चंडीगढ़: बेजान शहर की जान ‘रॉक गार्डन’

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नेकचंद आज इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनकी मौजूदगी से दुनिया अब भी वंचित नहीं। रॉक गार्डन के रूप में नेकचंद हमेशा जिंदा रहेंगे..

मुकेश भारद्वाज

चंडीगढ़ शहर के केंद्र में बसे सेक्टर 22 की अपेक्षाकृत तंग सड़कों पर भटकते-टहलते मशहूर पंजाबी कवि शिव कुमार बटालवी ने इसे पत्थरों का शहर कहा। कुछ गलत भी नहीं। जो भी शहर में नया-नया आता है, खास तौर पर साथ ही सटे पंजाब और हरियाणा के शहरों और कस्बों से, उसे यहां कंक्रीट की इमारतें ही नहीं पत्थरदिल बाशिंदों से भी दो-चार होना पड़ता है।

शहर के एक सरकारी महकमे के एक मामूली रोड इंस्पेक्टर नेकचंद सैनी को शायद कवियों-शायरों से ज्यादा इत्तेफाक नहीं था लिहाजा उसने चंडीगढ़ के ईंट-पत्थरों और तिरस्कृत करके फेंके जा चुके फालतू सामान में ही जीवन तलाशने की शुरुआत की और उनके और उनकी पत्नी जैसी प्रिय साइकिल के चलते ये र्इंट-पत्थर ही शहर की जान बन गए। चंडीगढ़ में उसके अपने और बेगानों का सफर तब तक अधूरा ही रहता है जब तक वे रॉक गार्डन के कदरन छोटे प्रवेश द्वार से झुक कर उसमें दाखिल नहीं हो जाते।

इस शहर को बनाने का समूचा श्रेय फ्रांसीसी वास्तु शिल्पकार ली कारबूजिए को ही रहेगा। लेकिन कारबूजिए की बनाई र्इंट-पत्थर की इस रचना में लोग यहां बस कर भी जो जान नहीं फूंक पाए वह काम नेकचंद ने किया। नेकचंद का बनाया रॉक गार्डन बेजान चंडीगढ़ की जान ही है। इस महत्त्वपूर्ण रचना के लिए नेकचंद की प्रशंसा करने वालों की कमी नहीं। लेकिन यह प्रशंसा कभी भी नेकचंद के दिमाग में नहीं चढ़ी। साइकिल उनका प्रिय वाहन सही ही रहा। इतना ही नहीं सरकारी सम्मान पाकर भी वे वापस अपने घर अपनी साइकिल पर ही रवाना हुए।

पत्थरों के शहर में बुतों को ही अपना साथी बना लेना नेकचंद का शौक था। दिन भर की नौकरी के बाद जहां लोग अपने घरों की ओर भागते थे, नेकचंद अपनी साइकिल पर बचा-खुचा और टूटा-फूटा सामान लेकर अपनी कल्पना के साथियों के साथ अपने मिलनस्थल पर व्यस्त हो जाते थे। पत्थरों से होने वाली नफरत, तकलीफ, निराशा, कुंठा और कठोरता को तो बहुतों ने अनुभूत करके शब्दों में उकेरा लेकिन उनके साथ संवेदना और साहचर्य से ओतप्रोत रोमांस की संभावना सिर्फ और सिर्फ नेकचंद ही तलाश सके।

खास बात यह भी है कि नेकचंद मिट्टी से खेलते हुए अपनी मिट्टी से गहरे जुड़े रहे और रॉक गार्डन इस इलाके की लोक संस्कृति की मिसाल बन गया। फिर चाहे हाथ में लालटेन थामे और लाठी टेक के खड़ा कोई बुत हो या खेत में खड़ा किसान, रॉक गार्डन में परंपरागत झूले और झरने भी मन को लुभाने वाले हैं।

नेकचंद ने जब फालतू सामान, मिट्टी और पत्थरों के साथ बुततराशी शुरू की तब इस कला को सिखाने के लिए कोई बड़े स्कूल कालेज नहीं थे। न तो वे कोई पेशेवर शिल्पकार थे और न ही वास्तुशिल्पकार। न ही वे कोई एकलव्य थे जिनके सामने अपनी कला को सीखने के लिए किसी गुरु का आदर्श या मूर्ति थी। उनके पास कुछ था तो वह थी उनकी कल्पनाशीलता और उसे मूर्त रूप देने का उनका जीवट। यह उनसे भी छुपा नहीं था कि उनका यह शौक कुछ लोगों को नागवार गुजरेगा। शायद यही वजह रही कि रॉक गार्डन की परिकल्पना ढके-छुपे तरीके से हुई। कल्पना को मूर्त रूप देने की लगन और धुन ऐसी थी जिसकी कोख में से एक ऐसा अजूबा पैदा हुआ कि मुल्क में तो उसका डंका बजा ही वरन् विश्वभर में भी चंडीगढ़ की ख्याति हो गई।

