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दलित उत्पीड़न मामले में कैट ने एम्स से मांगा जवाब

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) भी दलित उत्पीड़न को लेकर सवालों में है। नर्सिंग विभाग की सहायक प्रोफेसर शशि मवार सहित सहायक प्रोफेसर स्तर के तीन संकाय सदस्यों के खिलाफ एम्स की ओर से की गई कार्रवाई...
Author नई दिल्ली | January 30, 2016 02:01 am
दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स)।

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) भी दलित उत्पीड़न को लेकर सवालों में है। नर्सिंग विभाग की सहायक प्रोफेसर शशि मवार सहित सहायक प्रोफेसर स्तर के तीन संकाय सदस्यों के खिलाफ एम्स की ओर से की गई कार्रवाई को अनुसूचित जाति आयोग ने भी दलित उत्पीड़न बता उन्हें काम पर वापस लगाने को कहा था। जबकि मेडिसिन विभाग के डाक्टर कुलदीप कुमार व डाक्टर अरविंद के खिलाफ की गई कार्रवाई के लिए कैट ने गुरुवार को एम्स प्रशासन को नोटिस जारी किया है।

कैट ने एम्स से चार अप्रैल के भीतर जवाब देने को कहा है। इसके पहले भी बनी तीन समितियों ने भी अगल-अगल समय में दी अपनी रपट में पाया है कि एम्स में दलित विरोधी वातावरण रहा है। आरोप है कि दिसंबर 2014 में एक नर्सिंग छात्रा पल्लवी ग्रोवर की आत्महत्या के मामले में प्राचार्य मंजू वत्स ने यहां डिप्टी सुप्रीटेंडेंट रहीं शशि मवार को निशाना बनाया। तमाम छात्राओं से लिखवाया गया कि उन्हें छात्रावास में किससे दिक्कत थी।

उन्हीं पत्रों के आधार पर सहायक प्रोफेसर मवार को पद से हटा कर अनिवार्य प्रतीक्षा में डाल दिया गया। जबकि मामले की पड़ताल कर रही पुलिस ने अपनी जांच रपट में मवार को दोषी नहीं पाया था। जिन छात्राओं ने ज्ञापन दिया था उसमें भी छात्राओं ने व्यवस्थागत खामियों बताते हुए उसके लिए एम्स प्रशासन को दोषी बताया था। इसके अलावा एम्स ओर से डीन की अगुआई में बनी समिति ने भी मवार क ो निर्दोष बताया था। फिर भी काम पर बहाल नहीं हुर्इं मवार ने मामले को अनुसूचित जाति आयोग सहित विभिन्न मंचों पर उठाया। आयोग ने अक्तूबर 2015 में दी अपनी रिपोर्ट में इसे दलित उत्पीड़न का मामला बताते हुए शशि को उनके पद पर तुंरत बहाल करने को कहा था।

इसके बावजूद उन्हें अध्यापन के काम में नहीं लगाया गया बल्कि चिकित्सा अधीक्षक कार्यलय में उनसे जूनियर कर्मचारी के अधीन काम करने को कह दिया गया। आयोग के आदेश पर अमल करने के बजाए इस आदेश के पुनपर्रीक्षण के लिए एक तीन सदस्यीय समिति बना दी गई। यह पुनर्रीक्षण आदेश भी उपनिदेशक प्रशासनिक की ओर से दिया गया। जबकि आयोग क ो सिविल कोर्ट का दर्जा है। ऐसे में इसे आयोग की अवमानना का मामला भी माना जा रहा है।

इन तमाम मानसिक उत्पीड़न से आहत मवार एक महीने की छुट्टी पर चली गई हैं। कैट ने गुरुवार को एम्स से पूछा है कि डॉक्टर कुलदीप कुमार व अरविंद को बर्खास्त करने से पहले उनके खिलाफ आरोपों की समुचित जांच क्यों नहीं की गई? जबकि इस मामले में फैसला लेने क ा हक स्वायत्त संस्था होने के नाते एम्स प्रबंध समिति को है। कुलदीप को एक मरीज से दुर्व्यवहार की शिकायत पर बिना जांच के बर्खास्त कर दिया गया। एम्स के मेडिसिन विभाग अध्यक्ष डाक्टर एसके आचार्य की रिपोर्ट पर कुमार के खिलाफ कार्रवाई की गई है। एम्स के ही एक अन्य सहायक प्रो अरविंद के खिलाफ भी बिना समुचित जांच के कार्रवाई की गई।

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