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परिसीमन के बजाए मसविदे में ही घिरा आयोग

दिल्ली चुनाव आयोग में नगर निगम वार्डों के परिसीमन होने के बजाए अभी तीसरे मसविदे की तैयारी हो रही है। अगले साल के शुरू में दिल्ली की तीनों निगमों के 272 सीटों के लिए होने वाले चुनाव का परिसीमन का काम जुलाई में पूरा किया जाना था।
Author मनोज मिश्र | October 21, 2016 00:58 am

दिल्ली चुनाव आयोग में नगर निगम वार्डों के परिसीमन होने के बजाए अभी तीसरे मसविदे की तैयारी हो रही है। अगले साल के शुरू में दिल्ली की तीनों निगमों के 272 सीटों के लिए होने वाले चुनाव का परिसीमन का काम जुलाई में पूरा किया जाना था। लेकिन आयोग ने अब जाकर लोगों से एतराज मांगे हैं।
दिल्ली के मुख्य चुनाव आयुक्त राकेश मेहता ने स्वीकार किया कि इस बार देरी हो रही है। इसका मुख्य कारण वे सत्ताधारी आम आदमी पार्टी के दबाव को मानने से इनकार करते हैं। उनके मुताबिक, परिसीमन को ज्यादा पारदर्शी बनाने के कारण ऐसा हो रहा है। दूसरे ड्राफ्ट को 24 सितंबर को सार्वजनिक करके उस पर लोगों से एतराज मांगे गए। करीब सात सौ एतराज और सुझाव आए हैं, उस पर विचार करके तीन हफ्ते में अंतिम ड्राफ्ट तैयार हो जाएगा। कांग्रेस का आरोप है कि सभी राजनीतिक दलों को बराबरी का अवसर न देने से तमाम समस्या आई।


उपराज्यपाल के 18 सितंबर 2015 की अधिसूचना से परिसीमन का काम शुरू हुआ था। पहले विवाद परिसीमन में 68 विधानसभाओं में से 60 विधानसभा में सीमा का अतिक्रमण होने का था। आयोग के पहले ड्राफ्ट के खिलाफ कांग्रेस ने चुनाव आयोग के दफ्तर पर प्रदर्शन किया। भाजपा ने भी उसका जमकर विरोध किया। उसके बाद आयोग ने उस पर सांसद, विधायकों और निगम पार्षदों की राय ली और दूसरा ड्राफ्ट जारी किया। शुरू मेंकरीब चार लाख (4,19,744) मतदाताओं का पता न चल पाने से दिल्ली की निगम सीटों का परिसीमन (डि लिमिटेशन) का काम काफी समय रुका पड़ा रहा। बाद में उसे ठीक किया गया तो तमाम कमियां सामने आने लगीं।

2007 के परिसीमन आयोग के सलाहकार और वरिष्ठ कांग्रेस नेता चतर सिंह का कहना है कि ज्यादा गड़बड़ी का मुख्य कारण यह है कि परिसीमन में एक व्यक्ति के आयोग ने बिना किसी सलाहकार के ड्राफ्ट रिपोर्ट तैयार की है। जबकि 5 जुलाई 2006 को बनी पिछली परिसीमन समिति में काफी सदस्य थे जिसमें राज्य चुनाव आयुक्त, चैयरमैन, निगम के अतिरिक्त आयुक्त, दिल्ली सरकार के शहरी विकास विभाग के संयुक्त सचिव और 5 विधायक व 5 निगम पार्षदों को एसोसिएट सदस्य चुना गया था ताकि वे परिसीमन कमेटी के कार्यों में सहायता कर सके। दिल्ली की निगम सीटों का परिसीमन निगम के विधान के हिसाब से हर दस साल में होता है। इसके कारण 2011 की जनगणना के आधार पर 272 सीटों के परिसीमन का काम चल रहा है।

करीब चार लाख मतदाताओं की गणना न मिलने से काफी समय से परिसीमन का काम रुका पड़ा है। इसे ठीक करने के दावे किए गए तो तो तमाम कमियां सामने आने लगीं। आबादी का अनुपात बराबर न होने से जहां मटियाला, विकासपुरी, बवाना और बुराड़ी में चार-चार के बजाए सात-सात, मुंडका, किराड़ी, बदरपुर और ओखला में छह-छह और नौ सीटों में पांच-पांच निगम सीटें बनेगीं। उसी तरह करीब 29 विधानसभा सीटों के नीचे चार-चार तीन-तीन निगम सीटें बनेंगी। इस तरह लोक सभा सीटों के नीचे भी सीटों की संख्या बराबर नहीं रह पाएगी। केवल दक्षिणी दिल्ली लोक सभा के नीचे 40 निगम सीटें होंगी। सबसे कम नई दिल्ली में 25 और सबसे ज्यादा दिल्ली उत्तर पश्चिम में 47 सीटें होने वाली हैं। यह तय है कि विधान सभा सीटों के बीच में ही निगम सीटें बनेंगी इसलिए ज्यादा बदलाव संभव नहीं है। राकेश मेहता का कहना है कि अब ज्यादा बदलाव नहीं होंगे। लेकिन जनता के 700 से ज्यादा के सुझावों को अंतिम ड्राफ्ट में शामिल करने का प्रयास किया जाएगा। उनका दावा है कि इससे अगले साल होने वाले निगमों के चुनावों पर भी असर नहीं होगा। लेकिन राजनीतिक दलों को लगता है कि यह चुनाव उनके लिए नींव बनेगा।

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