May 27, 2017

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सबरंगः अब जाकर सही राह पर चली है शिक्षा व्यवस्था

डीएवी कॉलेज प्रबंधन समिति के अध्यक्ष डॉक्टर पूनम सूरी का नाम आर्य समाज की विरासत के साथ जुड़ा हुआ है।

इक्कीसवीं शताब्दी की सबसे बड़ी चुनौती हर व्यक्ति को वह शिक्षा देना है जो उसे सम्मानपूर्ण जीवन जीने के लिए तैयार करे। (Express Photo)

डीएवी कॉलेज प्रबंधन समिति के अध्यक्ष डॉक्टर पूनम सूरी का नाम आर्य समाज की विरासत के साथ जुड़ा हुआ है। शैक्षणिक क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए इन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। शिक्षा के भगवाकरण के आरोपों पर सूरी बेबाकी से कहते हैं कि दो सौ साल के संकुचन के बाद शिक्षा व्यवस्था अभी तो सही राह पर चली है। वेद को गरेड़ियों का गान कहकर भारतीय संस्कृति को कमतर करने की कोशिश होती रही है। पढ़ने और पढ़ाने को लेकर पिछले कुछ समय से देश में जो तीखी बहस जारी है उसके बरक्स बिना लाग-लपेट उन्होंने कहा कि अब हमें मैकाले की क्लर्क और कामगार पैदा करने की नीति खारिज कर विचारक बनाने की ओर बढ़ना होगा। उनसे बातचीत के मुख्य अंश-

सवाल : दिल्ली, नोएडा से लेकर देश के विभिन्न इलाकों में महंगी फीस और स्कूलों के मनमाने व्यवहार के कारण आंदोलन हो रहे हैं। अभिभावक और स्कूल प्रबंधक अदालतों में आमने-सामने हैं। इस स्थिति को आप कैसे देख रहे हैं?

पूनम सूरी : सोचना तभी था, बोलना तभी चाहिए था जिस वक्त सरकार कानून बनाकर आदेश देती है कि यह खर्चा करो या उसे यह सुविधा दो। बहस उसी वक्त होनी चाहिए कि इसका क्या प्रभाव पड़ेगा। आप डीएवी को छोड़ किसी भी स्कूल को लीजिए। उसके संसाधनों का भी विश्लेषण होना चाहिए। डीएवी एक ऐसी संस्था है जो न्यूनतम संसाधनों के साथ चलती है। हमारा शुल्क तर्कसंगत और न्यूनतम है इसलिए हमें इन हालात का सामना नहीं करना पड़ता। लेकिन बाकी स्कूल कहां से खर्चा करें यह भी तो बताना होगा।

सवाल : शिक्षा के क्षेत्र में शासकों की कथनी और करनी का फर्क दिखता है। जिस पर देश की बुनियाद टिकी है, उसके लिए कम बजट देना और उसका कभी चुनावी मुद्दा नहीं बनना। क्या आपको नहीं लगता कि विश्व गुरु की बातें करने वाला हमारा देश शिक्षा जैसे मुद्दे को लेकर न तो सामाजिक और न ही राजनीतिक रूप से गंभीर है।
पूनम सूरी : अब सरकार के बारे में सरकार जाने। मैं यह बात जोर देकर कहता हूं कि डीएवी एक गैर राजनीतिक संस्था है। बादल सरकार के दौरान पंजाब में एक कार्यक्रम था। इसमें मंच पर सिर्फ शिक्षाविद और साधु-संन्यासी थे। किसी ने पूछा कि यह क्या है? मैंने कहा कि हम न तो ‘लेफ्ट’ जाना चाहते हैं और न ‘राइट’। हम तो बस ‘अपराइट’ होना चाहते हैं।

सवाल : हाल में स्कूली किताबों में सत्ताधारी वर्ग को खुश करने वाली बातों को जोड़ने से बहुत विवाद हुआ। ऐसा हर सरकार में होता रहा है। हिंदुस्तानी प्राथमिक शिक्षा राजनीतिकरण से कब और कैसे मुक्त हो पाएगी?

