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नोटबंदी से दो महीने पहले ही पीएम नरेंद्र मोदी ने फेंक दिया था नीतीश कुमार पर चारा

पीएम मोदी ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय शताब्दी वर्ष समारोह के लिए बनी अखिल भारतीय कमेटी में नीतीश कुमार को रख कर ही चारा फेंक दिया था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलते बिहार के सीएम नीतीश कुमार। (फाइल फोटो-PTI)

नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने और फिर बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाने से बिहार में राजनीतिक उथल-पुथल मची हुई है। पल-पल बदलते घटनाक्रम में तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। पर एक बात तय है कि महागठबंधन तोड़ने में भाजपा नेता सुशील मोदी की भूमिका अहम रही। उन्होंने लालू प्रसाद और उनके परिवार पर लगातार हमले किए और रोज नए-नए आरोप लगाए लेकिन एक बात यह भी साफ हो गई है कि नीतीश कुमार की छवि पहले के मुकाबले अब धुमिल हुई है। नीतीश कुमार जनता के सामने अब किस सिद्धांत की दुहाई देंगे। 2013 में भाजपा से तोड़े अपने नाते की या अब 20 महीने बाद महागठबंधन को तोड़ने का जिसे जनता ने 2015 के विधान सभा चुनाव में बहुमत दिया था।

वैसे जानकार बताते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की जोड़ी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर नोटबंदी से दो महीने पहले यानी सितंबर 2016 से ही चारा फेंक रहे थे। उन्होंने इस दिशा में पहली कोशिश पंडित दीनदयाल उपाध्याय शताब्दी वर्ष समारोह के लिए बनी अखिल भारतीय कमेटी में नीतीश कुमार को रख कर की थी। इसके ग्रीन सिग्नल के रूप में नीतीश कुमार ने भी नोटबंदी का समर्थन किया। इसके बाद दोनों तरफ से समर्थन और तारीफों के सिलसिले चल पड़े। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब इस साल जनवनरी में प्रकाश पर्व में शामिल होने पटना पहुंचे थे, तब उन्होंने शराबबंदी को लेकर नीतीश कुमार की काफी तारीफ की थी। तभी से माना जाने लगा था कि नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी में नजदीकियां बढ़ रही हैं।

राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए उम्मीदवार रामनाथ कोविंद का समर्थन कर, सोनिया गांधी द्वारा बुलाई गई विपक्षी दलों की बैठक में हिस्सा नहीं लेकर और राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण समारोह में अपनी कुर्सी से उठकर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से गर्मजोशी से हाथ मिलाकर नीतीश ने महागठबंधन के टूटते तारों के इशारे पहले ही दे दिए थे।

कहते हैं राजनीति में न कोई स्थाई दोस्त होता है और न कोई दुश्मन लेकिन सिद्धांत स्थाई होते हैं। 2013 में भाजपा की ओर से नरेंद्र मोदी का नाम प्रधानमंत्री उम्मीदवार के लिए आते ही सांप्रदायिकता का मुलम्मा ओढ़कर नीतीश कुमार एक झटके में एनडीए से अलग हो गए थे। ठीक उसी तर्ज पर उन्होंने इस बार भ्रष्टाचार में जीरो टॉलरेंस का सिद्धांत दिखा महागठबंधन तोड़ दिया। यह बात ठीक है कि महागठबंधन को भाजपा सिद्धांत विहीन गठबंधन बताता रहा। लेकिन अब सवाल यह उठ रहे हैं कि क्या भाजपा के साथ मिलकर सरकार बना लेने से क्या यह नीतीश के सिद्धांत वाजिब हो जाएंगे? दूसरी बात यह है कि तेजस्वी पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप के बारे में मुख्यमंत्री रहते नीतीश कुमार ने खुलकर कुछ नहीं कहा। न हां में न ना में । उन्होंने यह भी नहीं कहा कि लगे आरोप गंभीर हैं। सीधे अपना इस्तीफा देकर अपनी प्रतिक्रिया देने के साथ ही राजनीतिक तौर पर एक विरोधी दल को शहनाई बजाने का मौका दे दिया।

नीतीश के इस कदम से 20 महीने पहले कांग्रेस-राजद-जदयू महागठबंधन को मिला बहुमत भी धराशायी हो गया। अब नया गठबंधन कैसा होगा देखना बाकी है, जिसे जनता ने नकारा था। बिहार के इस सियासी भूचाल के दूरगामी नतीजे सामने आएंगे। फिलहाल विपक्षी एकता की हवा निकल गई है।

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