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अनदेखी से दुखी हैं भाजपा के दलित नेता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के आंबेडकर व दलित प्रेम को भाजपा के ही ज्यादातर दलित नेता दिखावा मानते हैं।
Author नई दिल्ली | April 15, 2017 01:14 am
दलित समुदाय के लोग। (प्रतिकात्मक फोटो)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के आंबेडकर व दलित प्रेम को भाजपा के ही ज्यादातर दलित नेता दिखावा मानते हैं। उनकी शिकायत है कि दलितों को पार्टी और सरकार दोनों ही जगह उचित हिस्सेदारी नहीं मिल रही है। और तो और अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष के खाली पड़े पद पर नियुक्ति तक की मोदी सरकार को चिंता नहीं। बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविद को छोड़ एक भी दलित को भाजपा ने केंद्र की सत्ता संभालने के बाद राज्यपाल नहीं बनाया। वाजपेयी सरकार में मंत्री रह चुके भाजपा के एक वरिष्ठ दलित नेता ने तो चौंकाने वाली जानकारी दी। इस नेता को हैरानी है कि भाजपा के बड़े नेता पिछड़ों और अनुसूचित जातियों का फर्क ही नहीं समझते। वे पिछड़ों को भी दलित की श्रेणी में रखते हैं। पार्टी को दलितों की बेचैनी का अहसास न हो, ऐसा नहीं है। उत्तर प्रदेश में सरकार के गठन के बाद अमित शाह अनुसूचित जातियों की संतुष्टि के लिए पार्टी की कमान इस तबके के किसी नेता को सौंप सकते हैं। मौजूदा अध्यक्ष केशव मौर्य चूंकि राज्य सरकार में उपमुख्यमंत्री बन चुके हैं, लिहाजा पार्टी को उत्तर प्रदेश में उनका उत्तराधिकारी चुनना है।

जहां तक केंद्र सरकार का सवाल है मध्यप्रदेश के थावर चंद गहलोत मोदी सरकार में भाजपा के अनुसूचित जाति के इकलौते कैबिनेट मंत्री हैं। इसी तरह पंजाब के विजय सांपला इकलौते प्रदेश अध्यक्ष हैं, जबकि देश में 29 प्रदेश हैं। अनुसूचित जातियों की औसत आबादी देश में 15 फीसद है। अनुसूचित जनजातियों को भी जोड़ लें तो आंकड़ा 22 फीसद से ऊपर बैठता है। संगठन के स्तर पर अमित शाह की टीम में भी कोई दलित नेता अहम पद पर नहीं है। आगरा के सांसद राम शंकर कठेरिया को पार्टी ने 2014 में महासचिव बनाया था। मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री बन जाने पर उन्हें यह पद छोड़Þना पड़ा। बाद में मंत्री पद से भी उनकी छुट्टी हो गई। पर पार्टी महासचिव के पद पर किसी दलित को तैनात नहीं किया गया।

भाजपा के बुजुर्ग दलित नेता संघप्रिय गौतम काफी समय से शिकायत करते रहे हैं कि पार्टी दलितों में जाटव तबके की अनदेखी करती है। इसके पीछे पार्टी नेताओं की यह सोच काम करती है कि सभी जाटव मायावती के समर्थक हैं। इसी अवधारणा के कारण संख्या में कम होते हुए भी आरक्षित सीटों पर पार्टी गैर जाटव दलितों को ही उम्मीदवार बनाती है। चर्चा है कि इस शिकायत को दूर करने के लिए अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष के लिए पार्टी नेतृत्व बिहार के संजय पासवान के नाम पर विचार कर रहा है।

आंबेडकर जयंती के मौके पर शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद नागपुर की दीक्षा भूमि पहुंचे। भुवनेश्वर में शनिवार से शुरू होने वाली पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के लिए चुने गए स्थान का नाम भी पार्टी ने ओड़िशा के दलित कवि भीमा भोई के नाम पर रखा है। लेकिन दलित इतने भर से संतुष्ट नहीं हैं। पार्टी अनुशासन की मर्यादा के कारण वे खुलकर अपनी शिकायत करने से बेशक कतराते हैं, पर मांग उनकी यही है कि उन्हें पार्टी, सरकार और दूसरे अहम स्थानों मसलन राज्यपाल जैसे अहम पदों पर उचित हिस्सेदारी देकर ही भाजपा अपनी पैठ को स्थाई बना सकती है।

अपनी उपेक्षा की भाजपा के दलित नेताओं की शिकायत गैरवाजिब कही भी नहीं जा सकती। उत्तर प्रदेश में पार्टी ने दलितों को मंत्री पद भी कम दिए हैं। मुख्यमंत्री राजपूत हैं तो एक उपमुख्यमंत्री ब्राह्मण और दूसरे पिछड़े तबके के। ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष का पद ही बचता है। सूत्रों के मुताबिक आरएसएस ने कौशांबी के दलित सांसद विनोद सोनकर को देश के सबसे बड़े राज्य में पार्टी की कमान सौंपने की भाजपा नेतृत्व को सलाह दी है। सोनकर इस समय पार्टी के अनुसूचित जाति मोर्चे के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

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