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Assembly Election Results 2016: असम में पहली बार खिला कमल, पुडुचेरी में कांग्रेस को दिलासा

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का मिशन कामयाब हो गया। असम में भाजपा नीत गठबंधन ने मिशन 84 के लक्ष्य को भी पार कर दिया। असम और केरल में सत्ता से बेदखल व पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में विपक्ष में ही बने रहने को मजबूर हुई कांग्रेस को पुडुचेरी ने थोड़ी राहत दी है।
Author नई दिल्ली | May 20, 2016 04:05 am
असम गण परिषद से बीजेपी में आए सर्वानंद सोनोवाल बीजेपी के तरफ से असम के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार बनाए गए थे। चुनाव नतीजे साफ हो जाने के बाद उनका मुख्यमंत्री बनना तय है। –

राज्य में नई सरकार की मुख्य प्राथमिकता वृहद असमिया समुदाय के हितों को सुरक्षा प्रदान करना होगा। असमी, बिहारी, मारवाड़ी, बंगाली, हिंदू, मुसलिम, ईसाई, सिख सभी के साथ मिलकर काम करना है, साथ रहना है और साथ लड़ना है। घुसपैठ को रोकना हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी। भाजपा नीत गठबंधन का यह मुख्य चुनावी मुद्दा भी रहा है। हमारा मुख्य लक्ष्य वास्तविक भारतीय नागरिकों के हितों की सुरक्षा करना है, चाहे वे हिंदू हो या मुसलमान। 

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का मिशन कामयाब हो गया। असम में भाजपा नीत गठबंधन ने मिशन 84 के लक्ष्य को भी पार कर दिया। पार्टी को जबर्दस्त जीत के साथ इतिहास रचने में सफलता मिली और उसने 15 साल से राज्य की सत्ता पर काबिज कांग्रेस को हटा कर पहली बार पूर्वोत्तर के किसी राज्य में सरकार बनाने की हैसियत पाई है। चुनावी नतीजों में भाजपा को 60 सीटों पर जीत हासिल हुई है। जबकि उसकी सहयोगी असम गण परिषद ने 14 सीटें जीती हैं। साथ ही बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट ने भी 12 सीटों पर जीत दर्ज करा दी है। तरुण गोगोई के नेतृत्व में सत्तारूढ़ कांगे्रस महज 26 सीटों पर सिमट गई है। बदरुद्दीन अजमल की एआइयूडीएफ के खाते में 13 सीटें गई हैं। एक सीट निर्दलीय उम्मीदवार ने जीती है।
असम विधानसभा चुनाव के नतीजे एग्जिट पोल के अनुरूप ही रहे और 15 साल से मुख्यमंत्री रहे तरुण गोगोई चौथी पारी खेलने में नाकाम रहे। अपने 15 वर्षों के कार्यकाल में स्पष्ट निर्णयों और आमतौर पर किसी भी विवाद में न रहने के बावजूद गोगोई कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भरने और लोगों को उत्साहित करने में नाकाम रहे।

दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी ने युवा नेता एवं केंद्रीय मंत्री सर्वानंद सोनोवाल को मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के रूप में पेश किया। लोगों ने उनमें विश्वास जताकर पूर्वोत्तर के प्रवेश द्वार माने जाने वाले असम में भाजपा के सत्तासीन होने का मार्ग प्रशस्त कर दिया। भाजपा ने असम में चुनाव की तैयारी दिल्ली और बिहार में हुई भारी हार से पहले से ही शुरू कर दी थी। पार्टी ने राज्य में 126 विधानसभा सीटों के लिए लड़ाई में दो-तिहाई बहुमत हासिल करने के लिए ‘मिशन 84’ का नारा महीनों से दे रखा था। चुनाव परिणाम से स्पष्ट हो गया कि भाजपा नीत गठबंधन को इससे भी ज्यादा सफलता मिल गई। भाजपा ने 84 सीटों के लक्ष्य को हासिल करने के लिए असम गण परिषद (एजीपी) और बीपीएफ से समझौता किया था। चुनाव से पहले कांग्रेस सहित कई दलों के नेताओं ने भी भाजपा का दामन थामा था।

असम में भाजपा को 2011 के विधानसभा चुनाव में महज पांच सीटें ही मिली थी। इस दृष्टि से राज्य में भाजपा की जीत को ऐतिहासिक और अभूतपूर्व माना जा रहा है। 2014 के लोकसभा चुनाव में अलबत्ता पार्टी को राज्य की 14 में से 7 सीटें मिली थीं। भाजपा ने हमेशा की तरह इस बार भी अवैध बांग्लादेशी मुद्दे पर अपनी आवाज बुलंद की। भाजपा नेताओं का दावा है कि राज्य के चुनाव परिणाम इस बात का प्रतीक माने जा रहे हैं कि इस मुद्दे ने अपना प्रभाव छोड़ा है।

राज्य में मुसलिम आबादी 34 फीसद है जिसमें अधिकतर बांग्लाभाषी हैं। नौ जिलों के 39 विधानसभा क्षेत्रों में इनका असर भी है और वे कांग्रेस और बदरुद्दीन अजमल की एआइयूडीएफ को वोट देते आए हैं। पिछली बार अजमल की पार्टी को 18 सीटें मिली थीं। लेकिन इस बार एआइयूडीएफ को नौ सीटें ही मिली हैं। इसके साथ ही राज्य में किंगमेकर बनने का अजमल का सपना भी अधूरा रह गया। अल्पसंख्यक अजमल की पार्टी एआइडीयूएफ और कांग्रेस के बीच में बंटे हुए दिखे।

