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बिहार भाजपा में आपसी कलह-खींचतान जारी, पीएम मोदी के मिशन 2019 की राह में बन सकता है बड़ा रोड़ा

उत्तर बिहार खासकर सीमांचल में अपनी पैठ कैसे मजबूत करें इसको लेकर किशनगंज में 1 से 3 मई तक बीजेपी का गहन मंथन हुआ था।
बिहार प्रदेश भाजपा के बड़े नेतागण। (फाइल फोटो)

एक तरफ बिहार प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के नेता महागठबंधन पर लगातार राजनैतिक हमले करने में लगे हैं और केंद्रीय नेतृत्व मिशन 2019 में बिहार फतह करने की फिक्र में है। वहीं भागलपुर और आसपास का भाजपा संगठन आपसी खींचातानी में फंसा है। आपसी फूट की वजह से ही पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के बावजूद सीमांचल और भागलपुर-बांका संसदीय सीट पर बीजेपी को पराजय का मुंह देखना पड़ा था। 2015 के विधान सभा चुनाव में भी भागलपुर जिले की छह विधान सभा सीटों में से भाजपा एक सीट पर भी नहीं जीत सकी थी। बावजूद इसके भाजपाई एक नहीं हो पा रहे हैं।

रोहित पांडे के भागलपुर जिला भाजपा अध्यक्ष मनोनीत होने के बाद हालात ज्यादा बिगड़े हैं। इनकी बनाई नई कमेटी को भाजपाई ही नाकाम बता रहे हैं। रोहित पांडे का विरोध खुलकर हो रहा है क्योंकि उनका ज्यादा वक्त पटना में ही बीतता है। इधर लीना सिन्हा को महिला मोर्चा का अध्यक्ष बनाने की खबर ने आग में घी का काम किया। मोर्चा की वरीय सदस्य अंजली घोष कहती हैं कि अध्यक्ष बनाने में वरीयता की अनदेखी की गई है। ये चाहती हैं कि बबिता मिश्रा को अध्यक्ष घोषित किया जाए। बगावत के सुर भाजपा के नए जिलाध्यक्ष के खिलाफ पुरुष के साथ-साथ महिला मोर्चा की सदस्यों ने भी अपना लिए हैं। पूनम सिंह, निभा सिंह, पुष्पा प्रसाद, गिरिजा देवी, बिम्मी शर्मा सरीखी महिला नेताओं से बातचीत में साफ जाहिर होता है कि वे इन्हें कतई बर्दाश्त करने के मूड में नहीं हैं।

इतना ही नहीं भागलपुर जिला परिषद के अध्यक्ष अनंत कुमार उर्फ टुनटुन साह भाजपा के ही सक्रिय सदस्य हैं। इनकी पत्नी सीमा साह नगर निगम की महापौर निर्वाचित हुई हैं। इनके पर्चा दाखिले के वक्त इनकी उम्र और बच्चों की उम्र को लेकर चुनाव आयोग के सामने विवाद खड़ा किया गया। आयोग के निर्देश पर इसकी सुनवाई भागलपुर के एसडीओ रोशन कुशवाहा कर रहे हैं। यह बखेड़ा भी भाजपा नेत्री और पूर्व उप महापौर प्रीति शेखर ने ही खड़ा किया था। यहां तक के इस बारे में कोतवाली थाने में एफआईआर भी दर्ज भी कराई गई। टुनटुन साह कहते हैं कि भाजपाई ही भाजपाई को परेशान करने पर तुला है जबकि प्रीति शेखर कहती हैं कि नगर निगम के चुनाव में पार्टी का कोई लेना देना नहीं है।

इसके अलावा शाहनवाज हुसैन और अश्विनी चौबे में भी 36 का आंकड़ा है। इनकी आपसी रंजिश में अश्विनी चौबे को पहले तो बक्सर जाना पड़ा। भागलपुर से टिकट शाहनवाज हुसैन को मिला लेकिन शाहनवाज चुनाव हार गए। बक्सर जाना अश्विनी चौबे के लिए फायदे का सौदा साबित हुआ। वे वहां से चुनाव जीते लेकिन विधान सभा चुनाव में दुश्मनी का बदला भागलपुर शहरी सीट से भाजपा टिकट पर लड़े अर्जित सारस्वत को भुगतना पड़ा। अर्जित बक्सर से सांसद अश्विनी चौबे के बेटे हैं जबकि लगातार पांच दफा भागलपुर सीट से अश्विनी चौबे जीते थे।

बिहार विधान सभा चुनाव में भाजपा के ही विजय साह बागी बन इनके खिलाफ खड़े हो गए। उन्होंने करीब 15 हजार वोट काटकर अर्जित की जीत में रोड़ा खड़ा कर दिया। विजय साह को चुनावी मैदान से हटाने की बहुत कोशिश हुई लेकिन भाजपाई नेताओं ने अपनी रंजिश साधने के लिए विजय बाण चला इनके मंसूबे पर पानी फेर दिया। नतीजतन, कांग्रेस के अजीत शर्मा जीते।

उत्तर बिहार खासकर सीमांचल में अपनी पैठ कैसे मजबूत करें इसको लेकर किशनगंज में 1 से 3 मई तक बीजेपी का गहन मंथन हुआ था। भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक किशनगंज में करने का भी खास मकसद था। इस इलाके में बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा भी भाजपा के लिए पुराना जरूर है मगर हमेशा यह मुद्दा उनके लिए हाशिए पर रहा है। दूसरा इस इलाके में 70 फीसदी आबादी मुस्लिम है। इनमें तीन तलाक का बीजेपी का मुद्दा असरदार तरीके से उछालना भी एक मकसद था। तीसरा बीते लोकसभा चुनाव के मुकाबले 2019 में सीमांचल में एनडीए की पैठ मजबूत करना था। तीन दिवसीय बैठक में जिलों के अध्यक्ष, संगठन प्रभारी, प्रदेश पदाधिकारी, विधायक, सांसद और केंद्रीय मंत्री शरीक हुए। ज़िलों से गए भाजपाइयों को एकजुट रहने का मंत्र देते हुए तोते की तरह समझाया मगर भागलपुर के भाजपाइयों को कोई फर्क ही नहीं पड़ा।

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