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Odd-Even फॉर्मूला बे-कार होने की राह में मुश्किलें हजार

दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार एक बार फिर निजी वाहनों को सम-विषम नंबरों के हिसाब से चलवाने की कवायद कर रही है। इससे सड़कों पर वाहनों को कुछ समय के लिए कम संख्या में लाया जाना संभव होगा।
Author नई दिल्ली | January 29, 2016 02:46 am
केजरीवाल सरकार एक बार फिर निजी वाहनों को सम-विषम नंबरों के हिसाब से चलवाने की कवायद कर रही है

दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार एक बार फिर निजी वाहनों को सम-विषम नंबरों के हिसाब से चलवाने की कवायद कर रही है। इससे सड़कों पर वाहनों को कुछ समय के लिए कम संख्या में लाया जाना संभव होगा। लेकिन निजी वाहनों की संख्या तो लगातार बढ़ती ही जा रही है। वाहन बनाने वाली कंपनियों के दबाव में वाहनों की बिक्री पर किसी भी तरह की रोक संभव नहीं लग रही है।
दिल्ली और एनसीआर में नए डीजल वाहनों के पंजीकरण पर लगाई गई नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने खुद की पाबंदी में संशोधन करके केवल दो हजार सीसी की कारों पर ही पाबंदी जारी रखी है।

उसमें भी बाहर के शहरों में पंजीकृत वाहनों को दिल्ली में लाने या रखने पर रोक नहीं है। यानी बाजार में डीजल कार की बिक्री के रास्ते खुले हुए हैं। वहीं एनजीटी ने भी यह कह कर इस सम-विषम योजना पर सवाल उठाया था कि इससे तो वाहनों की खरीद ज्यादा बढ़ जाएगी क्योंकि लोग एक के बजाए दो-दो कारें खरीदने लगेंगे।

केंद्र सहित अन्य सरकारें इस प्रयास में लगी हुई हैं कि ज्यादा से ज्यादा बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने देश में निवेश करे। कार और अन्य वाहन कंपनियों को भी सरकार हर तरह की सुविधा दे रही है। ऐसे में उनके उत्पादों की बिक्री पर रोक लगाने की किसी भी कोशिश से हंगामा मचने वाला है। यह तो किसी भी तरह से संभव नहीं है कि लोग वाहन खरीदें और उसे सड़कों पर न ले जाएं।

दिल्ली-एनसीआर में सार्वजनिक परिवहन साधनों की जो बदहाली है उसमें कोई भी सरकार ज्यादा पाबंदी नहीं लगा सकती। सम-विषम योजना के तहत भी कई तरह के निजी वाहनों को छूट देनी पड़ी थी। इस दौरान केवल 15 फीसद कारें सड़कों पर कम आर्इं। इसका मतलब यह है कि तमाम लोगों के पास पहले से ही दो-दो वाहन हैं। दिल्ली में करीब 28 लाख कारें और जीप पंजीकृत हैं। इनमें से करीब आधे हर रोज सड़क पर आते हैं। इतनी ही संख्या में एनसीआर और दूसरे राज्यों में पंजीकृत वाहन हर रोज दिल्ली में आते हैं। एक बड़ी तादात ऐसे कारों की है जो पेरिफेरियल सड़क न होने के कारण एक राज्य से दूसरे राज्य जाने के लिए जबरन दिल्ली में आते हैं।

सम-विषम के पहले अभियान में केवल कारों को शामिल किया गया। योजना बंद होते ही सड़कों पर फिर से भीड़ होने लगी। सरकार इस योजना को दोबारा लागू करने की तैयारी में है। सरकार लोगों से वचन ले रही है कि वे दूसरी कार नहीं खरीदेंगे। लेकिन यह सच है कि ऐसे लोकलुभावन कदम इस बड़ी समस्या का हल नहीं है।

दिल्ली-एनसीआर में तमाम ऐसे लोग कार चलाते हैं जिन्हें बेहतर सार्वजनिक परिवहन का विकल्प मिले तो वे तुरंत बे-कार होने को तैयार हो जाएं। वादे के मुताबिक सरकार 11 हजार बसों को सड़क पर नहीं ला पाई है। हर रोज एक करोड़ से ज्यादा लोगों के लिए बेहतर सार्वजनिक परिवहन का इंतजाम करना होगा।

बाजार के सच में इस बात को झुठलाया नहीं जा सकता है कि कोई सरकार गाड़ियों की बिक्री कम नहीं कर सकती है। सरकार रिफायनरी पर दबाव डाल कर पेट्रोलियम इंधनों को ज्यादा स्वच्छ बनाए। उसी तरह से कार बनाने वाली कंपनियों पर बेहतर इंजन बनाने के लिए दबाव डाला जाए। दिल्ली-एनसीआर में औद्योगिक प्रदूषणों पर भी ध्यान दिया जाए।

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