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मुद्दों के शोर में बदलाव की हवा

पंजाब अपने सत्ता विरोधी रुझान के लिए जाना जाता है। सरकार हर पांच साल बाद बदल जाती है। ऐसे में पिछली बार अकाली-भाजपा गठबंधन का लगातार दूसरी बार सत्ता में आना लोगों को चौंका गया।
Author December 4, 2016 03:39 am

वंदना

पंजाब अपने सत्ता विरोधी रुझान के लिए जाना जाता है। सरकार हर पांच साल बाद बदल जाती है। ऐसे में पिछली बार अकाली-भाजपा गठबंधन का लगातार दूसरी बार सत्ता में आना लोगों को चौंका गया। पर लगता नहीं कि जीत की हैट्रिक इतनी आसान है। कैप्टन अमरिंदर सिंह की अगुआई में कांग्रेस कमर कस के मैदान में है और सत्ता में आने की आस लगाए हुए है तो आम आदमी पार्टी मुकाबले को तिकोना बनाने की जुगत में है। देखने वाली बात होगी कि वह अपने मकसद में कितनी कामयाब हो पाती है। भ्रष्टाचार, खेती किसानी की समस्याएं, बेरोजगारी और दलितों के सदाबहार मुद्दे तो हैं ही, उनके साथ इस बार नशे की लत, व्यास-सतलज जोड़ नहर और अचानक सबसे बड़ा मुद्दा बनकर उभरा विमुद्रीकरण भी है जिसने एक झटके में राजा-रंक सभी को एटीएम की कतार में खड़ा कर दिया। ये मुद्दे चुनाव में क्या गुल खिलाएंगे और उंट किस करवट बैठता है, यह तो चुनाव के बाद ही पता चलेगा।
विमुद्रीकरण के बाद एटीएम और बैंकों के बाहर पैसे निकालने के लिए लगी लंबी कतारों के बावजूद भाजपा को लगता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रधानमंत्री मोदी के इस फैसले में दिक्कत झेलकर भी जनता उसके साथ है, तो विपक्षी कांगे्रस और आप कह रहे हैं कि इस फैसले ने आम आदमी के सामने दिक्कतों का अंबार लगा दिया है और भाजपा को इसका खमियाजा भुगतना होगा। वैसे तो विधानसभा चुनाव में स्थानीय मुद्दे राष्ट्रीय मसलों पर भारी पड़ते हैं लेकिन नोटबंदी का फैसला ऐसा रहा है जिसने बेहद निचले स्तर पर आम आदमी तक को प्रभावित किया है और सूबे में भी इसकी गूंज दिखती है। उप मुख्यमंत्री और शिरोमणि अकाली दल (शिअद) के अध्यक्ष सुखबीर बादल ने जलंधर छावनी में जब पार्टी उम्मीदवार अवतार सिंह मक्कड़ के समर्थन में आयोजित रैली में जब कहा कि ‘तुसीं मक्कड़ नूं जिता देओ, मैं दो ट्रक नवें नोटां दे भर के भेज दवांगा,’ तो यह बात कई लोगों को हजम नहीं हुई। सवाल यह भी था कि उनके पास नए नोट कहां से आएंगे, बैंक में तो अपने जमा पैसे भी आसानी से नहीं निकल रहे।
भाजपा और अकाली दल विमुद्रीकरण को भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ी जंग बता रहे हैं, लेकिन सच यह भी है कि सूबे में भ्रष्टाचार सबसे बड़े मुद्दों में से एक है। युवा परिवर्तन चाहते हैं क्योंकि उनके मन में यह बात घर कर चुकी है कि बिना पैसे के सरकारी नौकरी मिलनी नहीं। आप ने इसे भुनाने की कोशिश की है और कांग्रेस ने भी। आम लोग भी मानते हैं कि अकाली-भाजपा गठबंधन पिछले दस साल में भ्रष्टाचार पर नकेल नहीं कस पाया है उलटे यह ज्यादा फैल गया है। सत्तारूढ़ दल, खासकर बादल परिवार और अकाली नेताओं पर, भ्रष्टाचार के खूब आरोप लगते रहे हैं। लोग तो यह भी कहते हैं कि भ्रष्टाचार तो कांग्रेस के समय भी था पर तब पैसे देकर काम हो जाता था पर अब तो पैसे देने के बाद भी पक्का नहीं। कारण है -सत्ता का केंद्रीकरण।
