June 26, 2017

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राजपाट- मन भेद बरकरार, दुविधा में नीकु

उत्तराखंड में 70 में से 57 सीटें जीतने वाली भाजपा के लिए मुख्यमंत्री का फैसला खासा सिरदर्द साबित हुआ।

Author March 20, 2017 04:52 am
उत्तराखंड सीएम की शपथ लेते हुए त्रिवेंद्र सिंह रावत। (Photo Source: ANI)

मन भेद बरकरार

उत्तराखंड में 70 में से 57 सीटें जीतने वाली भाजपा के लिए मुख्यमंत्री का फैसला खासा सिरदर्द साबित हुआ। सरकार का गठन बेशक हो गया है, पर सब कुछ सामान्य नहीं है। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को मन से स्वीकार नहीं कर पा रहे उनके सहयोगी मंत्री। खासकर सतपाल महाराज और प्रकाश पंत। दोनों ही मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे। नाराज महाराज ने मंत्री पद ठुकरा दिया था और विधानसभा अध्यक्ष बनने को भी तैयार नहीं थे। उनकी नाराजगी से पार्टी आलाकमान के हाथ-पैर फूल गए तो बताते हैं कि अमित शाह ने मनुहार की। राज्यसभा भेजने और उनकी सीट पर पत्नी अमृता रावत को उपचुनाव लड़वा कर सूबे की सरकार में मंत्री बनाने का वादा किया तभी वे मंत्री पद की शपथ लेने के लिए राजी हुए। पाठकों को बता दें कि 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले सतपाल महाराज कांग्रेस छोड़ भाजपा में इसी आश्वासन पर आए थे कि विधानसभा चुनाव में पार्टी की तरफ से वे ही होंगे मुख्यमंत्री का चेहरा। लेकिन चुनाव आया तो संघ परिवार ने टंगड़ी मार दी। त्रिवेंद्र सिंह रावत भारी पड़े। महाराज का बाहरी होना बाधा बन गया। रावत के मंत्रिमंडल पर असर भी सतपाल महाराज के विरोधी विजय बहुगुणा का ही ज्यादा दिख रहा है। त्रिवेंद्र के मंत्रिमंडल में कांग्रेस से भाजपा में आने वाले पांच लोग मंत्री बने हैं। हरक सिंह रावत, यशपाल आर्य, सुबोध उनियाल, सतपाल महाराज और रेखा आर्य। सबसे ज्यादा मौज तो हरक सिंह रावत और यशपाल आर्य की आई है। कांग्रेस सरकार में भी चार साल तक मंत्री पद का मजा लूटा और अब भाजपा सरकार में भी मिल गई है मलाई।

दुविधा में नीकु

नीतीश कुमार दुविधा में हैं। सपने में भी कल्पना नहीं की होगी कि सेवा आयोग की परीक्षा का पर्चा लीक हो जाएगा और इतना तूल पकड़ लेगा। पर्चा लीक होते ही दो टूक कह दिया था कि कानून अपना काम करेगा। दोषी कोई भी हो बच नहीं पाएगा। उसे सजा जरूर मिलेगी। लेकिन अब तो उनके मंत्रियों पर उंगली उठ रही है। उनके लिप्त होने के आरोप लग रहे हैं। सुशील मोदी को शुरू से ही अहसास हो गया था कि मुद्दा तूल पकड़ेगा। सो लगातार उठाते रहे इसे। अब नई मांग कर डाली है कि नीतीश अपने मंत्रियों से इस्तीफा लें। यूपी और उत्तराखंड की कामयाबी व मणिपुर और गोवा में भी सत्ता मिल जाने से मोदी बम-बम हैं। जोश नीतीश की सरकार के खिलाफ आवाज में भी झलक रहा है। नीतीश की दुविधा यही है कि मंत्रियों का बचाव करें तो कैसे? ऊपर से भाजपा से निपटना भी है। बीच का रास्ता नहीं निकला तो संकट बढ़ेगा। लेकिन दूरदर्शी हैं और सयाने भी। अंत में रास्ता निकाल ही लेंगे।

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First Published on March 20, 2017 4:52 am

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