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राजपाट: वक्त का फेर

अनुराधा को यूपी की सियासत में कांग्रेस नहीं जंची तो 1997 में भाजपा से शुरू की अपनी सियासी पारी।
Author नई दिल्ली | February 13, 2017 13:50 pm

राजनीति का चरित्र वाकई विचित्र ही होता है। कोई कितना भी बड़ा सूरमा क्यों न हो, सदा समान नहीं रहती उसकी बहार। यूपी की सियासत में भी ऐसी शख्सियतों की कमी नहीं। मसलन अमर सिंह और बेनी प्रसाद वर्मा का कितना दबदबा था एक दौर में। यों दोनों ही इस समय राज्यसभा के सदस्य ठहरे। वर्मा तो सपा में हैं भी पर अमर सिंह का कोई पता-ठिकाना नहीं। अखिलेश ने अपने इस अंकल को औकात बता दी तो बेचारे खुद कहते नजर आए कि वे अब छुट्टे सांड हैं। जहां हरा यानी चारा दिखेगा वहीं मुंह मारेंगे। हरा तो उनके हिसाब से इस समय भाजपा और नरेंद्र मोदी के पास है। उसे चरने के लिए जीभ लपलपा भी खूब रही है। पर भाजपाई ठहरे घाघ। जिसका जनाधार न हो उस पर वक्त क्यों जाया करें। सो एक दौर में सबसे बड़े क्षत्रिय नेता बन यूपी में जगह-जगह राजपूतों से पगड़ी और तलवार लेने वाले ठाकुर साहब को अब कोई पूछ ही नहीं रहा। एक भी उम्मीदवार ने अपने प्रचार के लिए नहीं बुलाया। यही हाल बेनी बाबू का है। पुरानी वफादारी और दोस्ती का वास्ता दिया तो मुलायम ने राज्यसभा दे दी। लेकिन इस बीच मुलायम का ही साजोसामान उनके चिराग ने झटक लिया। सो बेनी बाबू अपने बेटे को मनचाही सीट से टिकट नहीं दिला पाए। ऊपर से राज्यसभा में अब सपा का निजाम बदलने से घुटन बढ़ गई। ऐसी ही एक और शख्सियत हैं अनुराधा चौधरी। बड़ी बहन किरण चौधरी हरियाणा के कद्दावर जाट नेता रहे बंसीलाल की पुत्रवधू और सुरेंद्र की पत्नी हैं।

लेकिन अनुराधा को यूपी की सियासत में कांग्रेस नहीं जंची तो 1997 में भाजपा से शुरू की अपनी सियासी पारी। पार्टी के किसान मोर्चे की नेता किसानों के उद्धार के लिए नहीं बनी थी। कैराना की लोकसभा सीट पर थी उनकी नजर। 1998 में तमाम बड़े नेताओं की परिक्रमा करना भी व्यर्थ गया। भाजपा ने कद्दावर जाट नेता वीरेंद्र वर्मा को बना दिया यहां अपना उम्मीदवार। हताशा में भाजपा छोड़ दी। लोकसभा चुनाव के बाद कुछ दिन समाजवादी पार्टी में टटोली अपनी जगह। माकूल माहौल नहीं मिला तो वक्त ने सद्बुद्धि दे दी। समझ आ गया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों की सियासत अजित सिंह की छत्रछाया में ही संभव है। बागपत में भाजपा के सोमपाल शास्त्री से हार के बाद अजित सिंह भी एकाकीपन से जूझ रहे थे। अनुराधा को खूब तवज्जो दी। पार्टी में भी दूसरे नंबर की हैसियत दे दी। 1999 के लोकसभा चुनाव में बागपत से जीत भी गए। फिर तो अनुराधा के दिन फिर गए। 2002 के विधानसभा चुनाव में अनुराधा की सलाह के कारण ही भाजपा से गठबंधन किया। सबसे सुरक्षित विधानसभा सीट बघरा भाजपा से झटकी और चुनाव जीत गईं। भाजपा ने बसपा से गठबंधन कर मायावती को मुख्यमंत्री बनवाया तो मंत्री पद अनुराधा को भी मिल गया। पीडब्ल्यूडी जैसे मलाईदार महकमे ने चेहरे पर चमक कई गुना बढ़ा दी। लेकिन 2003 में मायावती ने इस्तीफा दे दिया। अब ताज मुलायम के सिर आ गया तो अनुराधा की इच्छा के आगे समर्पण करते हुए अजित ने भी कर लिया भाजपा छोड़ कर सपा से गठबंधन।

अनुराधा का मंत्री पद मुलायम की सरकार में भी बना रहा। अलबत्ता इस बार और ज्यादा मलाईवाला सिंचाई मंत्रालय मिला तो लक्ष्मी की कृपा बरस गई। 2004 में पुरानी महत्वाकांक्षा फिर जग गई। इस बार सपा के साथ गठबंधन कर लोकसभा चुनाव लड़ा और जीत गईं। यूपी का मंत्री पद फिर भी नहीं छोड़ा। छह महीने बाद जब संवैधानिक बाधा आ गई तो मुलायम से सिंचाई आयोग बनवा उसकी मुखिया बन बैठीं। कैबिनेट मंत्री जैसा ही बरकरार रखा अपना रुतबा। लेकिन 2009 में लोकसभा चुनाव की हार के साथ ही बुरे दिन शुरू हो गए। सूबे में था इस दौरान मायावती का राज। न रुतबा बचा और न धमक। सो 2012 में अजित को छोड़ सपा में शामिल हो गईं। यहां टिकट आखिरी वक्त पर कट गया। अजित सिंह के परिवार में इस दौरान बेटा जयंत चौधरी बन बैठा। सो दोबारा यहां वापसी की कोई गुंजाइश बची ही नहीं। इस विधानसभा चुनाव में हर कोई पूछ रहा है कि कहां हैं जाट राजनीति का यह सितारा। तो पाठकों को बता दें कि मैडम कहने को इस वक्त भाजपा में हैं। बिजनौर से चुनाव लड़ने की मंशा से पहना था भगवा लिबास। लेकिन भाजपाइयों ने गच्चा दे दिया। अज्ञातवास भोग रही हैं बेचारी। सयानो की सलाह मानी होती तो यह दिन न देखना पड़ता। अपनी जगह पर ही भारी होता है पत्थर। अपनी जगह से हटा तो घट जाता है उसका वजन। रालोद में ही बनी रहतीं तो इस विधानसभा चुनाव में अच्छे दिन फिर आ सकते थे उनके।

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