बारे में 16 दिसंबर 2015 को आदेश दिया और इस आदेश के तहत अन्य बातों के साथ साथ तय किया गया कि भारत सरकार भारत के प्रमुख न्यायाधीश से परामर्श करके मौजूदा प्रक्रिया ज्ञापन को अनुसमर्थित कर अंतिम रूप दे सकती है। सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम अवर जजों वाले कॉलेजियम की सर्वसम्मत राय के आधार पर भारत के मुख्य न्यायाधीश निर्णय लेंगे। प्रसाद ने कहा कि न्याय विभाग ने सभी मुख्यमंत्रियों को संबोधित 23 दिसंबर 2015 के पत्र के द्वारा नियुक्ति की ‘कॉलेजियम प्रणाली’ में सुधार के लिए राज्य सरकारों से सुझाव मांगे। विभाग को मेघालय, गुजरात, छत्तीसगढ़, अरुणाचल प्रदेश, झारखंड, मिजोरम, राजस्थान, ओड़िशा और गोवा जैसे नौ राज्य सरकारों से जवाब मिले।

बकौल प्रसाद सरकार का प्रयास है कि सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों द्वारा स्थापित मानकों के भीतर नियुक्ति प्रक्रिया को पारदर्शी, साफ-सुथरी और जवाबदेह बनाने के लिए वर्तमान प्रक्रिया ज्ञापन का समर्थन किया जाए और न्यायपालिका की स्वतंत्रता भी सुनिश्चित की जाए। मामले की सुनवाई के दौरान एवं सुप्रीम कोर्ट के निर्णय नहीं आने तक, शीर्ष न्यायालय के 12 मई 2015 और 15 जुलाई 2015 के आदेशों के अनुसार केवल उन अपर जजों का कार्यकाल तीन महीने के लिए बढ़ा दिया गया जिनकी अवधि समाप्त हो रही थी। कोई अन्य नियुक्ति नहीं की गई। इस अवधि के दौरान 112 अतिरिक्त जजों के कार्यकाल में वृद्धि की गई। चूंकि प्रक्रिया ज्ञापन को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में कुछ समय लग सकता था, इसलिए भारत सरकार की पहल पर मामले को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष उठाया गया और जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया फिर से शुरू की गई। 2016 के दौरान 110 अपर जजों को स्थायी किया गया और 52 जजों की नई नियुक्ति की गई।

इससे पहले सरकार से स्पष्टीकरण मांगते हुए कांग्रेस के विवेक तन्खा ने देश की अदालतों में लंबित पड़े करोड़ों मामलों की ओर सरकार का ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा कि उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति में हो रहे विलंब के कारण लोगों की समस्याएं और बढ़ गई हैं। उन्होंने सरकार से जानना चाहा कि जजों की नियुक्ति के मामले में सरकार क्या कर रही है। बसपा के सतीश चंद्र मिश्रा ने उच्च न्यायपालिका में अनुसूचित जाति, जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के प्रतिनिधियों का लगभग अभाव होने पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि सरकार इन वर्गो को उच्च न्यायपालिका में जज बनाने की दिशा में क्या कदम उठा रही है।

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