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उड़ी हमले के बाद रॉ को मजबूत करने की कवायद

उड़ी हमले और सीमा पर तनाव के बाद मोदी सरकार अरसे से उपेक्षित पड़ी सीमा पार की खुफिया जानकारियां जुटाने वाली एजंसी ‘रिसर्च एंड एनॉलिसिस विंग’ (रॉ) को दोबारा मजबूत करने की तैयारी कर रही है।
Author नई दिल्ली | October 18, 2016 00:52 am

दीपक रस्तोगी  

उड़ी हमले और सीमा पर तनाव के बाद मोदी सरकार अरसे से उपेक्षित पड़ी सीमा पार की खुफिया जानकारियां जुटाने वाली एजंसी ‘रिसर्च एंड एनॉलिसिस विंग’ (रॉ) को दोबारा मजबूत करने की तैयारी कर रही है। इसके लिए राजनयिक मामलों में रॉ की पैठ बढ़ाने की तैयारी है। पाकिस्तान, चीन, रूस और यूरोपीय समुदाय की डेस्क को पुनर्गठित किया जा रहा है। आर्थिक, सूचना तकनीक, ऊर्जा सुरक्षा और अत्याधुनिक वैज्ञानिक जानकारियों से रॉ को लैस करने के लिए इजराइली खुफिया एजंसी मोसाद के साथ सहयोग बढ़ाने की दिशा में भी काम चल रहा है। उड़ी हमले के बाद सुरक्षा मामलों की एक उच्चस्तरीय बैठक में रॉ का हाल सामने आने के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय ने आनन-फानन में कई फैसलों को मंजूरी दे दी। सुब्रह्मण्यम कमेटी की रिपोर्ट को आधार बनाकर फिलहाल पाकिस्तान की डेस्क को बांटकर चार नए डेस्क बनाने का काम शुरू भी कर दिया गया है। अब बलूचिस्तान, पंजाब, पेशावर और पश्चिमी सीमांत डेस्क बनाने की तैयारी है। हर एक डेस्क की जिम्मेदारी संयुक्त सचिव स्तर के एक अधिकारी के पास होगी। पाकिस्तान डेस्क अभी दीपक कौल के पास है, जो 2006 तक पाकिस्तान में बतौर वीजा काउंसिलर तैनात रहे। उस साल पाकिस्तानी खुफिया एजंसी आइएसआइ ने उनका अपहरण कर रॉ के लिए काम करने का आरोप लगाया था।

रॉ में अभी पांच डेस्क हैं, जिनकी जवाबदेही संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारियों के पास है। पाकिस्तान के अलावा, चीन और दक्षिण एशिया, पश्चिम एशिया व अफ्रीका, अन्य देश एवं इलेक्ट्रॉनिक जासूसी। पाकिस्तान के अलावा चीन और रूस के लिए अलग से प्रभाग बनाने की जरूरत महसूस की जा रही है। नेशनल सिक्यूरिटी एडवाइजरी बोर्ड के चेयरमैन और पूर्व आइपीएस पीएस राघवन को दोनों देशों के लिए विशेष तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल की टीम में शामिल किया गया है। अभी हाल में रूस के साथ रक्षा सौदों की रूपरेखा तैयार करने में राघवन की अहम भूमिका रही है। उन्हें क्रेमलिन और बेजिंग का विशेषज्ञ माना जा रहा है। दीपक कौल और राघवन की तरह संयुक्त सचिव और अतिरिक्त सचिव स्तर के कम से कम आठ अफसरों को अलग-अलग प्रभाग बनाकर सक्रिय किया गया है, जो रॉ या खुफिया ब्यूरो में उल्लेखनीय काम कर चुके हैं।

फील्ड स्टॉफ की भर्ती की कवायद भी शुरू की गई है। पीएमओ ने कुछ दिन पहले ही रॉ में रिसर्च एंड एनॉलिसिस सर्विसेज (आरएएस) के जरिए तकनीकी विशेषज्ञों और नए कैडर भर्ती करने को मंजूरी दी है। राजीव गांधी के जमाने के बाद कुछ भर्तियां की गई थीं। इसके बाद 2004-2005 और 2009-2010 में भी भर्तियां की गईं, लेकिन वे कामचलाऊ रहीं। रॉ के पूर्व डिप्टी चीफ उप्पाला बालाचंद्रन के अनुसार, ‘सेना या अंतरिक्ष कार्यक्रम को डेप्युटेशन पर भेजे गए अधिकारियों के भरोसे नहीं चलाया जा सकता। यही बात खुफिया एजंसियों पर भी लागू होती है।’

उप्पाला बालाचंद्रन 1992 की उस टीम में थे, जब रॉ के पूर्व चीफ एके वर्मा ने भारतीय रॉ और इजराइली मोसाद के बीच खुफिया सहयोग शुरू कराया था। कनाट प्लेस में दो इंवेस्टमेंट कंपनियां खोलीं गईं और उन कंपनियों में मोसाद के कुछ अधिकारियों को कर्मचारी बनाया गया। रॉ के आपसी झगड़े में इन कंपनियों के नाम सार्वजनिक होने के बाद यह आॅपरेशन बंद कर दिया गया। अब दोबारा कुछ इसी तर्ज पर कवायद शुरू की गई है। मोसाद के साथ जुगलबंदी वित्तीय सुरक्षा, आर्थिक विश्लेषण, अंतरिक्ष कार्यक्रम, सूचना तकनीक और ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में सक्रियता बढ़ाने के लिए की जा रही है।
दरअसल, अरसे से सुस्त पड़े रॉ में जान फूंकने की थोड़ी-बहुत कोशिश जनवरी 2015 में शुरू की गई, जब राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने रजिंदर खन्ना को रॉ का प्रमुख चुना। उनको घुसपैठ विरोधी अभियानों और पूर्वोत्तर में सीमा पार लक्षित हमले कराने का माहिर माना जाता रहा है। उड़ी हमले के बाद लक्षित हमलों के लिए जुटाई गई रॉ की सूचनाओं से सेना का काम काफी आसान हो गया।

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