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राजपाट: हार का खौफ, करनी-भरनी

राजस्थान में भाजपा नेताओं का घमासान फिलहाल थम गया है। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के बदले तेवर से पार्टी के कुछ नेताओं के चेहरे अचानक खिल गए।
Author November 28, 2016 05:52 am
राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे

हार का खौफ

राजस्थान में भाजपा नेताओं का घमासान फिलहाल थम गया है। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के बदले तेवर से पार्टी के कुछ नेताओं के चेहरे अचानक खिल गए। कहने को तीन साल से सूबे की सत्ता पर काबिज है पार्टी, पर ज्यादातर नेताओं को सत्ता सुख नसीब नहीं हो पाया। हां, कुछ चहेतों को जरूर महारानी ने लालबत्ती दे रखी हैं। अचानक तेवर बदलने की दीगर वजह है। एक तो सूबे में सरकार की छवि उजली नहीं दिख रही। ऊपर से मुख्यमंत्री के आलाकमान से रिश्तों में भी खिंचाव रहा है। मुख्यमंत्री के करीबी कुछ मंत्रियों की कार्यशैली पार्टी के एक तबके को पंसद नहीं। अमित शाह तक वसुंधरा विरोधी यह संदेश पहुंचा रहे हैं कि ऐसे हालात में दोबारा चुनाव जीतना मुमकिन नहीं। ऊपर से कांग्रेसी माहौल को अपने माकूल मान अभी से बल्लियों उछल रहे हैं। दो ही पार्टियां होने के कारण सूबे का चुनावी समीकरण हर बार बदल जाता है। जैसे परंपरा बन गई हो कि एक चुनाव में भाजपा जीतेगी तो अगले चुनाव में कांग्रेस। कांग्रेसी तो मानकर चल रहे हैं कि उन्हें कुछ करने की जरूरत ही नहीं। वसुंधरा सरकार से लोगों की नाराजगी उन्हें नकारात्मक जनादेश के चलते सत्ता में पहुंचा ही देगी। कांग्रेसी तो इस तिकड़म में हैं कि चुनाव के वक्त नेतृत्व कौन करेगा। छोटे नेता अपने टिकट के लिए जोड़ तोड़ तक ही सीमित हैं। पर भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की नींद टूट गई है। मुख्यमंत्री को अमित शाह का कड़क संदेश पार्टी के संगठन मंत्री वी सतीश ने दे दिया है। उसी का नतीजा है कि पिछले कुछ दिनों में कई जमीनी नेताओं को मलाईदार ओहदे मिल गए हैं। आलाकमान ने वसुंधरा को दो टूक कह दिया बताते हैं कि संघियों का सम्मान करना पड़ेगा। गैर संघी मंत्री अब चौकस हो गए हैं। फिलहाल लेन-देन से बच रहे हैं। कहीं मंत्रिमंडल के संभावित फेर बदल में पत्ता ही न कट जाए। वी सतीश ने मुख्यमंत्री को समझा दिया है कि घनश्याम तिवारी की वरिष्ठता को नजरअंदाज नहीं करें। संघी खेमा खुलकर तिवारी के पीछे खड़ा हो गया है। हां इतना जरूर है कि अब तिवारी भी वसुंधरा के खिलाफ कोई शब्द नहीं बोल रहे हैं। दो साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव हार जाने के डर से ही सही फिलहाल तो गुटबाजी थमी लग ही रही है।
करनी-भरनी

हिमाचल भी अछूता नहीं रह पाया नोटबंदी के केंद्र सरकार के फैसले से। विरोधी बेशक कहें कि पांच सौ और एक हजार रूपए वाले चलन से बाहर कर दिए गए नोटों का भाजपा ने अपना बंदोबस्त पहले ही कर लिया था, हकीकत उलट है। पहले भाजपाई शिमला में अपनी प्रेस वार्ताओं के लिए पर्यटन निगम के रेस्तरां चुनते थे। पार्टी का दफ्तर पास होने से इसमें सुविधा भी थी। चाहते तो पार्टी दफ्तर में भी कर सकते थे। लेकिन नोटबंदी ने उनका अर्थशास्त्र बिगाड़ दिया। पर्यटन निगम के महंगे रेस्तरां का भुगतान करने की स्थिति रही ही नहीं। दरअसल ऐसे आयोजनों का खर्च पार्टी तो उठाती नहीं। कोई न कोई कार्यकर्ता या शुभचिंतक ही उठाता है यह बोझ। अब नए नोट नहीं मिल पाने से जेबें खाली हैं। प्रधानमंत्री की प्लास्टिक मनी के इस्तेमाल की सलाह रास नहीं आती। लिहाजा पार्टी की रैलियों पर भी दिखने लगा है प्रतिकूल असर। गनीमत है कि प्रधानमंत्री की हिमाचल में रैली नोटबंदी के फरमान से पहले ही हो गई थी। सो पैसे की तंगी आड़े आई ही नहीं। अब कोई कार्यकर्ता अपना सफेद धन खचर्ने को तैयार नहीं। असर कांग्रेस की तैयारियों पर भी पड़ा है। अगले महीने मंडी में होगी पार्टी की रैली। उसके लिए भी नकदी का टोटा बाधा बना है। सो, रैली की भीड़ के सहारे अब अपनी जमीनी लोकप्रियता का सही आकलन कांग्रेस कर पाएगी न भाजपा।

 

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