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बिहार: प्रोमोटी डीएम ने डाली थी 700 करोड़ के एनजीओ घोटाले की नींव, जांच करनेवाले कमिश्नर के घर हुई थी चोरी

साल 2011 में सृजन महिला विकास सहयोग समिति लिमिटेड के लेन-देन का गहन सर्वे तत्तकालीन आयकर आयुक्त प्रशांत भूषण की निगरानी में हुआ था।
भाजपा सांसद निशिकांत दूबे ने बयान जारी कर मामले की सीबीआई जांच कराने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अनुरोध पत्र लिखने की बात कही है।

बिहार के भागलपुर में हुए 700 करोड़ के चर्चित एनजीओ घोटाले में जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे इसमें रोज नए-नए खुलासे हो रहे हैं। अब यह उजागर हुआ है कि भागलपुर के एक प्रोमोटी डीएम ने इस घोटाले की नींव डाली थी। रिटायर होने के बाद उस जिलाधिकारी ने चुनाव लड़ा था लेकिन जीत नहीं सके थे। संस्था सृजन महिला विकास सहयोग समिति लिमिटेड की तत्कालीन और संस्थापक सचिव मनोरमा देवी से वो इतने प्रभावित थे कि उन्होंने नियमों को ताक पर रखकर उन्हें मदद की थी। अलबत्ता जब वो रिटायर हो गए, उसके बाद भी लंबे समय तक वो भागलपुर आते-जाते रहते थे। हर बार वो सृजन के खास मेहमान होते थे। सूत्र बताते हैं कि जब वो विधानसभा चुनाव लड़े तो उसका सारा खर्च सृजन ने ही उठाया था। इसके अलावा सृजन के कर्मचारियों ने उनके लिए चुनाव प्रचार भी किया था।

आर्थिक अपराध शाखा की एसआईटी टीम को जांच में ये पता चला है कि उस डीएम ने सभी बीडीओ को निर्देश दिया था कि सृजन संस्था के खाते में सरकारी चेक जमा करें। हालांकि, यह नियम के खिलाफ था लेकिन यह सिलसिला साल 2008 मार्च तक चलता रहा। बाद में दूसरे डीएम ने इस पर रोक लगा दी लेकिन सृजन के लोगों को सरकारी खजाने को चूना लगाने की लत लग चुकी थी। लिहाजा, अधिकारियों की मिलीभगत से यह कारनामा और फलता-फूलता गया। एसआईटी का भी मानना है कि बिना जिलाधिकारियों की मिलीभगत के इतना बड़ा फर्जीवाड़ा नहीं हो सकता है। अब एसआईटी उस डीएम द्वारा जारी पत्र को खोज रही है। अगर वह चिट्ठी निकलती है तो उस पूर्व जिलाधिकारी का फंसना तय है।

सृजन महिला विकास सहयोग समिति की सचिव प्रिया कुमार।

दरअसल, बैंक अधिकारियों, सरकारी विभागों के अधिकारियों की मिलीभगत से सरकारी विभागों का पैसा सृजन के खाते में गलत तरीके से ट्रांसफर किया जाता था। इसके बाद सृजन व्यापारियों को करोड़ों का कर्ज ब्याज पर देता था। इससे सृजन को हर महीने ब्याज के रूप में लाखों रुपये का फायदा होता था। सृजन चूंकि कॉपरेटिव बैंक की तरह काम करता था और महिलाओं का स्वयं सहायता समूह था, इसलिए उसके द्वारा प्राप्त ब्याज पर नियमानुसार टीडीएस कटना चाहिए था। अगर टीडीएस कटता था तो उसका विवरण आयकर विभाग के पास भी होना चाहिए था।

बता दें कि साल 2011 में सृजन महिला विकास सहयोग समिति लिमिटेड के लेन-देन का गहन सर्वे तत्तकालीन आयकर आयुक्त प्रशांत भूषण की निगरानी में हुआ था। इसके साथ ही इनसे जुड़े कई व्यापारिक प्रतिष्ठानों, बिल्डरों और रंक से राजा बने लोगों का भी सर्वे आयकर विभाग की टीम ने किया था। उस वक्त 25 लाख रूपए अग्रिम टैक्स के तौर पर इनसे आयकर विभाग ने वसूले थे मगर संगठित गिरोह को यह रास नहीं आया। आयकर आयुक्त प्रशांत भूषण पर उस समय तरह-तरह के आरोप लगा उन्हें बदनाम किया गया था। फिर दिल्ली में बैठे इनके आकाओं के दबाव में उनका तबादला कर दिया गया था। इनके तबादला होते ही आयकर स्क्रूटनी में इन्हें क्लीन चिट दे दी गई। सूत्र कहते हैं कि अगर यह मामला फिर से खुले तो कुछ और असलियत सामने आ सकती है। प्रशांत भूषण फिलहाल पटना में पोस्टेड हैं। इनसे जनसत्ता.कॉम ने जब बात की तो उन्होंने इस बाबत अपनी हामी भरी है।

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