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कटे जंगल और घटी बारिश, अब हर 16 साल में 3 बार पड़ता है सूखा

जिस तरह बेतरतीब विकास किया जा रहा है, उसका खमियाजा जल, जंगल और जमीन को भुगतना पड़ रहा है। यह आने वाले समय में हमारे लिए नुकसानदायक होगा।
Author नई दिल्ली | June 6, 2016 03:05 am
सूखे से खराब हुई कपास की फसल। (Photo Source: AP)

बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा करने एवं विकास के नाम पर जंगलों की अंधाधुंध कटाई को पर्यावरणविद् ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा कारण बताते हैं। जंगलों के घटते क्षेत्रफल के कारण बारिश की मात्रा में कमी आई है और ऐसे में पिछली दो शताब्दी में जहां 16 वर्षों में एक बार सूखा पड़ता था, वहीं 1968 के बाद से हर 16 वर्ष में तीन बार बड़ा सूखा पड़ रहा है।

पर्यावरणविद् एवं सामाजिक कार्यकर्ता केके जैन के मुताबिक जंगलों का लगातार कम होता क्षेत्रफल पर्यावरण के लिए गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है। जंगल एवं बारिश के एक दूसरे से जुड़े होने के कारण पानी के संकट के लिए भी वन क्षेत्र में कमी एक प्रमुख कारक है। भारत के वन क्षेत्र पर स्थिति रिपोर्ट 2015 के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र, केरल, कर्नाटक, उत्तराखंड, अरुणाचल प्रदेश, तेलंगाना में जंगल तेजी से घटे हैं। पूरे भारत की बात करें तो 19वीं एवं 20वीं शताब्दी में देश में केवल 12 बार सूखा पड़ा, यानी 16 वर्ष में एक बार सूखा पड़ा। लेकिन 1968 के बाद से सूखे की तादाद में वृद्धि आई। 1968 से 1992 के बीच हरेक 16 वर्ष में तीन बार सूखा पड़ा।

2004-05 से 2007-08 के बीच चार बार गंभीर सूखा पड़ा। दरअसल जिस तरह बेतरतीब विकास किया जा रहा है, उसका खमियाजा जल, जंगल और जमीन को भुगतना पड़ रहा है। यह आने वाले समय में हमारे लिए नुकसानदायक होगा। जंगल का कम होना बेहद चिंताजनक है। हमें संतुलित विकास करना चाहिए। इसके लिए दीर्घकालीन योजना बनाने की जरूरत हैै।

भारत के वन क्षेत्र पर स्थिति रिपोर्ट 2015 के मुताबिक पिछले दो वर्षो में देश के वन क्षेत्र में 5081 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि दर्ज की गई है। भारत का कुल वन क्षेत्र 7,01,673 वर्ग किलोमीटर है। जो देश के सम्पूर्ण क्षेत्रफल का 21.34 फीसद है। इसमें वृक्ष आच्छादन 92572 वर्ग किलोमीटर है। भारतीय किसान यूनियन के शिवनारायण सिंह परिहार ने कहा कि जंगलों की अंधाधुंध कटाई के कारण बंजर भूमि भी बढ़ गई।

उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार सिंचित क्षेत्र बढ़ने और उत्पादन बढ़ने के दावे करती है। लेकिन इसके उलट देश में बंजर भूमि बढ़ गई है। सरकार इस भूमि को कृषि योग्य बंजर भूमि मानती है। यानी बंजर भूमि पर विशेष प्रयास करने पर कृषि हो सकती है। परिहार ने कहा कि जंगल कटने से पानी के जमीन में समाने की बजाय बहने में बढ़ोतरी हुई। इससे भूजल स्तर घटा है। पेड़ों के कम होने से बारिश पर भी असर हुआ है। पर्यावरणविदों ने पौड़ी, रुद्रप्रयाग, चमोली, उत्तरकाशी, नैनीताल, बागेश्वर, पिथौरागढ़ जिलों सहित हरिद्वार और ऋषिकेश के जंगलों में भीषण आग के लिए प्रकृति के साथ मनुष्य की छेड़छाड़ को जिम्मेदार बताया हैं। इसके कारण ही प्रदेश का एक बड़ा क्षेत्र आग से स्वाहा हो गया और राजाजी और कार्बेट पार्क का 145 हेक्टेयर हिस्सा भी प्रभावित हुआ।

कटे जंगल, घटी बारिश
जंगलों के घटते क्षेत्रफल के कारण बारिश की मात्रा में कमी आई है। दरअसल जिस तरह बेतरतीब विकास किया जा रहा है, उसका खमियाजा जल, जंगल और जमीन को भुगतना पड़ रहा है। यह आने वाले समय में हमारे लिए नुकसानदायक होगा। जंगल का कम होना बेहद चिंताजनक है।

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