एसवाइएल नहर के मुद्दे को लेकर शिअद, कांगे्रस और आप तीनों दहाड़ रहे हैं। शिअद का दावा है कि कांग्रेस ने ही इसकी शुरुआत की और हम यह किसान विरोधी नहर नहीं बनने देंगे। कांग्रेस का आरोप है कि मुख्यमंत्री बादल ने ही तो इसके लिए हरी झंडी दी थी पर हम इस किसान विरोधी फैसले को हरगिज लागू नहीं होने देंगे। आप के केजरीवाल का कहना है कि शिअद और कांग्रेस दोनों ही इस नहर के हक में हैं। सिर्फ दिखावे का विरोध हो रहा है और सिर्फ आप इसका विरोध कर रही है। ‘पंजाब का पानी हरगिज किसी को नहीं देंंगे। जान दे देंगे पर पानी नहीं देंगे।’ आदि नारे हर दल के नेता की जुबान पर हैं। तमाम दल इस मुद्दे के सहारे सत्ता लपकना चाहते हैं। राष्ट्रपति तक के पास न्याय के लिए पहुंच चुके हैं दलों के नेता जबकि असलियत यह है कि यह मुद्दा राज्य सरकार के हाथ में है ही नहीं। फिलहाल मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।
दिलचस्प यह कि इस मुद्दे से सबसे ज्यादा प्रभावित किसान समुदाय चुप बैठा है। पूछने पर किसान कहते हैं कि जनाब पानी तो सबका होता है। अगर हमारे पानी से किसी दूसरे राज्य की फसल भी लहलहाती है तो इसमें क्या बुराई। अपने लिए पानी कम रह जाने की बात पर कहते हैं – नहरी पानी तो चाहिए पर अभी ज्यादातर सिंचाई ट्यूबवेलों से ही होती है। तो फिर इसमें झगड़े की बात ही कहां रह जाती है। किसान संगठनों का भी कहना है कि वे इस बार किसी के झांसे में नहीं आएंगे। अपनी फसल की बिजाई, सिंचाई को छोड़ इन नेताओं के पीछे लग गए तो फसल भी जाएगी और ये नेता लोग तो सत्ता हथियाते ही अपने रास्ते हो लेंगे।
एक और बड़ा मुद्दा है – सूबे में नशे के फैलते बाजार का। विपक्ष इसके लिए सीधे सुखबीर बादल और उनके रिश्तेदार मंत्री मजीठिया पर निशाना साध रहा है। कांग्रेस इस मुद्दे पर सबसे ज्यादा मुखर है। उसका ‘चिट्टा’ का नारा काफी मशहूर हुआ है। उधर, शिअद नेताओं की दलील है कि यहां नशे का कारोबार नहीं है पर नशे की बिक्री के लिए ‘पड़ोसी देश और राज्य’ जिम्मेवार है। लेकिन तय है कि इस चुनाव में यह एक बड़ा मुद्दा रहेगा।
पंजाब का 32 फीसद वोटर दलित समुदाय से है लिहाजा इस वर्ग को लुभाने की कोशिश भी दिख रही है। बूथ तक पहुंचने वाला ‘असली वोटर’ यही वर्ग है सो इसे लुभाने के लिए भी जोर शोर से वादे हो रहे हैं। आप नेता केजरीवाल दलित घोषणापत्र के जरिए सत्ता में आने की सूरत में किसी दलित को उपमुख्यमंत्री बनाने की बात कह चुके हैं। भाजपा ने तो कुछ महीने पहले दलित वर्ग के विजय सांपला को सूबे की कमान सौंप दी। कांग्रेस भी कह रही है कि दलित उसके समय में ही सबसे ज्यादा खुशहाल रहे हैं।
पिछले दिनों में कुछ बड़ी राजनीतिक घटनाएं भी हुई हैं। भाजपा छोड़ने वाले नवजोत सिंह सिद्धू पत्नी और पूर्व हाकी खिलाड़ी परगट सिंह को कांग्रेस में दाखिल करवा चुके हैं और पार्टी का प्रचार करने की तैयारी में हैं। निर्दलीय विधायक बैंस बंधु आप में पहुंच चुके हैं। अकाली दल ने पिछले पांच साल में कई विधायक अपने पाले में जोड़े हैं। यहां सवाल यह भी है कि आप और कांग्रेस जिस ताकत से मैदान में हैं, उससे वोटों के बंटवारे में क्या अकाली दल अपना रास्ता निकाल पाएगा? हालांकि, अब जबकि चुनाव पास हैं तो कई इधर से उधर पाला बदलने की तैयारी में होंगे। आप और अकाली दल उम्मीदवारों की कुछ सूचियां जारी कर चुके हैं।
बदलाव का माहौल तो दिख रहा है लेकिन अंतत: आप और कांग्रेस के वोटों के बंटवारे का क्या नतीजा निकलेगा, यह देखना दिलचस्प होगा। शिअद-भाजपा समर्थक दावा कर रहे हैं कि अंदरखाते वोटर उसके साथ हैं और गठबंधन तीसरी बार सरकार बनाएगा। अकाली दल के बड़ों के हलकों तक में पंच-सरपंच दबी जुबान में कहते हैं कि आचार संहिता लागू होने दो, दलबदलुओं की ‘भीड़’ लग जाएगी। ग्रामीण हलकों में यह भी आवाज है कि एक मौका नई पार्टी को दिया जाए, कांग्रेस को तो पहले दे चुके हैं। तो क्या माना जाए लोग फैसला कर चुके हैं? क्रांति पंजाब के लोगों के खून में बहती है। जब बात जिद्द की हो तो फिर वे नफा-नुकसान परे रख सिर्फ दिल की सुनतेहैं।

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