December 08, 2016

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दस साल बाद दिवंगत मेजर शुभम के घर मनाई गई दीपावली

शुभम की अचानक मौत की खबर सुनकर उनका परिवार टूट गया था और आज तक उनका परिवार यह गम नहीं भुला पाया है।

Author हरिद्वार | November 1, 2016 06:50 am
इलाहाबाद में दिए जलाकर दीवाली का त्योहार मनाते लोग। (Image Source: PTI)

दिवंगत मेजर शुभम अग्रवाल के घर दस साल बाद दीपावली मनाई गई। शुभम की जयपुर के पास हाई-वे पर एक सड़क दुर्घटना में 11 नवंबर 2005 को दर्दनाक मौत हो गई थी। तब शुभम 28 साल के थे, और उनकी पत्नी केवल 27 साल की थी। उनकी शादी को केवल दो साल ही हुए थे और उनके कोई बच्चा भी नहीं था।

शुभम की मां आशा अग्रवाल बताती हैं कि 2005 में हुई शुभम की मौत के बाद उनका मन ही नहीं हुआ कि वे दीपावली मनाएं। दीपावली दिन वे न तो घर के बाहर बिजली की लड़ियां लगाती थीं और न ही फूलों की माला। आशा अग्रवाल का कहना है कि इस बार जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से एक दीया शहीद सैनिकों के नाम जलाने की अपील की तो पूरे देश में लोगों ने दीपावली में शहीद सैनिकों की याद में उनके चित्र के आगे दीया जलाया तो वे भावुक हो उठीं।

उनके पति कौशल अग्रवाल के एक मित्र के बेटे सुमित अपने दोस्तों के साथ रविवार को दीपावली की शाम कनखल स्थित ज्ञानलोक कॉलोनी में मेरे घर आए और मेरे शहीद बेटे मेजर शुभम की फोटो के आगे दीया जलाने और दीपावली मनाने का आग्रह किया तो वे खुद को रोक नहीं सकीं। और प्रधानमंत्री मोदी की शहीदों के नाम मार्मिक अपील ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। उन्होंने बताया कि मेजर शुभम के इस दुनिया से चले जाने के दस साल बाद इस बार मेरे घर दीपावली मनाई गई। आशा अग्रवाल का कहना है कि शहीद सैनिकों के लिए जैसा सम्मान इस दीपावली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिया है वैसा सम्मान आज तक किसी भी प्रधानमंत्री ने दिया है।.

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शुभम की अचानक मौत की खबर सुनकर उनका परिवार टूट गया था और आज तक उनका परिवार यह गम नहीं भुला पाया है। 2005 की दीपावली के बाद 11 नवंबर को कौशल अग्रवाल और उनकी पत्नी आशा अग्रवाल को जब अपने बेटे शुभम की मौत की खबर लगी तो उन्हें भरोसा नहीं हुआ। शुभम के पिता कौशल अग्रवाल को अपने बेटे की मौत का गम दिल पर इतना ज्यादा बैठ गया था कि दो साल बाद 12 दिसंबर, 2007 को उन्होंने दम तोड़ दिया। घर पर शुभम की मां आशा अग्रवाल और छोटी बहन नेहा ही रह गईं थीं। मेजर शुभम के पिता डॉ. कौशल अग्रवाल गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय में रसायन विज्ञान विभाग में डीन थे। नेहा और उसका पति लंदन में सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं।

उन्होंने कहा कि मेजर शुभम के चले जाने का जो गम उनके दिल में समा गया है, वह कभी नहीं भुलाया जा सकता। उन्होंने कहा कि वे जिस घर में रहती हैं, उस घर को बनाने वाले उनके पति और बेटे ही इस दुनिया में नहीं रहे। वे पति और बेटे के गम में आशा अग्रवाल को ब्लडप्रेशर और डिप्रेशन जैसी बीमारियों ने घेर लिया है। मेजर शुभम का जिक्र करते हुए आशा अग्रवाल भावुक हो जाती हैं और अपने बेटे की खूबियों का जिक्र करते हुए कहती हैं कि शुभम ने हरिद्वार के गुरूकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय से बीएससी पास की थी और वह एमसीए कर रहा था।

उसके भीतर भारतीय थल सेना में जाने का जुनून सा था। सेना के संयुक्त टैस्ट में उन्होंने मेरिट में स्थान पाया था और थल सेना, वायुसेना और नौसेना में वे रैंकिंग में सबसे आगे थे। वायुसेना में वे टॉप में थे। पर मेरे कहने पर शुभम वायुसेना की जगह थल सेना में गए। वे अपने अफसरों से कहते था कि मेरी मां को पायलट की नौकरी से बहुत डर लगता है। इसलिए मां की खातिर मैंने थल सेना ज्वाईन की है। 2005 में उनकी पोस्टिंग राजस्थान में हुई थी। उससे पहले वे कश्मीर के राजोरी में तैनात था जहां उन्होंने कई आतंकवाद निरोधक अभियानों की अगुआई की। वे थल सेना की पांच राजपूताना राइफल्स में मेजर थे।
आशा अग्रवाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से गुजारिश करती हैं कि कभी-कभी सैनिकों के फंड और पारिवारिक पेंशन घर वालों को मिलने में बहुत देरी होती है। केंद्र सरकार को शहीद सैनिकों के परिवारों की दिक्कतों का ख्याल रखते हुए उनकी पेंशन और फंड भी जल्दी ही देना चाहिए।

 

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First Published on November 1, 2016 6:50 am

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