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अब एम्स अस्पताल से गरीब मरीजों को ले सकते हैं गोद

इस मदद योजना को ‘एडॉप्ट अ पेशेंट’ नाम दिया गया है ताकि कोई दानकर्ता या कंपनी चाहे तो आजीवन उस मरीज की मदद कर सकता है।
Author नई दिल्ली | June 5, 2016 01:12 am
AIIMS का फाइल फोटो

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में गरीब मरीजों या महंगे उपकरण के भरोसे जिंदगी जीने वाले मरीजों की मदद के लिए धन जुटाने की मुहिम के तहत ‘एडॉप्ट अ पेशेंट’ योजना शुरू की गई है। इसमें निजी कंपनियों सहित आम दानकर्ताओं से दान लेने की पहल की गई है। यह जानकारी एम्स निदेशक डाक्टर एमसी मिश्र ने पत्रकारों को दी। उन्होंने बताया कि सड़क हादसे जैसी विभिन्न दुर्घटनाओं में मरने या घायल होकर अशक्त होने वालों मरीजों की तादात कैंसर व हार्ट अटैक से मरने वालों या पीड़ित मरीजों की तुलना में कई गुना ज्यादा है।

मिश्र ने बताया कि ऐसे मरीज जिनकी रीढ़ की हड्डी में गहरी चोट लगी हो उन्हें लंबे समय तक वेंटीलेटर की जरूरत होती है या महंगे डिवाइस के सहारे उन्हें जिंदा रखा जा सकता है। लेकिन वे आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण अस्पताल में ही पड़े रहते हैं। ऐसे मरीजों को यदि घर पर रखने के लिए पोर्टेबल वेंटिलेटर, बाईपैप या दूसरे जरूरी उपकरणों के लिए आर्थिक मदद मिल जाए तो बड़ी राहत होगी। एक तो उस मरीज को इससे सहूलियत होगी जो पैसों के अभाव में यह खुद नहीं कर पा रहा था। दूसरे ऐसे मरीजों को छुट्टी मिल जाने से नए मरीजों को बिस्तर व वेंटीलेटर मिल सकेगा।

मिश्र ने बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की रपट के मुताबिक देश में कैंसर व हार्ट अटैक से होने वाली मौतों से कई गुणा ज्यादा मौतें दुर्घटनाओं से होती हैं। दुर्घटनाग्रस्त चार लाख घायलों में 10 से 12 फीसद घायलों को गहरी चोट लगी होती है। इनमें से 50-60 फीसद को हल्की चोटें आती हैं। उन्होंने बताया कि एम्स के ओपीडी में हर दिन आठ से दस हजार मरीज आते हैं। यहां सालाना करीब दो लाख मरीज भर्ती होते जाते हैं। इनमें से 40 फीसद इलाज का खर्च उठाने में सक्षम नहीं होते हैं। यहां तक कि सर्जरी की जरूरत से जुड़े सामान नहीं खरीद पाते। करीब 20 फीसद मरीज ऐसे होते हैं जिन्हें पैसों के अभाव या उसके इंतजार के कारण लंबे समय छुट्टी नहीं मिल पाती है। सिर में चोट के 1000 मरीज और रीढ़ में चोट के 500 मरीज ट्रॉमा सेंटर में हर साल आते हैं। कुल मरीजों में से मुश्किल से एक फीसद मरीजों का ही बीमा होता है। डाक्टर मिश्र ने लोगों से बीमा कराने और हर रोज अपने लिए एक रुपए बचाने की अपील की। उन्होंने कहा, इलाज इतना महंगा है कि न केवल गरीब बल्कि उच्च मध्यम वर्ग भी इलाज का खर्च नहीं उठा पाता और यह चोट पूरे परिवार पर भारी पड़ती है।

डाक्टर दीपक अग्रवाल ने बताया कि ऐसे मरीजों का ब्योरा एम्स की वेबसाइट पर डाल कर उसके लिए आर्थिक मदद की अपील की जाएगी। किस मरीज का ब्योरा डाला जाएगा यह विभाग के अध्यक्ष तय करेंगे।

उन्होंने बताया कि रीढ़ की चोट से पीड़ित मरीजों को कई बार जीवन भर तमाम तरह के उपकरणों की जरूरत होती है। इसलिए इस मदद योजना को ‘एडॉप्ट अ पेशेंट’ नाम दिया गया है ताकि कोई दानकर्ता या कंपनी चाहे तो आजीवन उस मरीज की मदद कर सकता है। अग्रवाल ने स्टेम सेल सहित नई पद्धति से इलाज और शोध के लिए भी दान से पैसा जुटाने की पहल की है। मरीजों को दान की गई रकम सौ फीसद कर मुक्त होगी और शोध के लिए दी गई राशि पर 175 फीसद की छूट होगी। योजना के तहत कोई भी दस रुपए से लेकर कितना भी दान दे सकता है। योजना से सालाना 100 से 200 करोड़ रुपए संग्रहित होने की उम्मीद जाताई गई है।

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  1. N
    Nimmi Kukreti
    Jun 5, 2016 at 7:38 am
    बहुत बढ़िया पहल है। अब ग़रीबों को भी मिलेंगे मसीहा। शुभकामनाएं।
    Reply
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