पूनम सूरी : मैं तो फिर कहूंगा कि सरकार और समाज बस एक डीएवी का उदाहरण देखे। आठवीं कक्षा तक हमारी अपनी पुस्तकें हैं। आजकल इस बात पर बहुत जोर है कि स्कूल अपनी किताबें न छापें और न बेचें। अभी तक राष्ट्रीय शैक्षणिक अध्ययन व अनुसंधान परिषद (एनसीईआरटी) ने किताबें छापी हैं और आगे भी छपती रहेंगी। उनकी किताब और मूल्य के हम बहुत करीब हैं। बाकी के प्रकाशकों से डीएवी के किताबों की तुलना करेंगे तो आप तीन सौ गुणा तक का फर्क पाएंगे। हमारे अपने शिक्षक किताब लेखन में योगदान देते हैं, इसलिए हम उन्हें रॉयल्टी नहीं देते। इसके बाद भी हम लागत के अनुपात में बच्चों को 20 फीसद की छूट देते हैं। सबसे बड़ी बात जो पिछले पांच साल में हमारे प्रकाशन ने की है उस पर ध्यान दिलाना चाहूंगा। चाहे गणित हो या विज्ञान या सााहित्य, क्या हर विषय के अभ्यास के साथ हम इंसान को इंसानियत सिखा सकते हैं? हर अभ्यास के साथ मानवता ला सकते हैं? हर अभ्यास के तहत बच्चों को इंसान की तरह सोचना सिखा सकते हैं? शिक्षा का अंतिम लक्ष्य संस्कार ही होना चाहिए। अगर यह नहीं होता है तो हम नाकाम हैं। भगवान ने जो मानव बनाया है उसमें मानवता डीएवी भरेगा। हमारी किताबों का लक्ष्य यही मानवता भरना है। हमारी कोशिश है कि भारतीयता बची रहे, उसका विकास हो।

सवाल :आपकी भारतीयता का दायरा कहां तक है?

पूनम सूरी : मैंने जिस भारतीयता की बात की है वह किसी धार्मिक स्थिति पर नहीं है। पहले जमाने में टीचिंग क्लास रूम होते थे, 45 मिनट में घंटी बजी और बात खत्म। फिर समझ में आया की टीचिंग नहीं, लर्निंग क्लास रूम होने चाहिए। लर्निंग शब्द आने के साथ ही शिक्षा में शिक्षक नहीं शिष्य केंद्र बना। लेकिन यह टीचिंग और लर्निंग तो लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति का हिस्सा थे। उन्हें अपनी जरूरतों के हिसाब से क्लर्क और कामगार चाहिए थे। अब थिंकिंग क्लास रूम की बात हो रही है। हम अपनी किताबों के जरिए सोचने वाला और तर्क करने वाला पैदा करना चाहते हैं। बहुत सी जगहों पर परीक्षाओं में नकल के आरोप लगते हैं। सवाल ऐसे तैयार करो कि विद्यार्थी को आप भले ही पुस्तकालय में किताबें खोल कर बिठा दें, नकल उनके किसी काम नहीं आए, वे विचारक बनें।

सवाल : स्कूलों में फरमान जारी होता है कि योगी कट बाल रखो, टिफिन में सिर्फ शाकाहार लाओ। बहुत से राज्यों ने मिड डे मील में मांसाहार को खारिज किया है। भारत जैसे बहुसांस्कृतिक देश में इस प्रवृत्ति को कैसे देखते हैं? पूनम सूरी : किसी खास संस्था ने ऐसा किया तो मैं कुछ नहीं कह सकता। खान-पान निजी मामला होता है।
सवाल : धार्मिक मुहिम से जुड़ी संस्थाएं अपने स्कूल भी चलाती हैं। यहां तैयार हुए युवाओं का एक खास राजनैतिक रुझान होता है। पिछले चुनावों में यह दिखा भी। आपकी कोई टिप्पणी?
पूनम सूरी : मुझे इस बात से अफसोस है कि हम ओम का झंडा उठाते हैं तो हमें भगवा खेमे का सदस्य बना दिया जाता है। हम ओम के उपासक हैं। सत्य की खोज में निकले हैं। अब इस सत्य की खोज के समय में सत्ता किसके हाथ आती है, यह हमारा लक्ष्य नहीं है।

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First Published on May 5, 2017 2:13 am

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