ताज़ा खबर
 

दशानन रावण के गांव में लगेंगे सवा लाख बेलपत्र, बिसरख को गोद लेगा श्री कल्पतरु संस्थान

रावण की नगरी के रूप में पूरा विश्व सिर्फ लंका के बारे में ही जानता है। उसकी जन्म स्थली के बारे में शायद ही किसी को पता होगा।
रावण के बिसरख गांव कल्पतरु संस्थान के अध्यक्ष विष्णु लाम्बा

रावण की नगरी के रूप में पूरा विश्व सिर्फ लंका के बारे में ही जानता है। उसकी जन्म स्थली के बारे में शायद ही किसी को पता होगा। उत्तर प्रदेश और दिल्ली की सीमा पर बसा बिसरख गांव रावण की जन्म स्थली है। बिसरख का नाम रावण के पिता व ऋषि विशरवा के नाम पर पड़ा है। जो कालांतर में बदलकर बिसरख हो गया। दिल्ली से सटा यमुना का यह तट जंगल था। इसी जंगल में ऋषि की कुटिया थी। गांव में भगवान शिव का प्राचीन मंदिर भी है। इसकी स्थापना ऋषि ने की थी। रावण भी भगवान शिव का अनन्य भक्त था। शिव की भक्ति उसे पिता से विरासत में मिली थी।

इतने महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल का पर्यटन के मानचित्र पर न होना चिंता का विषय है। इस विरासत को सहेजने के लिए कोई पहल नहीं हुई है। देश में पहली बार अब ये बीड़ा पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में देशभर में लंबे समय से कार्यरत संघटन श्री कल्पतरु संस्थान ने उठाया है ! संस्थान अध्यक्ष विष्णु लाम्बा ने अपनी टीम के साथ इस गाँव का दौरा कर राज्य व केंद्र सरकार दोनों को पत्र लिखकर गुहार लगाईं है की अभियान में सहयोग करें ! वृक्ष पुरुष के नाम से मशहूर पर्यावरणविद लाम्बा के गाँव में पहुँचने पर शिव मंदिर महंत रामदास ने स्वागत किया ! इस मोके पर लाम्बा ने गाँव वालो और अपनी टीम के साथ मंदिर परिसर में बिल्वपत्र का पौधा भी लगाया ! लाम्बा ने बताया की संस्थान देश के सौ गाँवों को पर्यावरणीय दृष्ठि से आदर्श ग्राम बनाने को संकल्पित है ! उसी संकल्प के तहत राक्षसराज़ लंकापति रावण के जन्म स्थान बिसरख गाँव को भी शामिल किया गया है !

लाम्बा ने बताया की लोगों ने गांव में उस जगह रावण का मंदिर बनाकर मूर्ति स्थापित की है जहां के बारे में माना जाता है कि उस स्थान पर ऋषि की कुटिया थी। रावण की जन्म स्थली की वजह से बिसरख क्षेत्र में लोग आज भी दशहरा पर रावण दहन नहीं करते हैं।
इस जगह की ऐतिहासिकता जानने के लिए कभी उत्खनन कार्य तक नहीं कराया गया। संभव है कि उत्खनन कार्य होने से बिसरख क्षेत्र में रामायण काल के और अवशेष मिलते। यहाँ आने वाले विश्व के पर्यटकों के लिए रावण की जन्म स्थली आकर्षण का केंद्र होती। आज बिसरख क्षेत्र आधुनिक शहर ग्रेटर नोएडा का हिस्सा बन चुका है। मंदिर के आस पास बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य होने से इलाके का मूल स्वरूप समाप्त हो चुका है। आस पास बहुमंजिला इमारते बन चुकी है। ऐतिहासिक शिव मंदिर में सावन में श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है। लोग हरिद्वार से कांवड़ लाकर शिव का जलाभिषेक करते हैं ! यहां न रामलीला होती है, न ही रावण दहन किया जाता है।

यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है। मान्यता यह भी है कि जो यहां कुछ मांगता है, उसकी मुराद पूरी हो जाती है। शिव मंदिर के पुजारी का कहना है कि 60 साल पहले इस गांव में पहली बार रामलीला का आयोजन किया गया था। उस दौरान गांव में एक मौत हो गई। इसके चलते रामलीला अधूरी रह गई। ग्रामीणों ने दोबारा रामलीला का आयोजन कराया, उस दौरान भी रामलीला के एक पात्र की मौत हो गई। वह लीला भी पूरी नहीं हो सकी। तब से गांव में रामलीला का आयोजन नहीं किया जाता और न ही रावण का पुतला जलाया जाता है। बिसरख गांव का जिक्र शिवपुराण में भी किया गया है। त्रेता युग में इस गांव में ऋषि विश्रवा का जन्म हुआ था। इसी गांव में उन्होंने शिवलिंग की स्थापना की थी। उन्हीं के घर रावण का जन्म हुआ था। अब तक इस गांव में 25 शिवलिंग मिल चुके हैं, एक शिवलिंग की गहराई इतनी है कि खुदाई के बाद भी उसका कहीं छोर नहीं मिला है। ये सभी अष्टभुजा के हैं।
इसी गांव में रावण की पूजा से खुश होकर शिव ने उसे बुद्धिमान और पराक्रमी होने का वरदान दिया था। परंपरा के मुताबिक इस गांव के लोग दशहरा तो मनाते हैं, लेकिन रावण दहन नहीं किया जाता। रावण बुद्धिमानी और राजनैतिक चतुराई का प्रतीक था। उसने अपनी चतुराई से शिव से लंका छीन ली थी।
आज भी गांव के लोग खुद को गौरवान्वित महसूस करते है। उसका तर्क है कि रावण ने उस जमाने में लंका पर विजय पताका फहराकर राजनैतिक सूझबूझ और पराक्रम का परिचय दिया था। यहां यह माना जाता है कि रावण ने राक्षस जाति का उद्धार करने के लिए सीता का हरण किया था। इसके अलावा दुनिया में कोई ऐसा साक्ष्य नहीं है, जब रावण ने किसी का बुरा किया हो ।
लाम्बा ने बताया की गाँव की सीमा में प्रवेश करते ही हर जगह प्राकृतिक रूप से लगे भांग के पौधे उगे नज़र आते है जिसे गाँव वाले भगवान् शकर से जोड़कर देखते है ! अब इंतज़ार है तो केवल सरकार के समर्थन और सहयोग का ! आशा है जल्द दशानंद के पैतृक गाँव के दिन फिरेंगे !

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.