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राजपाट- नीरो की राह

दार्जीलिंग की पहाड़ियां अलग गोरखालैंड आंदोलन की आग में जल रही थीं तो दूसरी तरफ इस आग पर पानी डालने के बजाए सूबे की मुख्यमंत्री ठंडे देश नीदरलैंड चली गर्इं।
Author June 26, 2017 05:11 am
कोलकाता में बंगाल वैश्विक व्यापार सम्मेलन के पहले दिन बैठक को संबोधित करतीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। (PTI Photo by Ashok Bhaumik/20 Jan, 2017)

पुरानी कहावत है कि जिस समय रोम जल रहा था, वहां का शासक नीरो बंसी बजा रहा था। उसे इतना भी ख्याल नहीं था कि उसकी बंसी को सुनने वाला वहां कोई था ही नहीं। पश्चिम बंगाल के विरोधी दल भी सूबे की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर अब नीरो होने का ही आरोप लगा रहे हैं। उनका कहना है कि एक तरफ दार्जीलिंग की पहाड़ियां अलग गोरखालैंड आंदोलन की आग में जल रही थीं तो दूसरी तरफ इस आग पर पानी डालने के बजाए सूबे की मुख्यमंत्री ठंडे देश नीदरलैंड चली गर्इं। संयुक्त राष्ट्र के एक समारोह में शिरकत जो करनी थी। हालांकि वे तो इस समारोह से कई दिन पहले ही देश छोड़ गईं।

दौरे का एक मकसद सूबे में विदेशी निवेश आकर्षित करना भी होगा। तभी तो उद्योगपतियों का प्रतिनिधिमंडल भी ले गईं थी अपने साथ। पत्रकारों को भी शिकायत का मौका नहीं दिया। इसका फायदा भी मिला। सूबे के अखबारों में लगातार छपी ममता की तस्वीरें। किसी तस्वीर में पदयात्रा करते दिखाया है तो किसी में वहां बंगाली समुदाय के कार्यक्रम में शिरकत करने। हालांकि पर्वतीय क्षेत्र की हिंसा की खबरें भी खूब छाई रहीं इस दौरान अखबारों में। अपनी गैरमौजूदगी में भी ममता ने पर्वतीय क्षेत्र की हालत पर चर्चा के मकसद से सर्वदलीय बैठक भी करा दी। जिम्मा सौंपा सूबे के गृहसचिव को। यह बात अलग है कि भाजपा, वाम मोर्चा और कांग्रेस का कोई भी नेता नहीं पहुंचा इस बैठक में। गोरखा जनमुक्ति मोर्चे ने तो खैर पहले ही कर दिया था

शिरकत से इनकार। विपक्ष की बात भी गलत नहीं थी। मुख्यमंत्री की गैरमौजूदगी में हो रही सर्वदलीय बैठक का औचित्य उन्हें समझ नहीं आया। हालांकि माकपा ने सुझाव भी दे दिया कि सर्वदलीय बैठक के बजाए केंद्र, राज्य और गोरखा जनमुक्ति मोर्चे की त्रिपक्षीय बैठक बुला कर खोजना चाहिए था समस्या का समाधान। उधर इस बीच पड़ोसी राज्य सिक्किम के मुख्यमंत्री पवन चामलिंग ने अलग गोरखालैंड की मांग का समर्थन कर ममता की नाराजगी और बढ़ा दी। केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह को भी पत्र लिख दिया कि वे अलग राज्य की मांग पर विचार करें। ममता ने गोरखालैंड के सवाल पर तो कड़ा फैसला कर रखा है कि सूबे का बंटवारा उनके मुख्यमंत्री रहते कतई मुमकिन नहीं। लेकिन सिक्के का एक पहलू यह भी है कि कोई ठोस नीति नहीं अपनाने से भी पैर पसार रहा है गोरखालैंड आंदोलन। केंद्र ने भी यहां अर्ध सैनिक बल भेजने से इनकार कर दिया है।

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