ली कारबूजिए के कारण जहां चंडीगढ़ संसार भर के वास्तुशिल्पकारों के लिए मक्का है वहां रॉक गार्डन विश्व भर में पर्यटकों का तीर्थस्थल। इस रॉक गार्डन की बदौलत ही आज चंडीगढ़ विश्व पर्यटन के नक्शे पर अलग ही चमकता है। नेकचंद आज इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनकी मौजूदगी से दुनिया अब भी वंचित नहीं। रॉक गार्डन के रूप में नेकचंद हमेशा जिंदा रहेंगे। उनके मरणोपरांत राजनीतिकों की यह मांग कि शहर की इस जगह का नाम नेकचंद के नाम पर रखा जाए उन्हें वह मुकाम नहीं दिला सकती जो रॉक गार्डन ने उन्हें दिया।

ऐसा नहीं कि नेकचंद के शहर की अफसरशाही से टकराव के मौके नहीं आए। लेकिन वे सब उनके अपने लिए न होकर रॉक गार्डन की खातिर ही होते थे। रॉक गार्डन के तीसरे चरण के निर्माण और विस्तार को लेकर वे अफसरों से खूब भिड़े लेकिन यह सब उनके लिए न होकर रॉक गार्डन के लिए ही था।

ऐसा भी नहीं कि कभी नेकचंद ने कोई समझौता न किया हो। रॉक गार्डन को शादी-ब्याह के लिए मुहैया कराने को लेकर विवाद के केंद्र में भी वे रहे। और खास बात यह भी है कि यहां शादी-ब्याह अपने आप में प्रतिष्ठा का विषय है। जाहिर है कि ऐसे निजी आयोजनों के लिए ऊंची पहुंच होना जरूरी है। नेकचंद के करीबियों का कहना है कि इन सबके पीछे मंशा यही होती थी कि शायद इससे शहर के अलंबरदारों का रॉक गार्डन के विकास के प्रति झुकाव बना रहे।

लिहाजा रॉक गार्डन का निर्माण करते समय वे खुद भी इसके विकास और विस्तार के लिए चट्टान की तरह खड़े हो गए। अपनी राह में आने वाले हर अवरोधक को दूर करके नेकचंद ने अपनी कल्पना को अमर कर दिया। आलम यह है कि शहर के हर महत्त्वपूर्ण और उनकी कभी कैसी भी मदद करने वाले उनसे उनकी किसी एक कृति की मांग कर लेते। जो उनसे मिलता उसकी यही ख्वाहिश होती कि एक बुत मिल जाए। मुफ्त। और नेकचंद हंसते-हंसते दे देते। शायद इसीलिए जब उन्हें यह कहा गया कि आपकी कृतियां यहां साथ-साथ हों तो अच्छा है, वे मुस्कुरा दिए। खाना खा चुके थे और आदतन अपने बूट पॉलिश करने लगे। बोले, इंकार तो कोई करता नहीं!

आज वे नहीं हैं तो शहर के कई नामी-गिरामी अब उनकी धरोहर को कैसे संभालते हैं, यह देखने की बात है।
जीवन यात्रा
नेकचंद का जन्म गुरदासपुर जिले के शकरगढ़ (पाकिस्तान) में 15 दिसंबर, 1924 को हुआ। मैट्रिक अगस्त, 1947 में लाहौर से की। उनका विवाह 1950 में दिल्ली की कमला के साथ हुआ और उनके दो बच्चे बेटी नीलम और बेटा अनुज हैं। विभाजन के बाद उनका परिवार चंडीगढ़ में बस गया। उन्होंने बेकार और इस्तेमाल न होने वाले घरेलू सामान से रॉक गार्डन का निर्माण किया।

करीब 40 एकड़ के क्षेत्र में बने इस गार्डन का उद्घाटन 1976 को किया गया था। जब चंडीगढ़ के निर्माण का कार्य शुरू हुआ तब नेक चंद को 1951 में सड़क निरीक्षक के पद पर रखा गया था। नेकचंद ड्यूटी के बाद अपनी साइकिल उठाते और शहर बनाने के लिए आस-पास के खाली कराए गए गांवों में से टूटे-फूटे सामान उठा लाते। सारा सामान उन्होंने पीडब्लूडी के स्टोर के पास इकट्ठा करना शुरू किया। धीरे-धीरे अपनी कल्पना के अनुसार इन बेकार पड़ी वस्तुओं को रूप देना शुरू किया। नेकचंद ने पहले छोटा सा गार्डन बनाया और धीरे-धीरे इसका विस्तार करते गए।

उन्हें इस कलाकारी की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं थी। यह स्थान जंगल जैसा था, जिसे वह साफ करते और बगीचे का रूप देते गए। इस पर काफी समय तक किसी की निगाह नहीं पड़ी। अकेले वह यह सब ड्यूटी के बाद चुपके से किया करते थे। नेकचंद को टूटे-फूटे सामान और मलबे से एकत्रित की गई सामग्री से वर्ष 1975 में रॉक गार्डन जैसी अविश्वसनीय कृति की रचना के लिए केंद्र सरकार ने वर्ष 1984 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया था।

उन्होंने इसे बनवाने में औद्योगिक और शहरी कचरे का इस्तेमाल किया। पर्यटक यहां की मूर्तियों, झरने और झूलों को देखकर अचरज में पड़ जाते हैं। इसे देखने हर रोज करीब 5000 पर्यटक आते हैं। गार्डन में झरनों, रंग बिरंगी मछलियों और जलकुंड के अलावा ओपन एयर थियेटर भी है। नेकचंद का 90 साल की उम्र में 11 जून, 2015 को निधन हो गया।