December 04, 2016

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राजपाट: शहडोल का निहितार्थ, सियासी हथकंडे

शहडोल लोकसभा सीट के उप चुनाव में मिली जीत पर भाजपा नेता इठला भले रहे हों पर नतीजा उन्हें खतरे की घंटी समझना चाहिए। पा

Author November 28, 2016 05:55 am
चुनाव प्रचार के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला भाजपा का झंडा।

शहडोल का निहितार्थ
शहडोल लोकसभा सीट के उप चुनाव में मिली जीत पर भाजपा नेता इठला भले रहे हों पर नतीजा उन्हें खतरे की घंटी समझना चाहिए। पार्टी नेताओं की चिंता बढ़ना स्वभाविक है। भाजपा के ज्ञानसिंह दो बार पहले भी सांसद रह चुके हैं। इस समय भी शिवराज चौहान की सरकार में मंत्री हैं। यानि आरक्षित सीट पर अपने कद्दावर उम्मीदवार को उतारा था उसने। अब जरा मुकाबले में हारने वाली कांग्रेस की उम्मीदवार हिमाद्री सिंह की जन्मकुंडली को खंगाल लें। बेशक उनके दिवंग्त पिता दलबीर सिंह केंद्र में मंत्री रह चुके थे। पर वे खुद तो अभी दिल्ली में पढ़ाई ही कर रही हैं। यानि सक्रिय राजनीति की पूणर्कालिक कार्यकर्ता नहीं हैं। 2014 के चुनाव में मोदी की आंधी के चलते भाजपा के दलपत सिंह यहां करीब ढाई लाख वोट के अंतर से जीते थे। अब भाजपा उम्मीदवार की उपचुनाव में जीत का अंतर घटकर 60 हजार पर सिमट गया। यानि कांग्रेस ने अपने जनाधार को ढाई साल में बढ़ाया है। कांग्रेसी कह रहे हैं कि अगर गोंडवाणा गणतंत्र पार्टी के उम्मीदवार हीरा सिंह ने आदिवासियों के 55 हजार वोट न पाए होते तो सीट उनकी झोली में आना तय थी। ऊपर से 15 हजार वोट नोटा के खाते में चले गए। सियासी पंडित मान रहे हैं कि नोटबंदी के फैसले ने भाजपा का जनाधार घटा दिया। जबकि खुद मुख्यमंत्री शिवराज चौहान ने इस उप चुनाव को प्रतिष्ठा का मुद्दा बना रखा था। विधान सभा की नेपानगर सीट भाजपा ने बड़े अंतर से जीती है। जिस पर वह अपनी पीठ ठोक रही है। कुल मिलाकर शहडोल का नतीजा भाजपा के लिए जहां खतरे की घंटी है वहीं कांग्रेस के सूबेदार अरूण यादव फिर अपनी ही पार्टी में विरोधियों के वार सहने को मजबूर होंगे।
सियासी हथकंडे
हिमाचल में विधानसभा चुनाव अगले साल होंगे। करीब एक साल का वक्त बचा है। तैयारी दोनों ही पाटिर्यां कर रही हैं। फिलहाल फोकस रणनीति बनाने पर है। भाजपा ने सूबे की कांग्रेस सरकार के खिलाफ सियासी आरोप पत्र जारी करने की योजना बनाई है। सरकार के चार साल पूरा होने के मौके पर राज्यपाल को सौंपेंगे भाजपाई वीरभद्र सिंह के खिलाफ अपना आरोप पत्र। हालांकि इसके तथ्यों को आंशिक रूप से अभी से ही लीक कर रहे हैं। उधर मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के तेवर देखिए। न भाजपाई कवायद को गंभीरता से लिया है और न धौंस पट्टी में आने को राजी। उलटे इस आरोप पत्र को कूड़ेदान में फेंक देने का दम भर रहे हैं। ऊपर से यह धमकी अलग कि उनके सम्मान को ठेस पहुंचाने की कोशिश की गई तो वे ऐसा करने वालों को मानहानि के आरोप में अदालत में घसीटेंगे। पर भाजपा नेता अड़े हैं। उनका तर्क है कि मुख्यमंत्री के क्षेत्र में हो रहे अवैध खनन और उसके जरिए बेजा लाभ उठाने की कांग्रेस कार्यकर्ताओं की कोशिश का जिक्र वे जरूर करेंगे। इससे मुख्यमंत्री का पारा चढ़ गया। आरोप पत्र अभियान शिमला के विधायक सुरेश भारलाज चला रहे हैं। वे मुख्यमंत्री की चेतावनी को गीदड़ भभकी से ज्यादा भाव देने को तैयार नहीं। अलबत्ता आरोप पत्र में मुख्यमंत्री और उनके मंत्रियों की करतूतों का प्रमाण सहित खुलासा करने का दावा कर रहे हैं। कांग्रेसी नेताओं द्वारा सरकारी जमीन कब्जाने से लेकर सत्ता के दुरूपयोग के और भी मामले गिनाए हैं। आरोप पत्र तो एक महीने बाद आएगा पर उसे लेकर जुबानी जंग अभी से रफ्तार पकड़ चुकी है।

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First Published on November 28, 2016 5:55 am

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