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प्रभु की रेल: यहां 105 किलोमीटर तय करने में लगते हैं 7 घंटे, ट्रेनों में ना बत्ती, ना पंखा- फिर सरचार्ज कैसा?

देश में बुलेट ट्रेन दौड़ाने की बात हो रही है लेकिन बिहार में ट्रेन तो बैलगाड़ी की रफ्तार से चल रही है।
इस तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

बिहार की नीतीश सरकार राज्य में अच्छी सड़क होने का दावा करती है लेकिन रक्सौल के रास्ते सड़क मार्ग से नेपाल के बीरगंज तक की यात्रा किसी नरक से कम नहीं। रक्सौल बिहार में पड़ता है और भारत-नेपाल सीमा पर है, पर भारत आने-जाने वालों के सामने यहां की सड़क की वजह से बदनामी हो रही है। रक्सौल स्टेशन से बाहर निकलते ही नरक का सफर शुरू हो जाता है। रेलवे क्रासिंग और बीरगंज (नेपाल) सीमा तक अंदाजा लगाना मुश्किल है कि सड़क में गढ्ढे है या गढ्ढे में सड़क। कीचड़ और बारिश के पानी उन गड्ढों में जमाव पैदल चलने वालों का मिजाज बजबजा देता है। रेलवे क्रॉसिंग पर लगने वाले बेतरतीब जाम से निपटने के लिए रक्सौल प्रशासन ने कोई इंतजाम नहीं किया है। सब राम भरोसे है। जाम की वजह से बीरगंज सीमा तक मुसाफिर 4 किलोमीटर पैदल ही अपने-अपने माथे पर सामान लेकर चलने को मजबूर हैं।

देश की अनेकता में एकता की मिसाल पेश करने वाले रेलवे की स्थिति तो और भी बदतर है। इस आधुनिक युग में भी रक्सौल से मुजफ्फरपुर तक करीब 150 किलोमीटर की दूरी तय करने में सुरेश प्रभु की रेल को 7 घंटे लग गए। और ऐसा नहीं है कि यह किसी एक दिन का वाकया हो। यहां के लिए यह रूटीन है। जनसत्ता डॉट कॉम के संवाददाता ने गुरुवार (10 अगस्त को) इस रूट पर यात्रा की। ट्रेन संख्या 13021 हावड़ा- रक्सौल मिथिला एक्सप्रेस ट्रेन सुबह 8 बजे की बजाए साढ़े चार घंटे की देरी से दोपहर 12.30 बजे भागलपुर पहुंची। ट्रेन की लेटलतीफी का पता करने पर जानकारी मिली कि पिछले गुरूवार 3 अगस्त को शाम 7 बजे यह ट्रेन गंतव्य तक पहुंची थी।

रक्सौल से मुजफ्फरपुर के लिए शाम 3 बजकर 35 मिनट के बाद कोई ट्रेन नहीं है। यह जानकर हैरत हुई लेकिन जब स्टेशन परिसर में नजरें दौड़ाईं तो देश के तकरीबन सभी हालिया रेल मंत्रियों का शिलापट्ट वहां मौजूद था। लालू प्रसाद से लेकर मनोज सिन्हा तक का शिलापट्ट है। रेलवे ने एक स्टॉल बनाया तो वहां भी मंत्रीजी का नाम चिपका था मगर मुसाफिरों की सुविधा या ट्रेनों की समय-सारणी से ना तो अधिकारियों का और ना ही इन मंत्रियों का कोई सरोकार नजर आया। बीरगंज के वाशिंदे अक्सर अपने रिश्तेदार या अपने गुरु का आशीर्वाद लेने कहलगांव आते है। उन लोगों ने बताया कि सड़क और ट्रेन दोनों का बुरा हाल है। मुसाफिर हांड़तोड़, थकाऊ और उबाऊ सफर के लिए मजबूर हैं। अब यह समझ में नहीं आता कि सरकार किस बात का सरचार्ज यात्रियों पर लगाती है। और उस मद का पैसा वसूलने के बाद सरकार करती क्या है?

रक्सौल से दो स्टेशन पहले सुगौली स्टेशन है। यहां रक्सौल आने-जाने वाली ट्रेनों के इंजन बदले जाते हैं। यह परंपरा आजादी से पहले से ही है मगर इंजन बदली का तरीका और समय पुराना ही है। वहां बेकार आधा घंटा से ज्यादा वक्त जाया होता है। बस यहीं से मुसाफिरों की यातना यात्रा भी शुरु होती है। ट्रेन में दिखावे के लिए पंखे और लाइट भी लगे हैं पर सब बेकाम। शाम के बाद बॉगी में अंधकार का साम्राज्य है। गर्मी में मुसाफिर तबाह। उस पर से जहां-तहां ट्रेनों का घंटों रोक लंबी दूरी की ट्रेनों को निकालना, छाती पर सांप लौटने से कम नहीं। अगर किसी मुसाफिर को मुजफ्फरपुर से आगे की ट्रेन पकड़नी हो तो छूटना तय है। शुक्रवार को सैकड़ों मुसाफिरों के साथ ऐसा ही हुआ। आगे की ट्रेन निकल जाने के बाद सब बेबस लाचार से खड़े रहे और रात स्टेशन पर ही गुजारनी पड़ी।

देश में बुलेट ट्रेन दौड़ाने की बात हो रही है लेकिन बिहार में ट्रेन तो बैलगाड़ी की रफ्तार से चल रही है। इस पर कोई अधिकारी कुछ कह सकने की स्थिति में नहीं है लेकिन सड़कों की बुरी स्थिति के लिए जब राज्य के पथ निर्माण मंत्री नंदकिशोर यादव से बात करने की कोशिश की गई तो उनके स्टाफ सीताराम सिंह ने बताया कि मंत्रीजी अपने छोटे भाई के श्राद्धकर्म में व्यस्त होने की वजह से बात नहीं कर सकते हैं। दरअसल, उनसे पूछना था कि हारकर भी भाजपा के तो अच्छे दिन आ गए मगर सड़कों और राज्य के मुसाफिरों के अच्छे दिन कब तक आएंगे।

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  1. Surendra Yadav
    Aug 14, 2017 at 3:25 pm
    आरे कछ रक्सौल से टियागंज वाली रेलिया के बारे में छाप बुडबक।
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    Reply
    सबरंग