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के लिए दिल्ली और बिहार में मिली हार के बाद असम एक अहम चुनौती थी। केंद्र में भाजपा के दो साल पूरे होने के समय अमित शाह से लिए यह जरूरी था कि राजनीतिक और चुनावी प्रबंधक के रूप में उनकी साख बनी रहे। असम चुनाव परिणाम इस दृष्टि से भी पार्टी के लिए राहत लेकर आए है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुख्यमंत्री रहते हुए तरुण गोगोई के कार्यकाल में कोई दूसरा नेता उभर कर नहीं आ सका। गोगोई अपने करीबी रहे हेमंत विश्व शर्मा को साथ रखने में विफल रहे और हेमंत ने चुनाव से कुछ महीने पहले भाजपा का दामन थाम लिया था। असम के बराक और ब्रह्मपुत्र की घाटियों वाले क्षेत्र में हेमंत लोगों के बीच खासे लोकप्रिय हैं।

असम में कांग्रेस अकेले दम पर चुनाव लड़ रही थी, जबकि भाजपा ने विभिन्न समीकरणों पर विचार करते हुए असम गण परिषद और बीपीएफ से गठजोड़ किया था। जिसका उसे लाभ मिला। बिहार में कांग्रेस की सहयोगी जद (एकी) ने असम में आरजेडी व एआइयूडीएफ के साथ तालमेल करके लोकतांत्रिक मोर्चा बनाया था और बदरुद्दीन अजमल इस मोर्चे के नेता बने। पर लोकतांत्रिक मोर्चे ने कांग्रेस के वोट में ही सेंध लगाने का काम किया। जिसका नुकसान भी तरुण गोगोई की पार्टी को उठाना पड़ा।

हेमंत बिश्व शर्मा के भाजपा में शामिल होने से भी कांग्रेस पार्टी को नुकसान हुआ। भाजपा को असम गण परिषद से गठजोड़ करने का फायदा मिला। अगप की पहली बार 1985 में और फिर 1996 में सरकार बनी थी। असम की राजनीतिक सत्ता में 1952 से ही कांग्रेस का वर्चस्व रहा है। सिर्फ तीन बार गैर कांग्रेसी सरकारें बनीं। अगप ने दो बार सरकार बनाई और उससे पहले 1978 में जनता पार्टी की सरकार बनी थी।

पांडुचेरी में बिखरी कांग्रेस

तो वहीं दूसरी ओर असम और केरल में सत्ता से बेदखल व पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में विपक्ष में ही बने रहने को मजबूर हुई कांग्रेस को पुडुचेरी ने थोड़ी राहत दी है। राज्य में कांग्रेस-द्रमुक गठबंधन ने गुरुवार को स्पष्ट बहुमत हासिल करते हुए 30 सदस्यीय विधानसभा में 17 सीटें जीत लीं। इस जीत के साथ ही कांग्रेस ने 2011 में एन रंगासामी की एआइएनआरसी के हाथ मिली पराजय का भी बदला ले लिया है। रंगासामी ने कांग्रेस से अलग होकर इस पार्टी का गठन किया था और सत्तासीन हुए थे। उन्हें इस बार आठ सीटों पर ही संतोष करना पड़ा है।
इस केंद्र शासित प्रदेश की 30 सीटों में से कांग्रेस को 15 और उसकी सहयोगी द्रमुक को दो सीटें मिली हैं।

मुख्यमंत्री रंगासामी के लिए यह बड़ा झटका है। जो चौथी बार मुख्यमंत्री बनने की कोशिश में थे। शुरू में सत्तारूढ़ एआइएनआरसी और कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर चल रही थी। लेकिन बाद में इस गठबंधन ने रंगासामी की पार्टी पर बढ़त बना ली। अकेले चुनाव लड़ने वाली जयललिता की अन्नाद्रमुक को चार सीटें ही मिल पार्इं। एक सीट निर्दलीय उम्मीदवार के खाते में गई है। मुख्यमंत्री एन रंगासामी खुद चुनाव जीत गए। उन्होंने इंदिरानगर विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस के उम्मीदवार वी अरूमगम को 3,404 मतों के अंतर से पराजित किया।

एआइएनआरसी, भाजपा और अन्नाद्रमुक ने अकेले चुनाव लड़ा था। केवल कांग्रेस और द्रमुक ने ही गठबंधन किया था। कांग्रेस ने 21 और द्रमुक ने शेष सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ई वलसराज को माहे सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार वी रामचंद्रन से हार का सामना करना पड़ा। डीएमडीके, एमडीएमके, माकपा, भाकपा और आरएसपी के गठबंधन पीडब्ल्यूए ने 28 सीटों पर चुनाव लड़ा। लेकिन उसे एक भी सीट नहीं मिली। कांग्रेस-द्रमुक गठबंधन को बहुमत मिलने के बाद अब ध्यान मुख्यमंत्री के चयन पर केंद्रित होगा।

इस गठबंधन ने किसी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया था। हालांकि नमसिवायम और वैतिलिंगम इस पद के लिए प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं। 2011 के विधानसभा चुनाव में रंगासामी की आॅल इंडिया एनआर कांग्रेस (एआइएनआरसी) और जयललिता की अन्नाद्रमुक ने गठबंधन किया था। एआइएनआरसी को 15 और अन्नाद्रमुक को पांच सीटें मिली थीं। कांग्रेस को सात और द्रमुक को दो सीटें मिली थीं। एक सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार विजयी हुआ था।

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