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राजपाट- सियासी टोटके

मरीजों को टोकन वितरण की व्यवस्था भी करा गए। पर इसी महीने वे प्रधानमंत्री के कोप के शिकार हो गए। मंत्रालय बदल जाता तो भी गनीमत रहती, उन्हें तो मंत्री परिषद से ही बाहर कर दिया मोदी ने।
Author September 11, 2017 05:23 am
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) (पीटीआई फाइल फोटो)

राजनीति में अंधविश्वास और टोटके सनातन रहे हैं। मसलन, भोपाल के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के बारे में यह धारणा खूब पनपी है कि यहां जो भी स्वास्थ्य मंत्री आया, उसका मंत्रालय ही जाता रहा। चाह कर भी यहां की स्वास्थ्य सेवाओं को नहीं सुधार पाया कोई मंत्री। भ्रष्टाचार, आपसी विवाद, नियुक्तियों में गुलगपाड़ा और खरीद-फरोख्त में अनियमितताएं हों या निर्माण के कामकाज की सुस्त रफ्तार, इस संस्थान की चर्चा होती ही रहती है। और तो और पिछले तीन साल से इसे नियमित निदेशक तक मयस्सर नहीं हो पाया। वाजपेयी सरकार के वक्त तबकी स्वास्थ्य मंत्री सुषमा स्वराज की पहल पर रखी गई थी इस अस्पताल की नींव। सुषमा कोई फालोअप कर पातीं कि उससे पहले ही स्वास्थ्य मंत्रालय छूट गया और वे बन गर्इं दिल्ली की मुख्यमंत्री।

फिर तो 2004 में वाजपेयी सरकार भी चली गई और इस अस्पताल के निर्माण की गति मंद हो गई। बहरहाल टोटके के अगले शिकार बने 2013 में स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद। उनके दौरे के एक साल के भीतर उनका मंत्री पद तो गया ही यूपीए की सरकार भी नहीं बची। जबकि छात्रावास से लेकर अस्पताल तक का निरीक्षण किया था आजाद ने पांच मई, 2013 को। मोदी सरकार आई तो डाक्टर हर्षवर्धन ने ली भोपाल के एम्स की सुध। पर थोड़े दिन बाद वे भी हो गए इस मंत्रालय से बाहर। स्थाई निदेशक की नियुक्ति का उनका वादा भी धरा रह गया। पिछले दिनों स्वास्थ्य राज्यमंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते ने किया था यहां का निरीक्षण। मरीजों को टोकन वितरण की व्यवस्था भी करा गए। पर इसी महीने वे प्रधानमंत्री के कोप के शिकार हो गए। मंत्रालय बदल जाता तो भी गनीमत रहती, उन्हें तो मंत्री परिषद से ही बाहर कर दिया मोदी ने।

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