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सीएम अखिलेश यादव के इलाके के तालाबों का भी नहीं है कोई तारनहार, जिले के 1659 तालाबों में से करीब 1450 सूखे

मनरेगा के अंतर्गत 2008-09 से लेकर अब तक 635 तालाब खुदवाए गए हैं या फिर उनका जीर्णाेद्धार कराया गया है लेकिन वतर्मान में ये सभी तालाब बदहाल हैं।
Author इटावा | May 3, 2016 01:55 am
(गूगल मैप)

आसमान से आग बरस रही है। पशु-पक्षी पानी के लिए तरस रहे हैं। पानी के पारंपरिक ठिकानों की सुध लेने वाला कोई नहीं है। भीषण गर्मी से निपटने की योजनाएं तो हैं मगर वे कागज पर हैं। तालाब भी खुदवाए गए हैं, मगर उनमें पानी नहीं है। जिला प्रशासन तालाबों में पानी भरने के निर्देश जारी कर अपना कर्तव्य पूरा कर चुका है। मगर जब मुख्यमंत्री के अपने इलाके इटावा के तालाबों में पानी की व्यवस्था नहीं है, तो सूबे के दूसरे तालाबों का हाल बेहाल होना ही है।

गर्मी चरम पर पहुंचने जा रही है। पारा 42-43 डिग्री को छू रहा है। ऐसे में पानी की जरूरत स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है लेकिन गांवों में तालाब ज्यादातर सूखे पड़े हैं । गांवों में पानी का सबसे बड़ा साधन तालाब ही रहे हैं पर लगातार उदासीनता के चलते तालाब सूखे पड़े हैं। स्थिति यह है कि जिला प्रशासन की ओर से तालाबों को भरवाने के निर्देश दिए जा चुके हैं। इसके बाबजूद तालाब नहीं भरे गए हैं। तालाबों में भरे पानी से पशु-पक्षियों की प्यास बुझती है तथा आग लगने जैसी कोई दुर्घटना होने पर तालाबों में भरा पानी आग बुझाने के काम भी आता है।

इसके बावजूद तालाबों को कोई तारनहार दिखाई नहीं दे रहा है। गर्मी के मौसम में तालाब भरने के निर्देश सिर्फ कागजी खानापूर्ति तक सीमित रहते हैं। जिले में जो 1 हजार 659 तालाब हैं उनमें से करीब 1 हजार 450 तालाब सूखे पड़े हैं। लिहाजा पशु-पक्षी रामभरोसे हैं। बीहड़ इलाकों में तो स्थिति और ज्यादा खराब है। यहां जल स्तर काफी नीचे चला गया है, जिससे हैंडपंपों ने भी हाथ खड़े कर दिए हैं।

मनरेगा के अंतर्गत 2008-09 से लेकर अब तक 635 तालाब खुदवाए गए हैं या फिर उनका जीर्णाेद्धार कराया गया है लेकिन वतर्मान में ये सभी तालाब बदहाल हैं। एक दो स्थानों पर तो तालाब का अस्तित्व ही खत्म हो गया है। चकरनगर क्षेत्र के गांव भरेह में तो तालाब खुदवाया ही नहीं गया। इसी तरह राजपुर व गोपालपुरा के तालाब भी सूखे पड़े हैं।

मनरेगा निगरानी समिति के चेयरमैन आशुतोष दीक्षित ने बताते हैं कि तालाबों की ओर किसी का ध्यान नहीं है जबकि ग्रामीण व्यवस्था में तालाब सर्वाधिक उपयोगी हैं। मनरेगा के माध्यम से तालाब खुदवाए जाने के कार्य में जमकर मनमानी की गई है। कई स्थानों पर तो कागज पर ही तालाब खुदवा दिए गए हैं। कई स्थानों पर तालाब खुदवाकर उनमें पानी नहीं भरा गया है जिससे वे तालाब बेमानी हो गए हैं।

जल के क्षेत्र में कार्य कर रही नेचर कंजर्वेशन सोसायटी के सचिव निर्मल सिंह का कहना है कि गर्मी के मौसम में पशु-पक्षियों की जान पर बन आती है। तालाबों की व्यवस्था प्राचीनकाल से चली आ रही है जो इंसानों के साथ-साथ पशु-पक्षियों के लिए भी उपयोगी है। यदि तालाब बदहाल हुए तो जीवन भी बदहाल हो जाएगा।

सरकार ने तालाबों के जीर्णाेद्धार के लिए आदर्श जलाशय योजना चलाई थी। इस योजना में कुछ तालाबों का जीर्णाेद्धार भी हुआ था लेकिन चार वर्ष पहले यह योजना बंद कर दी गई और तालाब खुदाई का काम मनरेगा में कराया जाने लगा। पिछले वर्ष तालाबों की खुदाई के लिए एक नई योजना बनी थी। कुछ तालाब खुदवाए भी गए लेकिन पानी की स्थिति सभी में एक जैसी ही है। तालाब हैं भी तो उनमें पानी नदारद है।

ताखा तथा चकरनगर क्षेत्र के दजर्नों गांवों में तालाब सूखे पड़े हैं। इनमें ताखा क्षेत्र के बदकन शाहपुर, मुर्चा, मौहरी, डींग, रौरा, अमथरी, समथर, कल्याणपुरा, ताखा, कुदरैल, भरतपुर कला शामिल है। इसी तरह चकरनगर पंचायत में जो नए तालाब खुदवाए गए थे वे सभी सूखे पड़े हैं। इसके अतिरिक्त क्षेत्रीय गांव गोपालपुरा, राजपुर, हरौली बहादुरपुर, महुआ सूड़ा, पथर्रा, ददरा व बरचौली के तालाबों में भी पानी नहीं है।

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