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जेनरिक दवाओं के लिए अनिवार्य हुआ जैविक समानता अध्ययन

केंद्रीय स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय ने भारतीय बाजार में नई दवाएं उतारने से पहले उनके जैविक-समानता अध्ययन को अनिवार्य कर दिया है।
Author नई दिल्ली | April 29, 2017 00:23 am
जैविक समानता अध्ययन इस बात की पुष्टि के लिए किया जाता है कि पहली बार पेटेंट कराई गई दवा और इसका जेनरिक संस्करण दोनों का जैविक प्रभाव एक समान है या नहीं।

केंद्रीय स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय ने भारतीय बाजार में नई दवाएं उतारने से पहले उनके जैविक-समानता अध्ययन को अनिवार्य कर दिया है। प्रस्तावित सुधार फरवरी में प्रकाशित करके लोगों की राय मांगी गई। उसके बाद ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक रूल्स 2017 को आधिकारिक रूप से संशोधित करके 3 अप्रैल को बदलाव की अधिसूचना जारी की गई। आइएमए ने दवाओं के जैविक समानता अध्ययन को अनिवार्य बनाने की सराहना करते हुए कहा है कि इससे दवाएं सुरक्षित और कारगर होंगी। जैविक समानता अध्ययन इस बात की पुष्टि के लिए किया जाता है कि पहली बार पेटेंट कराई गई दवा और इसका जेनरिक संस्करण दोनों का जैविक प्रभाव एक समान है या नहीं। इसका अर्थ है कि वह दवा उस रूप में भी उसी तरीके से, उसी क्षमता के साथ वही कार्य करती है। इस बारे में जानकारी देते हुए आइएमए के अध्यक्ष डॉ केके अग्रवाल और महासचिव डॉ आरएन टंडन कहते हैं कि लंबे समय से डॉक्टर जेनरिक दवाएं मरीजों को दे रहे हैं, लेकिन उन्हें पता नहीं होता था कि इनका कितना असर मरीजों पर होगा।

जो दवाएं अमेरिका और यूरोप के बाजार में उपलब्ध हों और उन्हें भारत में आए चार साल से कम समय हुआ हो, उन्हें जैविक समानता अध्ययन से गुजरना होता था। स्थानीय उत्पादक बिना जैविक समानता अध्ययन के जेनरिक दवाएं बनाने के लिए पांच साल तक का इंतजार करते थे। जैविक समानता अध्ययन स्वस्थ स्वयंसेवकों के छोटे से समूह पर किया जाता है, जबकि क्लिनिकल अध्ययन उस बीमारी से पीड़ित लोगों पर किया जाता है, जिसकी दवा होती है। इसलिए क्लिनिकल अध्ययन की तुलना में जैविक समानता अध्ययन काफी सस्ता होता है। इस संशोधन के साथ जैविक दवाओं में श्रेणीबद्ध प्रणाली लागू हो जाएगी, जिसके तहत दवाओं की घुलनशीलता और सोखने की क्षमता के आधार पर उन्हें श्रेणीबद्ध किया जाएगा। अब प्रदेश लाइसेंस अथॉरटी से दवा उत्पादन का लाइसेंस पाने के लिए श्रेणी दो और चार का जैविक समानता अध्ययन करवाना अनिवार्य होगा।

डॉ अग्रवाल ने बताया कि यह फैसला सही दिशा की ओर एक अहम कदम है। यह न सिर्फ भारतीय दवा उत्पादन को वैश्विक स्तर के समान लाता है बल्कि यह भी अनिवार्य बनाता है कि दवाएं सुरक्षित और कारगर हों। खासकर तब जब डॉक्टरों को जेनरिक दवाएं लिखने को कहा जा रहा है, ऐसे दौर में यह कदम बहुत महतत्त्वपूर्ण है। विभिन्नतापूर्ण स्वास्थ्य ढांचे के लिए आवश्यक है कि लोगों को किफायती और सुरक्षित दवाएं मिलें। भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि क्लिनिकल रिसर्च करने वाली संस्थाएं जैविक समानता अध्ययन में कोई धोखाधड़ी न करें।

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