December 10, 2016

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AIIMS को कैट का नोटिस

देश का नामी स्वास्थ्य केंद्र अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) एक बार फिर विवादों में घिर गया है। एम्स के विभागाध्यक्ष की नियुक्ति में मनमानी के आरोप पर कैट ने एम्स को नोटिस जारी किया है।

देश का नामी स्वास्थ्य केंद्र अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) एक बार फिर विवादों में घिर गया है। एम्स के विभागाध्यक्ष की नियुक्ति में मनमानी के आरोप पर कैट ने एम्स को नोटिस जारी किया है। इस नियुक्ति को एम्स की शैक्षणिक व चिकित्सकीय गुणवत्ता के खिलाफ कदम मानते हुए एम्स निदेशक को जारी नोटिस का 15 दिन के भीतर जवाब देने को कहा गया है। अगली सुनवाई सात नवंबर को है। दूसरी ओर, वरिष्ठ चिकित्सकों की सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाए जाने संबंधी एम्स संस्थान समिति के फैसले के खिलाफ एम्स के युवा डॉक्टर भी लामबंद होने लगे हैं। एम्स आरडीए ने इसके खिलाफ मोर्चा खोलने की चेतावनी दी है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में हाल ही में खाली हुए गैस्ट्रोलॉजी विभाग के मुखिया के पद पर नियुक्ति को लेकर विवाद शुरू हो गया है। एम्स निदेशक डॉक्टर एससी मिश्र ने गैस्ट्रो विभाग के डॉक्टर एसके आचार्य के 31 अक्तूबर को सेवानिवृत्त होने के बाद न्यूट्रीशन यूनिट के डॉक्टर उमेश कपिल क ो यह कहते हुए गैस्ट्रोलॉजी का विभागाध्यक्ष बना दिया कि वे वरिष्ठतम व्यक्ति हैं जिससे उनकी दावेदारी बनती है।


इस आशय का आदेश निदेशक ने सोमवार को जारी कर दिया। इस पर एम्स गैस्ट्रोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉक्टर अनूप सराया ने केंद्रीय न्यायिक अधिकरण (कैट) में इस आदेश के खिलाफ अपील दायर कर दी। डॉक्टर सराया ने दायर अपील में इस नियुक्ति को गैरकानूनी करार दिया और इसके खिलाफ अपील की कि इसे खारिज किया जाए। मानव स्वास्थ्य व जीवनरक्षा जैसे अहम काम व शिक्षण-प्रशिक्षण से जुड़े हर विभाग व यूनिट की अलग विशेषता व तकनीकी जानकारी की अहमियत की दलील देते हुए डॉक्टर सराया ने कोर्ट को बताया कि डॉक्टर उमेश कपिल गैस्ट्रोलॉजी के जानकार नहीं बल्कि मानव पोषण के जानकार हैं जो कि एक विभाग नहीं बस एक इकाई है। ऐसे में तो उन्होंने न गैस्ट्रोलॉजी के स्तर की पढ़ाई की है न ही उनका मरीज देखने या पेट की बीमारियों की जांच व इलाज की जटिल प्रक्रिया पर कभी काम किया है।
तथ्य ये भी हैं कि एम्स के गैस्ट्रोलॉजी विभाग के अधीन एमडी व डीएम स्तर के पाठ्यक्रम चलाए जाते हैं। जिनकी विभागाध्यक्ष न केवल कक्षाएं लेते हैं बल्कि परीक्षाअंों का सारा दारोमदार भी उनके ही मत्थे होता है जिसमें प्रश्नपत्र तैयार करने से लेकर उत्तर पुस्तिकाओं की जांच का काम भी शामिल हैं। इसी तरह इंडोस्कोपी, सिग्मोस्कोपी, बायप्सी सहित तमाम जांचों व लिवर कैंसर सहित तमाम जटिल रोगों के इलाज की जटिल प्रक्रिया खुद करने व उनके प्रशिक्षण का काम भी विभागाध्यक्ष को देखना होता है। उनकी शैक्षणिक व काम के अनुभव संबंधी योग्यता पर सवाल उठाते हुए डॉक्टर सराया ने इस नियुक्ति को खारिज करने की मांग की है। इसके अलावा निदेशक ने दलील दी है कि गैस्ट्रोलॉजी व ह्यूमन न्यूट्रीशन दो अलग इकाई हैं। इनमें जिसका संकाय वरिष्ठ है उसे ही अध्यक्ष बनाया जबकि सरकारी कागजात मे दर्ज तथ्य बताते हैं कि गैस्ट्रोलॉजी एक विभाग है और ह्यूमन न्यूट्रीशन एक शाखा जो गैस्ट्रोलॉजी विभाग के अधीन काम करेगी। इतना ही नहीं यह भी साफ किया गया है कि गैस्ट्रोलॉजी का मुखिया ही न्यूट्रीशन यूनिट के काम को भी देखेगा। इसी वजह से 1973 से जब कि मेडिसिन विभाग से अलग करके गैस्ट्रोलॉजी विभाग बनाया गया तब से गैस्ट्रो के ही व्यक्ति को इसका विभागाध्यक्ष बनाया जाता रहा है।


इतना ही नहीं ह्यूमन न्यूट्रीशन इकाई में प्रोफेसर का पद तक आबंटित नहीं है। जबकि विभागाध्यक्ष के लिए प्रोफेसर होना अनिवार्य योग्यता बताई जाती है। ह्यूमन न्यूट्रीशन में वरिष्ठतम पद सहायक प्रोफेसर का है। यह नहीं, आठ सिंतबर 2016 को हुई विभागीय संकाय सदस्यों की बैठक में प्रस्ताव परित कर आम सहमति भी बनी थी कि विभाग की जरूरत के हिसाब से क्लीनिकल गैस्ट्रोलॉजी के जानकार व्यक्ति को ही विभागाध्यक्ष बनाया जाना चाहिए। इसी तरह तमाम अन्य विभागों के उदाहरण पेश कर बताया गया है कि विभाग के जानकार व्यक्ति को ही विभागाध्य बनाए जाने की परंपरा रही है। वर्ना कई ऐसे विभाग है जहां अगर वरिष्ठता देखी जाती तो हर विभाग में किसी दूसरे विभाग का व्यक्ति पहुंच चुका होता और इनमें से कहीं भी उस क्षेत्र का माहिर व्यक्ति काम नहीं कर रहा होता। इन तमाम तथ्यों पर सुनवाई करते हुए कैट ने एम्स निदेशक को नोटिस जारी कर इस पर जवाब तलब किया है। कैट के इस नोटिस के बाद एक बार फिर से एम्स की साख पर सवाल उठे हैं। अब देखना है कि एम्स इस मामले में अपना बचाव किस तरह करता है।

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First Published on November 5, 2016 12:22 am

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