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नोटबंदी से चाय बागानों में पांव पसारती डिजिटल क्रांति

नकदी संकट के कारण बागान प्रबंधन ने की पहल, साढ़े चार लाख मजदूर करते हैं काम।
बागानों में अब धीरे-धीरे मजदूरों के बैंक खाते खुलने लगे हैं और स्टेट बैंक की मोबाइल कैश वैन वहां पहुंच कर मजदूरों की मजदूरी का भुगतान करने लगी है।

नोटबंदी के बाद लगभग महीने भर तक भारी दिक्कत के बाद उत्तर बंगाल के चाय बागानों में अब गुपचुप तरीके से डिजिटल क्रांति पांव पसारने लगी है। राज्य के चाय बागानों में सदियों से मजदूरों को हर हफ्ते मजदूरी के नकद भुगतान की परंपरा रही है।  बागान इलाके में बैंकों की पर्याप्त शाखाएं नहीं होने और कभी बैंक जाने की जरूरत नहीं पड़ने की वजह से बागानों के ज्यादातर मजदूरों का कोई बैंक खाता नहीं था। लेकिन नोटबंदी के बाद पैदा हुई नकदी संकट के चलते मजदूरी का लंबे समय तक भुगतान नहीं होने की वजह से मजदूरों को भारी दिक्कत का सामना करना पड़ा। अब इस समस्या से निजात पाने के लिए मजदूरों के बैंक खाते खुलने लगे हैं। इस मामले में बागान प्रबंधन भी काफी सहयोग कर रहा है। नोटबंदी के बाद बैंकों ने बागान प्रबंधन को रिजर्व बैंक के निर्देश के हवाले कह दिया था कि सिर्फ उन मजदूरों को ही मजदूरी का भुगतान किया जा सकेगा जिनके बैंक खाते हैं। इलाके के बागानों में लगभग साढ़े चार लाख मजदूर काम करते हैं। मोटे अनुमान के मुताबिक उनमें से महज तीस फीसद के पास बैंक खाता था। नोटबंदी के बाद मजदूरी संकट के विरोध में शुरूआती दौर में कई बागानों में प्रदर्शन और आंदोलन हुए थे। लेकिन अब मजदूर और बागान सदियों पुरानी नकदी प्रथा को छोड़ कर डिजिटल भुगतान को अपना रहे हैं।

दार्जिलिंग, डुआर्स व तराई इलाकों में बसे लगभग तीन सौ चाय बागानों में जमीनी स्तर पर होने वाले इस बदलाव की आहट साफ महसूस की जा सकती है। इन बागानों में अब धीरे-धीरे मजदूरों के बैंक खाते खुलने लगे हैं और स्टेट बैंक की मोबाइल कैश वैन वहां पहुंच कर मजदूरों की मजदूरी का भुगतान करने लगी है। रांगापानी चाय बागान में काम करने वाला सुखिया ओरांव कहता है कि नोटबंदी के बाद उसके परिवार के सामने भूखों मरने की नौबत आ गई थी। लेकिन अब धीरे-धीरे गाड़ी पटरी पर आने लगी है। एक चाय बागान के ट्रेड यूनियन नेता, जो तृणमूल कांग्रेस से जुड़े हैं, कहते हैं कि बागान मजदूरों का बड़ा हिस्सा नोटबंदी का समर्थन करने लगा है। उनका मानना है कि यह फैसला धनी व भ्रष्टाचारी लोगों के खिलाफ है। बागराकोट चाय बागान के विमल प्रधान कहते हैं कि हमारे पास नोटबंदी से पहले भी पैसा नहीं था और अब भी पैसा नहीं है। लेकिन हम किसी तरह अपने दिन काट ही रहे हैं।डामडिमा बागान के प्रबंधक धीरेन घोष बताते हैं कि उनके बागान में कोई संकट नहीं है। नोटबंदी के पहले से ही प्रबंधन ने ज्यादातर मजदूरों के बैंक खाते खुलवा कर मासिक भुगतान का नियम बना दिया था।

चाय बागान मालिकों के संगठन इंडियन टी एसोसिएशन का कहना है कि नोटबंदी के बाद अब भी कई बागानों में नकदी का संकट है। कुछ इलाकों में बैंकों के 30-35 किलोमीटर दूर होने से मजदूर पैसे निकालने के लिए वहां जाने से हिचक रहे हैं। मजदूरों की दलील है कि पैसे निकालने के लिए उन्हें एक दिन की मजदूरी से हाथ धोना पड़ सकता है। लेकिन ऐसे मामलों में बागान प्रबंधन भी सहयोग दे रहा है और उनको बैंक जाने के लिए सवैतनिक छुट्टी दी जा रही है।

 

 

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