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‘सोफी का संसार’ कराएगी दर्शन की नई शैली का साक्षात्कार

दर्शनशास्त्र पढ़ाने वाले शिक्षक ने जब अपने विद्यार्थियों से पूछा कि उन्हें क्या पढ़ना सबसे अच्छा लगता है तो जवाब मिला, ‘रहस्यमय उपन्यास’।
Author नई दिल्ली | August 20, 2016 02:53 am
प्रतीकात्मक सर

नार्वे की राजधानी ओस्लो में दर्शनशास्त्र पढ़ाने वाले शिक्षक ने जब अपने विद्यार्थियों से पूछा कि उन्हें क्या पढ़ना सबसे अच्छा लगता है तो जवाब मिला, ‘रहस्यमय उपन्यास’। दर्शनशास्त्र के शिक्षक जस्टिन गार्डर अपने विद्यार्थियों के इस जवाब से मायूस नहीं हुए और उसे चुनौती की तरह लिया। और इस चुनौती का नतीजा था 1991 में आया उपन्यास ‘सोफीज वर्ल्ड’। इस उपन्यास में पाश्चात्य दर्शन के गूढ़ सवालों को कहानी के रूप में पेश किया गया है। विश्व की 60 भाषाओं में अनूदित हो चुकी इस किताब के लिखे जाने के 25वें साल के उपलक्ष्य में ‘सोफी के संसार’ को हिंदी भाषियों के बीच लेकर आए हैं प्रोफेसर सत्यपाल गौतम। पिछले दिनों राजकमल द्वारा प्रकाशित ‘सोफी के संसार’ का विमोचन किया गया।

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में दर्शन अध्ययन केंद्र में पढ़ा रहे प्रोफेसर गौतम बताते हैं-इस उपन्यास में दर्शनशास्त्र की एक कहानी के रूप में व्याख्या की गई है। यह एक रहस्यमय और रोचक उपन्यास है। कहानी की काल्पनिक नायिका सोफी को अपने घर के लेटर बाक्स में एक पुर्जा मिलता है जिस पर लिखा है , ‘मैं कौन हूं’, यह दुनिया कैसे बनी’। इसमें उठे प्रश्न मानवीयता और अस्मिता से जुड़े हैं। एक तरह का आत्मसाक्षात्कार है।

मैं कौन हूं, और दुनिया कैसे बनी है जैसे सवालों पर विश्व के अनेक दार्शनिकों और विचारकों ने गंभीर चिंतन किया है। ‘सोफी का संसार’ पाश्चात्य दार्शनिक जिज्ञासाओं के 2500 साल पुराने इतिहास को स्मृति, कल्पना तथा विवेक के अद्भुत संयोजन के माध्यम से पेश करती है। एक शिक्षक परिवार में पैदा हुए गार्डर की यह पुस्तक जिस भाषा में भी प्रकाशित हुई है, उसमें बेस्ट सेलर साबित हुई है। प्रोफेसर गौतम ने कहा कि रचना को उन्हें यूरोपीय भाषा के चौखटे से हिंदी की संस्कृति और दर्शन में लाना था। इसलिए मैं खुद को किताब का अनुवादक और संपादक कहता हूं। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस किताब को हिंदी भाषा में भी खास पहचान मिलेगी। दर्शनशास्त्र के विद्यार्थियों के अलावा हिंदी साहित्य में रुचि रखने वाले भी इसे पसंद करेंगे।

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