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कभी डाकुओं की दहशत में रहने वाले चंबल में अब अजगरों का खौफ, 500 से ज्‍यादा सांप आए सामने

आठ सालों में छोटे बड़े मिला कर कम से कम पांच सौ से अधिक अजगर बीहड़ों से बाहर निकल कर सामने आ चुके हैं।
Author इटावा | October 11, 2016 09:05 am
यह अजगर बर्मा के रॉक प्रजाति का है, जो कि संसार के सबसे बड़े सांपों में से एक है।

चंबल घाटी में दुर्लभ प्रजाति के अजगरों के निकलने का सिलसिला थमने का नाम नही ले रहा है। आठ सालों में छोटे बड़े मिला कर कम से कम पांच सौ से अधिक अजगर बीहड़ों से बाहर निकल कर सामने आ चुके हैं।  इटावा प्रभागीय वन निदेशक कन्हैला पटेल ने सोमवार को यहां बताया कि इटावा शहर में सिविल लाइन इलाके के सुल्तानपुरा गांव में निकले एक अजगर ने गांव वालों को काफी परेशान किया। जिसको पकड़ने के लिए वन विभाग के टीम के साथ पर्यावरणीय संस्था के पदाधिकारियो को भी भेजा गया था। पकड़ा गया अजगर करीब 12 फुट लंबा और 40 किलोमीटर वजनी है। यह अजगर काफी जल्द नजर आ रहा है। इससे पहले इस तरह का फुर्तीजा अजगर इटावा मे कभी भी नहीं पकड़ा गया।

पर्यावरणीय संस्था सोसायटी फार कंजरवेशन आॅफ नेचर के सचिव डा. राजीव चौहान का कहना है कि यह अजगर चंबल इलाके में अब तक निकले अजगरों में सबसे बड़ा यह अजगर हो सकता है। करीब 500 से अधिक अजगरों को पकड़ चुके सोसायटी फार कंजरवेशन आफ नेचर के सचिव डा.राजीव चौहान का कहना है कि करीब 12 फुट लंबा और 40 किलोमीटर वजनी यह अजगर काफी जल्द नजर आ रहा है। इससे पहले इस तरह का अजगर इटावा में कभी भी नहीं पकड़ा गया। अजगर को रविवार देर रात में ही फिशरवन के समीप सुरक्षित छोड़ दिया गया है। चंबल में खुला बीहड़ है, जिसकी वजह से यहां पर तमाम किस्म के वन्य जीव जन्म लेते रहते है। इन्ही में एक अजगर चंबल के लोगों के लिए खासी मुसीबत का सबब बन गए है। इटावा में कभी डाकुओं की खासा खौफ हुआ करता था लेकिन उस खौफ से लोगों को भले ही निजात ना मिली हो ऐसे में अजगरों की दस्तक से लोग खासे दहशत जदा हो गए है। जब चंबल में खूखार डाकुओं का आंतक था तब इस कदर अजगरों के निकलने का सिलसिला नहीं था लेकिन आज डाकुओं के आतंक के खत्म होते ही अजगरों ने अपना बसेरा बना लिया है।

इटावा के प्रभागीय निदेशक वन कन्हैया पटेल का कहना है कि अजगर ऐसा सांप है जो लोगों को नुकसान नहीं पहुंचाता है, लेकिन जब उसकी जद में कोई आ जाता है तो बचना काफी मुश्किल हो जाता है। कन्हैया पटेल का कहना है कि अजगरों के शहर की ओर आने के पीछे मुख्य कारण जंगलो का खासी तादात में कटान माना जा रहा है। कटान के चलते अजगरों के वास स्थलों को नुकसान हो रहा है। इसलिए अजगरों को जहां भी थोडी बहुत हरियाली मिलती है। वही पर अजगर अपना बसेरा बना लेते हैं। उनका कहना हैं कि अजगर एक संरक्षित जीव है हिंदुस्तान में सुडूल-वन प्रजाति के अजगरों की संख्या काफी कम हैं। अजगर एक संरक्षित प्राणी है। यह मानवीय जीवन के लिए बिल्कुल खतरनाक नहीं है परंतु सरीसृप प्रजाति का होने के कारण लोगों की ऐसी धारणा बन गई और इसकी विशाल काया के कारण लोगों में अजगर के प्रति दहशत फैल गई है। देश में इस प्रजाति के अजगरों की संख्या काफी कम है, यही कारण है कि इन्हें संरक्षित घोषित कर दिया गया है परंतु इसके बावजूद इनके संरक्षण के लिए केंद्र अथवा राज्य सरकार ने कोई योजना नहीं की है।

डा. राजीव चौहान बताते हैं कि अजगरों के शहरी क्षेत्र में आने की प्रमुख वजह यह है कि जंगलों के कटान होने के कारण इनके प्राकृतिक वास स्थल खत्म होते जा रहे हैं। जंगलों में जहां दूब घास पाई जाती है, वहीं यह अपने आशियाने बनाते हैं। अब जंगलों के कटान के कारण दूब घास खत्म होती जा रही है। इसके अलावा अजगर अपने वास स्थल उस स्थान पर बनाते हैं जहां नमी की अधिकता होती है परंतु जंगलों में तालाब खत्म होने से नमी भी खत्म होती जा रही है। चंबल घाटी के यमुना व चंबल क्षेत्र के मध्य नदियों के किनारों पर सैकड़ों की संख्या में अजगर हैं। हालांकि इन अजगरों की कोई तथ्यात्मक गणना नहीं की गई है। इसके अलावा यहां के लोगों के लिए जहरीले सांपों का भी खतरा लगातार बना रहता है। अजगरों के शहरी क्षेत्र में आने की प्रमुख वजह यह है कि जंगलों के कटान होने के कारण इनके प्राकृतिक वास स्थल खत्म होते जा रहे हैं। जंगलों में जहां दूब घास पाई जाती है, वहीं यह अपने आशियाने बनाते हैं। अब जंगलों के कटान के कारण दूब घास खत्म होती जा रही है। इसके अलावा अजगर अपने वास स्थल उस स्थान पर बनाते हैं जहां नमी की अधिकता होती है परंतु जंगलों में तालाब खत्म होने से नमी भी खत्म होती जा रही है।

 

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