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चुनाव आयोग ने कहा, चुनकर ही जाएंगे चुनावी विज्ञापन

बिहार चुनाव के दौरान आयोग ने राज्य में भाजपा की तरफ से प्रकाशित कराए गए दो विवादास्पद विज्ञापनों के प्रकाशन पर प्रतिबंध लगा दिया था।
Author नई दिल्ली | April 3, 2016 02:26 am
इस विज्ञापन पर भी चुनाव आयोग ने संज्ञान लिया था। इसमें कहा गया था कि दलितों-पिछड़ों की थाली खींच, अल्पसंख्यकों को आरक्षण परोसने का षड्यंत्र क्या सुशासन है?

नई दिल्ली, 2 अप्रैल। नफरत फैलाने और गुमराह करने वाले विज्ञापनों के प्रति सतर्कता बरतते हुए चुनाव आयोग ने शनिवार को निर्देश दिया कि असम और पश्चिम बंगाल में तीन और चार अप्रैल को बिना मंजूरी के किसी भी अखबार में विज्ञापन प्रकाशित नहीं होगा। आयोग ने भाजपा की ओर से बिहार चुनाव में विवादास्पद विज्ञापन जारी होने के परिप्रेक्ष्य में यह कदम उठाया गया है। असम और पश्चिम बंगाल में पहले चरण का चुनाव चार अप्रैल को होगा। आयोग ने कहा है कि विज्ञापन के प्रकाशन के लिए मीडिया सर्टिफिकेशन एंड मॉनिटरिंग कमिटी की मंजूरी जरूरी है।

असम और पश्चिम बंगाल के मुख्य चुनाव अधिकारी को जारी निर्देश में आयोग ने कहा है कि पहले भी आक्रामक और गुमराह करने वाले विज्ञापनों को इसके संज्ञान में लाया गया है। आयोग ने कहा है कि चुनाव के अंतिम चरण में इस तरह के विज्ञापनों से चुनाव का माहौल दूषित हो जाता है। ऐसे मामलों में प्रभावित उम्मीदवारों और दलों को स्पष्टीकरण देने का अवसर नहीं मिल पाता है। चुनाव आयोग ने कहा कि यह सुनिश्चित करने के लिए कि भड़काऊ, गुमराह करने वाले या घृणा फैलाने वाले विज्ञापनों के कारण इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो और कोई अप्रिय घटना न घटे। कोई भी राजनीतिक दल, उम्मीदवार, संगठन या व्यक्ति तीन और चार अप्रैल को प्रिंट मीडिया में विज्ञापन जारी नहीं करेगा।

संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए आयोग ने कहा है कि विज्ञापन तभी प्रकाशित किए जाएंगे जब उन्हें जिला और राज्य स्तर पर काम कर रहे मीडिया सर्टिफिकेशन एंड मॉनिटरिंग कमिटी से मंजूरी मिल जाए। आयोग ने निर्देश दिया है कि अखबारों को भी सूचित कर दिया जाना चाहिए कि समिति से मंजूरी मिले बगैर वे विज्ञापन न प्रकाशित करें।

बिहार चुनाव के दौरान आयोग ने राज्य में भाजपा की तरफ से प्रकाशित कराए गए दो विवादास्पद विज्ञापनों के प्रकाशन पर प्रतिबंध लगा दिया था। स्थानीय अखबारों में छपवाए गए दो विज्ञापनों पर आयोग ने गंभीर आपत्ति जताते हुए चुनाव संपन्न होने तक ऐसे विज्ञापनों को छापने पर रोक लगा दी थी। आयोग ने बिहार के मुख्य चुनाव अधिकारी को निर्देश दिया था कि वे पार्टी के राज्य अध्यक्ष को ऐसा फिर से न करने की चेतावनी दें। चुनाव आयोग ने संबंधित जिला मजिस्ट्रेट को भी निर्देश दिए थे कि अगर अखबारों के मुद्रक और प्रकाशक जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 127-ए का उल्लंघन करने के दोषी पाए जाते हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू की जाए।

‘जवाब नहीं तो वोट नहीं’ शृंखला के इन विज्ञापनों में ‘लालू-नीतीश जवाब दो, 25 सालों का हिसाब दो’ कहते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राजद प्रमुख लालू प्रसाद से कई सवाल पूछे गए थे। जिन विज्ञापनों का चुनाव आयोग ने संज्ञान लिया था, उनमें से एक में आरक्षण को लेकर कहा गया था कि दलितों-पिछड़ों की थाली खींच, अल्पसंख्यकों को आरक्षण परोसने का षड्यंत्र क्या सुशासन है? दूसरा विज्ञापन वोट बैंक की राजनीति पर था।
बिहार में राजद, जद (एकी) और कांग्रेस के महागठबंधन ने चुनाव आयोग से शिकायत कर इन दोनों विज्ञापनों पर रोक लगाने की मांग की थी।

* प्रकाशन के लिए मीडिया सर्टिफिकेशन एंड मॉनिटरिंग कमिटी की मंजूरी जरूरी।
* असम और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए दिए दिशा-निर्देश।
* बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा के विज्ञापनों की हुई थी शिकायत।

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  1. S
    Sidheswar Misra
    Apr 3, 2016 at 3:10 am
    नाख़ून बिना चुनाव आयोग केवल सलाह दे जनता को मुर्ख बनाने के लिए
    Reply
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